02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 22 || गोपांगनाओं श्रीकृष्ण का स्तवन; भगवान का उनके बीच में प्रकट होना; उनके पूछने पर हंसमुनि के उद्धार की कथा सुनाना तथा गोपियों को क्षीरसागर श्वेतद्वीप के नारायण स्वरूपों का दर्शन कराना

श्री गर्ग संहिता
02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 22 || गोपांगनाओं श्रीकृष्ण का स्तवन; भगवान का उनके बीच में प्रकट होना; उनके पूछने पर हंसमुनि के उद्धार की कथा सुनाना तथा गोपियों को क्षीरसागर श्वेतद्वीप के नारायण स्वरूपों का दर्शन कराना

श्री नारद जी कहते हैं:- राजन, इस रोती हुई गोपांगनाओं के बीच में कमल नयन श्रीकृष्ण सहसा प्रकट हो गये, मानो अपना अभीष्ट मनोरथ स्वयं आकर मिल गया हो। 

उनके मस्तक पर किरीट, भुजाओं में केयूर और अंगद तथा कानों में कुण्ड़ल नामक भूषण अपनी दीप्ति फैला रहे थे, स्निग्ध, निर्मल, सुगन्धपूर्ण, नीले, घुँघराले केश-कलाप मन को मोहे लेते थे। 

उन्हें आया हुआ देख समस्त व्रजांगाएँ एक साथ उठकर खड़ी हो गयीं, जैसे शब्दादि सूक्ष्म-भूतों के समूह को देखकर ज्ञानेन्द्रियाँ सहसा सचेष्ट हो जाती हैं।

राजन, उन गोप सुन्दरियों के मध्य भाग में राधा के साथ श्याम सुन्दर श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते हुए इस प्रकार नृत्य करने लगे, मानो रति के साथ मूर्तिमान काम नाच रहा हो। 

जितनी संख्या में समस्त गोपियाँ थी, उतने ही रूप धारण करके श्रीहरि उनके साथ व्रज में रास-विहार करने लगे-, ठीक उसी तरह, जैसे जाग्रत आदि अवस्थाओं के साथ मन क्रीड़ा कर रहा हो। 

उस समय उस वन प्रदेश में दु:ख रहित हुई व्रजांगनाएँ वहाँ खड़े हुए श्याम सुन्दर श्रीकृष्ण से हाथ जोड़ गद्गद वाणी में बोली:- श्याम सुन्दर, जो सारे जगत-को तिनके की भाँति त्याग कर तुम्हारे चरणाविन्दों में अपना तन, मन और प्राण अर्पित कर चुकी हैं, उन्हीं इन गोपियों के इस महान समुदाय को छोड़कर तुम कहाँ चले गये थे?

श्री भगवान बोले:- गोपांगनाओं, पुष्कर द्वीप के दधिमण्डोद समुद्र के भीतर रहकर ‘हंस’ नामक महामुनि तपस्या कर रहे थे। 

वे मेरे ध्यान में रत रहकर बिना किसी हेतु या कामना के भजन करते थे, उन तपस्वी महामुनि को तपस्या करते हुए दो मनवंतर का समय इसी तरह बीत गया।

उन्हें आज ही आधे योजन लम्बा शरीर धारण करने वाला एक मत्स्य निगल गया था, फिर उसे भी मत्स्यरूपधारी महान असुर पौण्ड्र निगल गया। 

इस प्रकार कष्ट में पड़े हुए मुनिवर हंस के उद्धार के लिये मैं शीघ्र वहाँ गया और चक्र से उन दोनों मत्स्यों का वध करके मुनि को संकट से छुड़ाकर श्वेतद्वीप में चला गया। 

व्रजांगनाओं, वहाँ क्षीर सागर के भीतर शेष शय्या पर मैं सो गया था।
फिर अपनी प्रियतमा तुम सब गोपियाँ को दु:खी जान नींद त्याग कर सहसा यहाँ आ पहुँचा; क्योंकि मैं सदा भक्तों के वश में रहता हूँ। 

जो जितेन्द्रिय, समदर्शी तथा किसी भी वस्तु की इच्छा न रखने वाले महान संत हैं, वे निरेपक्षता को ही मेरा परम सुख जानते हैं; जैसे ज्ञानेन्द्रियाँ आदि रस आदि सूक्ष्म भूतों को ही सुख समझते हैं।

गोपियों ने कहा:- माधव, यदि हम पर प्रसन्न हों तो क्षीर सागर में शेष शय्या पर तुमने जो रूप धारण किया था, उसका हमें भी दर्शन कराओ।

श्री नारद जी कहते हैं:- तब ‘तथास्तु’ कहकर भगवान गोपी-समुदाय के देखते-देखते आठ भुजाधारी नारायण हो गये और श्रीराधा लक्ष्मीरूपा हो गयीं।

वहीं चंचल तरंग मालाओं से मण्ड़ित क्षीर सागर प्रकट हो गया, दिव्य रत्नमय मंगलरूप प्रासाद दृष्टिगोचर होने लगे। 

वहीं कमलनाल के सदृश श्वेत शेषनाग कुण्डली बाँधे स्थित दिखायी दिये, जो बाल सूर्य के समान तेजस्वी सहस्त्र फनों के छत्र से सुशोभित थे। 

उस शेषशय्या पर माधव सुख से सो गये तथा लक्ष्मीरूपधारिणी श्रीराधा उनके चरण दबाने की सेवा करने लगीं। 

करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी उस सुन्दर रूप को देखकर गोपियों ने प्रणाम किया और वे सभी परम आश्चर्य में निमग्न हो गयीं।

मैथिल, जहाँ श्रीकृष्ण ने गोपियों को इस रूप में दर्शन दिया था, वह परम पुण्यमय पापनाशक क्षेत्र बन गया।

तदनंतर माधव गोपांगनाओं के साथ यमुना तट पर आकर कालिन्दी के वेग पूर्ण प्रवाह में संतरण-कला-केलि करने लगे। 

श्रीराधा के हाथ से उनका लक्षदल कमल और चादर लेकर माधव पानी में दौड़ते तथा हँसते हुए दूर निकल गये।

तब श्रीराधा भी उनके चमकीले पीताम्बर, वंशी और बेंत लेकर हँसती हुई यमुना जल में चली गयीं। 

अब महात्मा श्रीकृष्ण उन्हें माँगते हुए बोले:- ‘राधे, मेरी बाँसुरी दे दो।’ 

श्रीराधा कहने लगीं:- ‘माधव, मेरा कमल और वस्त्र लौटा दो।’ 

श्रीकृष्ण ने श्रीराधा को कमल और वस्त्र दे दिये, तब श्रीराधा भी महात्मा श्रीकृष्ण को वंशी, पीताम्बर और बेंत लौटा दिये। 

तदनंतर श्रीकृष्ण आजानुलम्बिनी (घुटने तक लटकती हुई) वैजयंती माला धारण किये, मधुर गीता गाते हुए भाण्ड़ीर वन में गये, वहाँ चतुर-चूड़ामणि श्याम सुन्दर ने प्रिया का शृंगार किया। 

भाल तथा कपोलों पर पत्र रचना की, पैरों में महावर लगाया, फूलों की माला धारण करायी, वेणी को भी फूलों से सजाया, ललाट में कुम्कुम की बिन्दी तथा नेत्रों में काजल लगाया। 

इसी प्रकार श्री गर्ग संहिता में वृन्दावन खण्‍ड के अंतर्गत ‘रास-क्रीड़ा’ नामक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ।

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