02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 11 || धेनुकासुर का उद्धार

श्री गर्ग संहिता 
02. वृन्दावन खण्ड  || अध्याय 11 || धेनुकासुर का उद्धार

श्री नारदजी कहते हैं:- राजन, एक दिन श्रीकृष्ण बलराम जी के साथ मनोहर गौएँ चराते हुए नूतन ताल वन के पास चले गये, उस समय समस्त गोपाल उनके साथ थे। 
वहाँ धेनुकासुर नाम का एक असुर रहा करता था, उसके भय से गोपगण वन के भीतर नहीं गये। 

श्रीकृष्ण भी नहीं गये, अकेले बलराम जी ने उसमें प्रवेश किया और अपने नीले वस्त्र को कमर में बाँधकर महाबली बलदेव परिपक्व फल लेने के लिये उस वन में विचरने लगे। 

बलराम जी साक्षात अनन्तदेव के अवतार हैं, उनका पराक्रम भी अनंत है, अत; दोनों हाथों से ताड़ के वृक्षों को हिलाते और फल-समूहों को गिराते हुए वहाँ निर्भय गर्जना करने लगे। 

गिरते हुए हुए फलों की आवाज सुनकर वह गर्दभाकार असुर रोष से आग-बबूला हो गया।
वह दोपहर में सोया करता था, किंतु आज विघ्न पड़ जाने से वह दुष्ट क्रोध से भयंकर हो उठा। 

धेनुकासुर कंस का सखा होने के साथ ही बड़ा बलवान था, वह बलदेव जी के सम्मुख युद्ध करने के लिये आया और उसने अपने पिछले पैरों से उनकी छाती में आघात किया, आघात करके वह बारम्बार दौड़ लगाता हुआ गधे की भाँति रेंकने लगा। 

तब बलराम जी ने धेनुक के दोनों पिछले पैर पकड़ कर शीघ्र ही उसे ताड़ के वृक्ष पर दे मारा, यह कार्य उन्होंने एक ही हाथ से खेल-खेल में कर ड़ाला। 

इससे वह ताल वृक्ष स्वयं तो टूट ही गया, गिरते-गिरते उसने अपने पार्श्ववर्ती दूसरे बहुत-से ताड़ों को भी धराशायी कर दिया। 

राजेन्द्र, वह एक अद्भुत-सी बात हुई।

दैत्यराज धेनुक ने पुन; उठकर रोष पूर्वक बलराम जी को पकड़ लिया और जैसे एक हाथी अपना सामना करने वाले दूसरे हाथी को दूर तक ठेल ले जाता है, उसी प्रकार उन्हें धक्का देकर एक योजन पीछे हटा दिया। 

तब बलराम जी ने तत्काल धेनुक को पकड़ कर घुमाना आरम्भ किया और घुमाकर उसे धरती की पीठ पर दे मारा, तब उसे मूर्च्छा आ गयी और उसका मस्तक फट गया तो भी वह क्षण भर में उठकर खड़ा हो गया, उसके शरीर से भयानक क्रोध टपक रहा था। 

इसके बाद उस दैत्य ने अपने मस्तक में चार सींग प्रकट करके, भयानक रूप धारण कर उन तीखे और भयंकर सींगों से गोपों को खदेड़ना आरम्भ किया। 

गोपों को आगे-आगे भागते देख वह मदमत्त असुर तुरंत ही उनके पीछे दौड़ा

बलराम जी ने असुर धेनुक को पकड़ कर घुमाना आरम्भ किया और घुमाकर उसे धरती की पीठ पर दे मारा, तब उसे मूर्च्छा आ गयी और उसका मस्तक फट गया तो भी वह क्षण भर में उठकर खड़ा हो गया, उसके शरीर से भयानक क्रोध टपक रहा था। 

इसके बाद उस दैत्य ने अपने मस्तक में चार सींग प्रकट करके, भयानक रूप धारण कर उन तीखे और भयंकर सींगों से गोपों को खदेड़ना आरम्भ किया। 

गोपों को आगे-आगे भागते देख वह मदमत्त असुर तुरंत ही उनके पीछे दौड़ा।

उस समय श्रीदामा ने उस पर डन्डे से प्रहार किया, सुबल ने उसको मुक्के से मारा, स्तोक कृष्ण ने उस महाबली दैत्य पर पाश से प्रहार किया, अर्जुन ने क्षेपण से और अंशु ने उस गर्दभाकार दैत्य पर लात से आघात किया। 

इसके बाद विशालर्षभ ने आकर शीघ्रतापूर्वक अपने पैर से और बल से भी उस दैत्य को दबाया। 

तेजस्वी ने अर्द्धचन्द्र (गर्दनियाँ) देकर उसे पीछे हटाया और देवप्रस्थ ने उस असुर के कई तमाचे जड़ दिये, वरूथ ने उस विशालकाय गधे को गेंद से मारा।

तदनंतर श्रीकृष्ण ने भी धेनुकासुर को दोनों हाथों से उठाकर घुमाया और तुरंत ही गोवर्धन पर्वत के ऊपर फेंक दिया।

श्रीकृष्ण के उस प्रहार से धेनुक दो घड़ी तक मूर्च्छ्ति पड़ा रहा, फिर उठकर अपने शरीर को कँपाता हुआ मुँह फाड़कर आगे बढ़ा और दोनों सींगों से श्री हरि को उठाकर वह दैत्य दौड़कर आकाश में चला गया। 

आकाश में एक लाख योजन ऊँचे जाकर उनके साथ युद्ध करने लगा। 

भगवान श्रीकृष्ण ने धेनुकासुर को पकड़कर नीचे भूमि को ओर फेंका, इससे उसकी हड्डियाँ चूर-चूर हो गयीं और वह मूर्च्छित हो गया। 

तथापि पुन: उठकर अत्यंत भयंकर सिंहनाद करते हुए उसने दोनों सींगों से गोवर्धन पर्वत को उखाड़ लिया और श्रीकृष्ण के ऊपर चलाया। 

श्रीकृष्ण ने पर्वत को हाथ से पकड़कर पुन: उसी के मस्तक पर दे मारा।

तदनंतर उस बलवान दैत्य ने फिर पर्वत को हाथ में ले लिया और श्रीकृष्ण के ऊपर फेंका, किंतु श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को ले जाकर उसके पूर्व स्थान पर रख दिया। 

तदनंतर फिर धावा करके महादैत्य धेनुक ने दोनों सींगों से पृथ्वी को विदीर्ण कर दिया और पिछले पैरों से पुन: बलराम पर प्रहार करके बड़े जोर से गर्जना की। 
उसकी उस गर्जना से समस्त ब्रह्माण्‍ड गूँज उठा और भूमण्‍डल काँपने लगा। 

तब महाबली बलदेव ने दोनों हाथों से उसको पकड लिया और उसे पृथ्वी दे मारा, इससे उसका मस्तक फूट गया और होश-हवास जाता रहा। 

इसके बाद श्रीकृष्ण के बड़े भाई ने पुन: उस दैत्य पर मुक्के से प्रहार किया, उस प्रहार से धेनुकासुर की तत्काल मृत्यु हो गयी। 

उसी समय देवताओं ने वहाँ नन्दन वन के फूल बरसाये। 

देह से पृथक होकर धेनुक श्यामसुन्दर विग्रह धारण कर पुष्पमाला, पीताम्बर तथा वनमाला से समलंकृत देवता हो गया, लाख-लाख पार्षद उसकी सेवा में जुट आये। 

सहस्त्रों ध्वज उसके रथ की शोभा बढ़ाने लगे, सहस्त्रों पहियों की घर्घर ध्वनि से युक्त उस रथ में दस हजार घोड़े जुते थे, लाखों चँवरों की वहाँ शोभा हो रही थी। 

वह रथ अरूण वर्ण का था और अत्यधिक रत्नों से जटित था, उसका विस्तार एक दिव्य योजन का था। 

वह मन के समान तीव्र गति से चलने वाला विमान या रथ बड़ा ही मनोहर था।

राजन, उसमें घुँघुरूओं की जाली लगी थी, घंटे और मंजीर बजते थे।

दिव्य रूपधारी दैत्य धेनुक बलराम सहित श्रीकृष्ण की परिक्रमा करके, उक्त दिव्य रथ पर आरूढ़ हो, दिशा मण्‍डल को देदीप्यमान करता हुआ, प्रकृति से परे विद्यमान गोलोकधाम में चला गया। 

इस प्रकार धेनुक का वध करके बलराम सहित श्रीकृष्ण अपन यशोगान करते हुए ग्वाल-बालों के साथ व्रज को लौटे, उनके साथ गौओं का समुदाय भी था।

धेनुकासुर के उद्धार की कथा सुनने के बाद राजा ने नारदजी से पूछा:- मुने, धेनुकासुर पूर्वजन्म में कौन था, उसे मुक्ति कैसे प्राप्त हुई, तथा उसे गधे का शरीर क्यों मिला, यह सब मुझे ठीक-ठीक बताइये।

श्री नारद जी ने कहा:- विरोचन कुमार बलि का एक बलवान पुत्र था, जिसका नाम था साहसिक।

वह स्त्रियों के साथ गन्धमादन पर्वत पर विहार कर रहा था।

वहाँ वन में नाना प्रकार के वाद्यों तथा रमणियों के नूपूरों का महान शब्द होने लगा, जिससे उस पर्वत की कन्दरा में रहकर श्रीकृष्ण का चिंतन करने वाले दुर्वासा मुनि का ध्यान भंग हो गया, वे खड़ाऊँ पहन कर बाहर निकले।

उस समय मुनिवर दुर्वासा का शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया था, दाढ़ी-मूँछ बहुत बढ़ गयी थी, वे लाठी के सहारे चलते थे। 

क्रोध की तो वे मूर्तिमान राशि ही थे और अग्नि के समान तेजस्वी जान पड़ते थे। 

दुर्वासा उन ऋषियों में से हैं, जिनके शाप के भय से यह सारा विश्व काँपता रहता है।

दुर्वासा ऋषि ने कहा:- दुर्बुद्धि असुर, तू गदहे के समान भोगासक्त है, इसलिये गदहा हो जा।
आज से चार लाख वर्ष बीतने पर दिव्य माथुर-मण्‍डल के अंतर्गत पवित्र तालवन में बलदेवजी के हाथ से तेरी मुक्ति होगी।

नारद जी कहते हैं:- राजन, उस शाप के कारण ही भगवान श्रीकृष्ण ने बलराम जी के हाथ से उसका वध करवाया; क्योंकि उन्होंने प्रह्लाद जी को यह वर दे रखा है कि तुम्हारे वंश का कोई दैत्य मेरे हाथ से नहीं मारा जायगा।

इस प्रकार श्री गर्ग सन्हिता में वृन्दावन खण्‍ड के अंतर्गत ‘धेनुकासुर का उद्धार’ नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ।

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