02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 18 || श्रीकृष्ण के द्वारा गोपदेवी रूप से श्रीराधा के प्रेम की परीक्षा तथा श्रीराधा को श्रीकृष्ण का दर्शन

श्री गर्ग संहिता 
02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 18 || श्रीकृष्ण के द्वारा गोपदेवी रूप से श्रीराधा के प्रेम की परीक्षा तथा श्रीराधा को श्रीकृष्ण का दर्शन

श्री नारद जी कहते हैं:- मिथिलेश्वर, तदनंतर रात व्यतीत होने पर माया से नारी का रूप धारण करने वाले श्रीहरि श्रीराधा का दु:ख शांत करने के लिये वृषभानु भवन में गये। 
उन्हें आया देखकर श्रीराधा उठकर बड़े हर्ष के साथ भीतर लिवा ले गयी और आसन देकर विधि विधान के साथ उनका पूजन किया।

श्रीराधा बोलीं:- "सखी, तुम्हारे बिना मैं रात भर बहुत दु:खी रही और तुम्हारे आ जाने से मुझे इतनी प्रसन्नता हुई है, मानो कोई खोयी हुई वस्तु मिल गयी हो।
जैसे कुपथ्य-सेवन से पहले तो सुख मालूम होता है, किंतु पीछे दु:ख भोगना पड़ता है, इसी तरह सत्संग से भी पहले सुख होता है और पीछे वियोग का दु:ख उठान पड़ता है।"

श्रीनारद जी कहते हैं:- राजन, श्रीराधा की यह बात सुनकर गोपदेवी अनमनी हो गयीं।
वे श्रीराधा से कुछ भी नहीं बोलीं, किसी दु:खिनी की भाँति चुपचाप बैठी रहीं। 
गोपदेवी को खिन्न जानकर श्रीराधिका ने सखियों के साथ विचार करके, स्नेहतत्पर हो, इस प्रकार कहा।

श्रीराधा बोलीं:- "गोपदेवि, तुम अनमनी क्यों हो गयीं, कल्याणि, मुझे इसका कारण बताओ। 
माता, पति, ननद अथवा सास ने कुपित होकर तुम्हें फटकारा तो नहीं है?
मनोहरे, किसी सौत के दोष से या अपने पति के वियोग से अथवा अन्यत्र चित्त लग जाने से तो तुम्हारा मन खिन्न नहीं हुआ है? 
क्या कारण है महाभागे, रास्ता चलने की थकावट से या शरीर में कोई रोग हो जाने से तो तुम्हें खेद नहीं हुआ है, अपने दु:ख का कारण शीघ्र बताओ।
रम्भोरू, किसी कृष्ण भक्त या ब्राह्मण को छोड़कर दूसरे जिस-किसी ने भी तुमसे कोई कुत्सित बात कह दी हो तो मैं उसकी चिकित्सा करूँगी (उसे दण्‍ड दूँगी)। 
यदि तुम्हारी इच्छा हो तो हाथी, घोड़े आदि वाहन, नाना प्रकार के रत्न, वस्त्र, धन और विचित्र भवन मुझसे ग्रहण करो।"
राजेन्द्र, उनका यह प्रेमपूर्ण वचन सुनकर गोपदेवी के रूप में आये हुए भगवान उन कीर्तिनन्दिनी श्रीराधा से हँसते हुए बोले। 

श्री नारद जी कहते हैं:- राजेन्द्र,श्रीराधा का यह प्रेमपूर्ण वचन सुनकर गोपदेवी के रूप में आये हुए भगवान कृष्ण कीर्तिनन्दिनी श्रीराधा से हँसते हुए बोले। 

गोपदेवी ने कहा:- राधे, वरसानुगिरि की घाटियों में जो मनोहर सँकरी गली है, उसी से होकर मैं स्वयं दही बेचने जा रही थी। 
इतने में नन्द जी के नवतरूण कुमार श्यामसुन्दर ने मुझे मार्ग में रोक लिया। 
उनके हाथ में वंशी और बेंत की छड़ी थी, उन रसिकशेखर ने लाज को तिलांजलि दे, तुरंत मेरा हाथ पकड़ लिया और जोर-जोर से हँसते हुए, उस एकांत वन में वे इस प्रकार कहने लगे:- ‘सुन्दरी, मैं कर लेने वाला हूँ, अत: तू मुझे करके रूप में दही का दान दे।’ 

मैंने कहा:- ‘चलो हटो, अपने-आप कर लेने वाले बने हुए तुम- जैसे गोरस-लम्पट को मैं कदापि दान नहीं दूँगी।’ 
मेरे इतना कहते ही उन्होंने सिर पर से दही का मटका उतार लिया और उसे फोड़ डाला।
मटका फोड़कर थोड़ी-सी दही पीकर मेरी चादर उतार ली और नन्दीश्वर गिरि की ईशान कोण वाली दिशा की ओर वे चल दिये, इससे मैं बहुत अनमनी हो रही हूँ। 
जात का ग्वाला, काला-कलूटा रंग, न धनवान, न वीर, न सुशील और न सुरूप, सुशीले! ऐसे पुरुष के प्रति तुमने प्रेम किया, यह ठीक नहीं। 
मैं कहती हूँ, तुम आज से शीघ्र ही उस निर्मोही कृष्ण को मन से निकाल दो (उसे सर्वथा त्याग दो)। 
इस प्रकार वैरभाव से युक्त कठोर वचन सुनकर वृषभानु नन्दिनी श्रीराधा को बड़ा विस्मय हुआ, वे वाक्य और पदों के प्रयोग के सम्बन्ध में सरस्वती के चरणों का स्मरण करती हुई उनसे बोलीं।

श्रीराधा ने कहा:- सखी, जिनकी प्राप्ति के लिये ब्रह्मा और शिव आदि देवता अपनी उत्कृष्ट योग रीति से पंचाग्निसेवनपूर्वक तप करते हैं; दत्तात्रेय, शुक, कपिल, आसुरि और अंगिरा आदि भी जिनके चरणाविन्दों के मकरन्द और पराग का सादर स्पर्श करते हैं; उन्हीं अजन्मा, परिपूर्ण देवता, लीलावतारधारी, सर्वजन-दु:खहारी, भूतल-भूरि-भार-हरणकारी तथा सत्पुरुषों के कल्याण के लिये यहाँ प्रकट हुए आदि पुरुष श्रीकृष्ण की निन्दा कैसे करती हो? तुम तो बड़ी ढीठ जान पड़ती हो। ग्वाले सदा गौओं का पालन करते हैं, गोरज की गंगा में नहाते हैं, उसका स्पर्श करते हैं तथा गौओं का उत्तम नामों का जप करते हैं। 

इतना ही नहीं, उन्हें दिन-रात गौओं के सुन्दर मुख का दर्शन होता है। मेरी समझ में तो इस भूतल पर गोप-जाति से बढ़कर दूसरी कोई जाति ही नहीं है। तुम उसे काला-कलूटा बताती हो; किंतु उन श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण की श्याम-विभा से विलसित सुन्दर कला का दर्शन करके उन्हीं में मन लग जाने के कारण भगवान नीलकण्ठ औरों के सुन्दर मुख को छोड़कर जटाजूट, हलाहल विष, भस्म, कपाल और सर्प धारण किये उस काले-कलूटे के लिये ही पागलों की भाँति व्रज में दौड़ते फिरते हैं।

श्रीराधा जी गोपदेवी बने श्रीकृष्ण से कहती हैं:- "स्वर्गलोक, सिद्ध, मुनि, यक्ष और मरूद्गणों के पालक तथा समस्त नरों, किंनरों और नागों के स्वामी भी निरंतर भक्तिभाव से जिनके चरणाविन्दों में प्रणिपात करके उत्कृष्ट लक्ष्मी एवं ऐश्वर्य को पाकर निश्चय ही उन्हें बलि (कर) समर्पित किया करते हैं, उनको तुम निर्धन कहती हो? 

वत्सासुर, अघासुर, कालिय नाग, बकासुर, यमलार्जुन वृक्ष, तृणावर्त, शकटासुर और पूतना आदि का वध (सम्भवत: तुम्हारी दृष्टि में उनकी वीरता का परिचायक नहीं है, मेरा भी ऐसा ही मत है।) उन मुरारि के लिये क्या यश देने वाला हो सकता है, जो कोटि-कोटि ब्रह्माण्‍ड समूहों के एक मात्र स्नष्टा और संहारक हैं? 

उन पुरुषोत्तम के लिये भक्त से बढ़कर कोई प्रिय हो, ऐसा ज्ञात नहीं होता। शंकर, ब्रह्मा, लक्ष्मी तथा रोहिणीनन्दन बलराम जी भी उनके लिये भक्तों से अधिक प्रिय नहीं हैं, वे भक्ति से बद्धचित्त होकर भक्तों के पीछे-पीछे चलते हैं। 
अत: श्रीकृष्ण केवल सुशील ही नहीं, समस्त लोकों के सुजन-समुदाय के चूड़ामणि हैं। वे भक्तों के पीछे चलते हुए अपने रोम-रोम में स्थित लोकों को पवित्र करते रहते हैं, वे परमात्मा अपने भक्तजनों के प्रति सदा ही अभिरूचि सूचित करते रहते हैं। 

अत: अत्यंत भजन करने वालों को भगवान मुकुन्द मुक्ति तो अनायास दे देते हैं, किंतु उत्तम भक्तियोग कदापि नहीं देते; क्योंकि उन्हें भक्ति के बन्धन में बँधे रहना पड़ता है।"

गोपदेवी बोली:- "श्रीराधे, तुम्हारी बुद्धि बृहस्पति का भी उपहास करती है और वाणी अपने प्रवचन-कौशल से वेदवाणी का अनुकरण करती है।
किंतु देवि, तुम्हारे बुलाने से यदि परमेश्वर श्रीकृष्ण सचमुच यहाँ आ जायँ और तुम्हारी बात का उत्तर दें, तब मैं मान लूँगी कि तुम्हारा कथन सच है।"

श्रीराधा बोलीं:- "शुभ्रु, यदि परमेश्वर श्रीकृष्ण मेरे बुलाने से यहाँ आ जायँ, तब मैं तुम्हारे प्रति क्या करूँ, यह तुम्हीं बताओ।
परंतु अपनी ओर से इतना ही कह सकती हूँ कि यदि मेरे स्मरण करने से वनमाली का शुभागमन नहीं हुआ तो मैं अपना सारा धन और यह भवन तुम्हें दे दूँगी।"

श्री नारद जी कहते हैं:- राजन्, तदनंतर श्रीराधा उठकर श्रीनन्दनन्दन को नमस्कार करके आसन पर बैठ गयीं और उनका ध्यान करने लगीं, उस समय उनके नेत्र ध्यानरत होने के कारण निश्चल हो गये थे। 

गोपदेवी बने श्रीहरि ने देखा:- ‘प्रियतमा श्रीराधा मेरे दर्शन के लिये उत्कण्ठित हैं।
इनके अंग-अंग में स्वेद (पसीना) हो आया है और मुख पर आँसुओं की धारा बह चली है।’ 
यह देख अपना पुरुष रूप धारण करके भक्तवत्सल श्रीकृष्ण सखियों के देखते-देखते सहसा वहाँ प्रकट हो गये और प्रसन्नचित्त हो घनगर्जन के समान गम्भीर वाणी में श्रीराधा से बोलें।

श्रीकृष्ण ने श्रीराधा से कहा:- "रम्भोरू! चन्द्रवदने! व्रज-सुन्दरी-शिरोमणे! नूतनयौवनशालिनि! मानशीले! प्रिये राधे! तुमने अपनी मधुरवाणी से मुझे बुलाया है, इसलिये मैं तुरंत यहाँ आ गया हूँ, अब आँख खोलकर मुझे देखो।
ललने! ‘प्रियतम कृष्ण! आओ’- यह वाक्य यहाँ से प्रकट हुआ और मैंने सुना, फिर उसी क्षण अपने गोकुल और गोपवृन्द को छोड़कर, वंशीवट और यमुना के तट से वेगपूर्वक दौड़ता हुआ तुम्हारी प्रसन्नता के लिये यहाँ आ पहुँचा हूँ। 

मेरे आते ही कोई सखीरूपधारिणी यक्षी, आसुरी, देवांगना अथवा किंनरी, जो कोई भी मायाविनी तुम्हें छलने के लिये आयी थी, यहाँ से चल दी, अत: तुम्हें ऐसी नागिन पर विश्वास ही नहीं करना चाहिये।"

श्रीनारद जी कहते हैं:- तदनंतर श्रीराधा श्रीहरि को देखकर उनके चरण-कमलों में प्रणत हो परमानन्द में निमग्न हो गयीं, उनका मनोरथ तत्काल पूर्ण हो गया। 

श्रीकृष्णचन्द्र के ऐसे अद्भुत चरित्रों का जो भक्ति भाव से श्रवण करता है, वह मनुष्य कृतार्थ हो जाता है।

इस प्रकार श्री गर्ग संहिता में वृन्दावन खण्‍ड के अंतर्गत ‘श्रीराधा को श्रीकृष्णचन्द्र का दर्शन’ नामक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ।

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