02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 10 ||यशोदाजी की चिंता; नन्द जी द्वारा आश्वासन तथा ब्राह्मणों को विविध प्रकार के दान देना; श्री बलराम तथा श्रीकृष्ण जी का गोचारण....

श्री गर्ग संहिता
02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 10 ||यशोदाजी की चिंता; नन्द जी द्वारा आश्वासन तथा ब्राह्मणों को विविध प्रकार के दान देना; श्री बलराम तथा श्रीकृष्ण जी का गोचारण....

नारद जी कहते हैं:- अष्टावक्र के शाप से सर्प होकर अघासुर उन्हीं के वरदान-बल से उस परम मोक्ष को प्राप्त हुआ, जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। 

वत्सासुर, वकासुर और फिर अघासुर के मुख से श्रीकृष्ण किसी तरह बच गये हैं और कुछ ही दिनों में उनके ऊपर ये सारे संकट आये हैं-यह सुनकर यशोदा जी भय से व्याकुल हो उठीं। 

उन्होंने कलावती, रोहिणी, बड़े-बूढ़े गोप, वृषभानुवर, व्रजेश्वर नन्दराज, नौ नन्द, नौ उपनन्द तथा प्रजाजनों के स्वामी छ: वृषभानुओं को बुलाकर उन सबके सामने यह बात कही ।

यशोदा जी बोलीं:- "आप सब लोग बतायें- मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ और कैसे मेरा कल्याण हो?

मेरे पुत्र पर तो यहाँ क्षण-क्षण में बहुत-से अरिष्ट आ रहे हैं, पहले महावन छोड़कर हम लोग वृन्दावन में आये और अब इसे भी छोड़कर दूसरे किस निर्भय देश में मैं चली जाऊँ, यह बताने की कृपा करें। 

मेरा यह बालक स्वभाव से ही चपल है, खेलते-खेलते दूर तक चला जाता है।
व्रज के दूसरे बालक भी बड़े चंचल हैं, वे सब मेरी बात मानते ही नहीं। 

तीखी चोंच वाला बलवान वकासुर पहले मेरे बालक को निगल गया था, उससे छूटा तो इस बेचारे को अघासुर ने समस्त ग्वाल-बालों के साथ अपना ग्रास बना लिया। 
भगवान की कृपा से किसी तरह उससे भी इसकी रक्षा हुई, इन सबसे पहले वत्सासुर इसकी घात में लगा था, किंतु वह भी दैव के हाथों मारा गया। 

अब मैं बछड़े चराने के लिये अपने बच्चे को घर से बाहर नहीं जाने दूँगी।"

श्री नारदजी कहते हैं:- इस तरह कहती तथा निरंतर रोती हुई यशोदा की ओर देखकर नन्दजी कुछ कहने को उद्यत हुए।
पहले तो धर्म और अर्थ के ज्ञाता तथा धर्मात्माओं में श्रेष्ठ नन्द ने गर्ग जी के वचनों की याद दिलाकर उन्हें धीरज बँधाया, फिर इस प्रकार कहा।

नन्द राज बोले:- "यशोदे, क्या तुम गर्ग जी की कही हुई सारी बातें भूल गयीं? 

ब्राह्मणों की कही हुई बात सदा सत्य होती है, वह कभी असत्य नहीं होती इसलिये समस्त अरिष्टों का निवारण करने के लिये तुम्हें दान करते रहना चाहिये। 

दान से बढ़कर कल्याणकारी कृत्य न तो पहले हुआ है और न आगे होगा ही ।

नारद जी कहते हैं:- नरेश्वर, तब यशोदा ने बलराम और श्रीकृष्ण के मंगल के लिये ब्राह्मणों को बहुमूल्य नवरत्न और अपने अलंकार दिये।
नन्द जी ने उस समय दस हजार बैल, एक लाख मनोहर गायें तथा दो लाख भार अन्न दान दिये।

श्री नारद जी पुन: कहते हैं:- राजन, अब गोपों की इच्छा से बलराम और श्रीकृष्ण गोपालक हो गये, अपने मित्रों के साथ गाय चराते हुए वे दोनों भाई वन में विचरण करने लगे।
उस समय श्रीकृष्ण और बलराम का सुन्दर मुँह निहारती हुई गौएँ उनके आगे-पीछे और अगल-बगल में विचरती रहती थीं। 

उन गौओं के गले में क्षुद्र घण्टिकाओं की माला पहनायी गयी थीं, सोने की मालाएँ भी उनके कण्ठ की शोभा बढ़ाती थीं।
उनके पैरों में घुँघुरू बँधे थे, उनकी पूँछों के स्वच्छ बालों में लगे हुए मोरपंख और मोतियों के गुच्छे शोभा दे रहे थे।

वे घंटों और नूपुरों के मधुर झंकार को फैलाती हुई इधर-उधर चरती थीं।

चमकते हुए नूतन रत्नों की मालाओं के समूह से उन समस्त गौओं की बड़ी शोभा होती थी।

राजन, उन गौओं के दोनों सींगों के बीच में सिर पर मणिमय अलंकार धारण कराये गये थे, जिनसे उनकी मनोहरता बढ़ गयी थी।
सुवर्ण रश्मियों की प्रभा से उनके सींग तथा पार्श्व-प्रवेष्टन (पीठ पर की झूल) चमकते रहते थे। 

कुछ गौओं के भाल में किंचित रक्त वर्ण के तिलक लगे थे, उनकी पूँछें पीले रंग से रँगी गयी थीं और पैरों के खुर अरूण राग से रंजित थे। 

बहुत-सी गौएँ कैलास पर्वत के समान श्वेतवर्ण वाली, सुशीला, सुरूपा तथा अत्यंत उत्तम गुणों से सम्पन्न थी।

मिथिलेश्वर, बछड़े वाली गौएँ अपने स्तनों के भार से धीरे-धीरे चलती थीं, कितनों के थन घड़ों के बराबर थे। 

बहुत-सी गौएँ लाल रंग की थीं, वे सब-की-सब भव्य-मूर्ति दिखायी देती थी।

कोई पीली, कोई चितकबरी, कोई श्यामा, कोई हरी, कोई ताँबे के समान रंग वाली, कोई धूमिल वर्ण की और कोई मेघों की घटा जैसी नीली थीं। 

उन सबके नेत्र घनश्याम श्रीकृष्ण की ओर लगे रहते थे, किन्हीं गौओं और बैलों के सींग छोटे, किन्हीं के बड़े तथा किन्हीं के ऊँचे थे। 

कितनों के सींग हिरनों के से थे और कितनों के टेढ़े-मेढ़े, वे सब गौएँ कपिला तथा मंगल की धाम थीं। 

वन-वन में कोमल कमनीय घास खोज-खोजकर चरती हुई कोटि-कोटि गौएँ श्रीकृष्ण के उभय पार्श्वों से विचरती थीं।

यमुना का पुण्य-पुलिन तथा उसके निकट श्याम तमालों से सुशोभित वृन्दावन नीप, कदम्ब, नीम, अशोक, प्रवाल, कटहल, कदली, कचनार, आम, मनोहर जामुन, बेल, पीपल और कैथ आदि वृक्षों तथा माधवी लताओं से मण्डित था।

वसंत ऋतु के शुभागमन से मनोहर वृन्दावन की दिव्य शोभा हो रही थी।
वह देवताओं के नन्दनवन-सा आनन्दप्रद और सर्वतोभद्र वन-सा सब ओर से मंगलकारी जान पड़ता था। 
उसने (कुबेर के) चैत्र रथ वन की शोभा को तिरस्कृत कर दिया था, वहाँ झरनों और कन्दराओं से संयुक्त रत्न धातुमय श्रीमान गोवर्धन पर्वत शोभा पाता था। 

वहाँ का वन पारिजात या मन्दार के वृक्षों से व्याप्त था, वह चन्दन, बेर, कदली, देवदार, बरगद, पलास, पाकर, अशोक, अरिष्ट (रीठा), अर्जुन, कदम्ब, पारिजात, पाटल तथा चम्पा के वृक्षों से घिरा हुआ वह वन करंज-जाल से विलसित कुंजों से सम्पन्न था। 

वहाँ मधुर कण्ठ वाले नर-कोकिल और मयूर कलरव कर रहे थे। 

उस वन में गौएँ चराते हुए श्रीकृष्ण एक वन से दूसरे वन में विचरा करते थे। 

नरेश्वर, वृन्दावन और मधुवन में, तालवन के आस-पास कुमुदवन, बहुला-वन, कामवन, बृहत्सानु, और नन्दीश्वर नामक पर्वतों के पार्श्ववर्ती प्रदेश में, कोकिलों की काकली से कूजित सुन्दर कोकिलावन में, लताजाल-मण्डित सौम्य तथा रमणीय कुश-वन में, परम पावन भद्रवन, भाण्ड़ीर उपवन, लोहार्गल तीर्थ तथा यमुना के प्रत्येक तट और तटवर्ती विपिनों में पीताम्बर धारण किये, बद्धपरिकर, नट वेषधारी मनोहर श्रीकृष्ण बेंत लिये, वंशी बजाते और गोपांगनाओं की प्रीति बढ़ाते हुए बड़ी शोभा पाते थे। 

उनके सिर पर शिखिपिच्छ का सुन्दर मुकुट तथा गले में वैजयंती माला सुशोभित थीं ।

संध्या के समय गोवृन्द को आगे किये अनेकानेक रागों में बाँसुरी बजाते साक्षात श्री हरि कृष्ण नन्दव्रज में आये। 
आकाश को गोरज से व्याप्त श्री वंशीवट के मार्ग से आती हुई वंशी-ध्वनि से आकुल हुई गोपियाँ श्याम सुन्दर के दर्शन के लिये घरों से बाहर निकल आयीं। 

अपनी मानसिक पीड़ा दूर करने और उत्तम सुख को पाने के लिये वे गोप सुन्दरियाँ श्रीकृष्ण दर्शन के हेतु घर से बाहर आ गयी थीं, उनमें श्रीकृष्ण को भुला देने की शक्ति नहीं थी। 

श्रीनन्दनन्दन सिंह की भाँति पीछे घूमकर देखते थे, वे गज किशोर की भाँति लीला पूर्वक मन्द गति से चलते थे, उनके नेत्र प्रफुल्ल कमल के समान शोभा पाते थे। 

गो-समुदाय से व्याप्त संकीर्ण गलियों में मन्द-मन्द गति से आते हुए श्यामसुन्दर को उस समय गोपवधूतियाँ अच्छी तरह से देख नहीं पाती थीं।

मिथिलेश्वर, गोधूलि से धूसरित उत्तम नील केशकलाप धारण किये, सुवर्ण निर्मित बाजू बन्द से विभूषित, मुकुटमण्डित तथा कान तक खींचकर वक्र भाव से दृष्टि बाण का प्रहार करने वाले, गोरज-समलंकृत, कुन्द माला से अलंकृत, कानों में खोंसे हुए पुष्पों की आभा से उद्दीप्त, पीताम्बरधारी, वेणुवादनशील तथा भूतल का भूरि-भार हरण करने वाले प्रभु श्रीकृष्ण आप सबकी रक्षा करें।

इस प्रकार श्री गर्ग सन्हिता में श्रीवृन्दावनखण्‍ड के अंतर्गत ‘यशोदा जी की चिंता, नन्द द्वारा आश्वासन तथा दान, श्रीकृष्ण की गोचारण-लीला का वर्णन’ नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ।

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