02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 23 || कंस और शंखचूड़ में युद्ध तथा मैत्री का वृत्तांत; श्रीकृष्ण द्वारा शंखचूड़ का वध
श्री गर्ग संहिता
02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 23 || कंस और शंखचूड़ में युद्ध तथा मैत्री का वृत्तांत; श्रीकृष्ण द्वारा शंखचूड़ का वध
श्री नारद जी कहते हैं:- राजन, तत्पश्चात श्रीकृष्ण व्रजांगनाओं के साथ लोहजंघ-वन में गये, जो वसंत की माधवी तथा अन्यान्य लता-वल्लरियों से व्याप्त था।
उस वन के सुगन्ध बिखरने वाले सुन्दर फूलों के हारों से श्री हरि ने वहाँ समस्त गोपियों की वेणियाँ अलंकृत की।
भ्रमरों की गुंजार से निनादित और सुगन्धित वायु से वासित यमुना तट पर अपनी प्रेयसीयों के साथ श्याम सुन्दर विचरने लगे।
विचरते-विचरते रासेश्वर श्रीकृष्ण उस महापुण्य वन में जा पहुँचे, जो करील, पीलू तथा श्याम तमाल और ताल आदि सघन वृक्षों से व्याप्त था।
वहाँ रासेश्वरी श्रीराधा और गोपांगनाओं के साथ उनके मुख से अपना यशोगान सुनते हुए श्रीहरि ने रास आरम्भ किया।
उस समय वे यश गाती हुई अप्सराओं से घिरे हुए देवराज इन्द्र के समान सुशोभित हो रहे थे।
राजन, वहाँ एक विचित्र घटना हुई, उसे तुम मेरे मुख से सुनो।
शंखचूड़ नाम से प्रसिद्ध एक बलवान यक्ष था, जो कुबेर का सेवक था, इस भूतल-पर उसके समान गदायुद्ध विशारद योद्धा दूसरा कोई नहीं था।
एक दिन मेरे मुँह से उग्रसेन कुमार कंस के उत्कट बल की बात सुनकर वह प्रचण्ड पराक्रमी यक्षराज लाख भार लोहे की बनी हुई भारी गदा लेकर अपने निवास स्थान से मथुरा में आया।
उस मदोन्मत्त वीर ने राज सभा में पहुँच कर वहाँ सिन्हासन पर बैठे हुए कंस को प्रणाम किया और कहा:- राजन, सुना है कि तुम त्रिभुवन विजयी वीर हो; इसलिये मुझे अपने साथ गदा युद्ध का अवसर दो।
यदि तुम विजयी हुए तो मैं तुम्हारा दास जो जाऊँगा और यदि मैं विजयी हुआ तो तत्काल तुम्हें अपना दास बना लूँगा।’
विदेहराज, तब ‘तथास्तु’ कहकर, एक विशाल गदा हाथ में ले, कंस रंगभूमि में शंखचूड़ के साथ युद्ध करने लगा, उन दोनों में घोर गदा युद्ध प्रारम्भ हो गया।
दोनों के परस्पर आघात-प्रत्याघात से होने वाला चट-चट शब्द प्रलय-काल के मेघों की गर्जना और बिजली का गड़गड़ाहट के समान जान पड़ता था।
उस रंग भूमि में दो मल्लों, नाटयमण्डली के दो नटों, विशाल अंग वाले दो गजराजों तथा दो उद्भट सिंहों के समान कंस और शंखचूड़ परस्पर जूझ रहे थे।
राजन, एक-दूसरे को जीत लेने की इच्छा से जूझते हुए उन दोनों वीरों की गदाएँ आग की चिनगारियाँ बरसाती हुई परस्पर टकराकर चूर-चूर हो गयीं।
कंस ने अत्यंत कोप से भरे यक्ष को मुक्के से मारा; तब शंखचूड़ ने भी कंस पर मुक्के से प्रहार किया।
इस तरह मुक्का-मुक्की करते हुए उन दोनों को सत्ताईस दिन बीत गये, दोनों में से किसी का बल क्षीण नहीं हुआ।
दोनों ही एक-दूसरे के पराक्रम से चकित थे, तदनंतर दैत्यराज महाबली कंस ने शंखचूड़ को सहसा पकड़कर बल पूर्वक आकाश में फेंक दिया, वह सौ योजन ऊपर चला गया।
शंखचूड़ आकाश से जब वेगपूर्वक नीचे गिरा तो उसके मन में किंचित व्याकुलता आ गयी तथापि उसने भी कंस को पकड़कर आकाश में दस हजार योजन ऊँचे फेंक दिया।
कंस भी आकाश से गिरने पर मन-ही-मन कुछ व्याकुल हो उठा, फिर उसने यक्ष को पकड़कर सहसा पृथ्वी दे मारा।
फिर शंखचूड़ ने भी कंस को पकड़कर भूमि पर पटक दिया।
इस प्रकार घोर युद्ध चलते रहने के कारण भूमण्डल काँपने लगा, इसी बीच में सर्वज्ञ मुनिवर साक्षात गर्गाचार्य वहाँ आ गये।
दोनों में रंगभूमि में उन्हें देखकर प्रणाम किया, तब गर्ग जी ने ओजस्वनी वाणी में कंस से कहा।
श्री गर्ग जी बोले:- राजेन्द्र, युद्ध न करो; इस युद्ध से कोई फल मिलने वाला नहीं है, यह महाबली शंखचूड़ तुम्हारे समान ही वीर है।
तुम्हारे मुक्के की मार खाकर गजराज ऐरावत ने धरती पर घुटने टेक दिये थे और उसे अत्यंत मूर्च्छा आ गयी थी; और भी बहुत-से दैत्य तुम्हारे मुक्के की मार खाकर मृत्यु के ग्रास बन गये हैं, परंतु शंखचूड़ धराशायी नहीं हो सका, इसमें सन्देह नहीं कि यह तुम्हारे लिये अजेय है।
इसका कारण सुनो; वे परिपूर्णतम परमात्मा जैसे तुम्हारा वध करने वाले हैं, उसी तरह भगवान शिव के वर से बलशाली हुए इस शंखचूड़ को भी मारेंगे।
अत: यदुनन्दन, तुम्हें शंखचूड़ पर प्रेम करना चाहिये और यक्षराज, तुम्हें भी अवश्य ही कंस पर प्रेमभाव रखना चाहिये।
श्री नारद जी कहते हैं:- राजन गर्गाचार्यजी के कहने पर शंखचूड़ तथा कंस दोनों परस्पर गले मिले और एक-दूसरे से अत्यंत प्रेम करने लगे।
तदनंतर कंस से विदा ले शंखचूड़ अपने घर को जाने लगा; रात्रि के समय मार्ग में उसे रासमण्डल मिला।
वहाँ ताल-स्वर से युक्त मनोहर गान उसके कान में पड़ा; फिर उसने रास में श्रीरासेश्वरी के साथ रासेश्वर श्रीकृष्ण का दर्शन किया।
श्री कृष्ण की बायीं भुजा श्रीराधा के कन्धे पर सुशोभित थी, वे स्वेच्छानुसार अपने दाहिने पैर को टेढ़ा किये खड़े थे।
हाथ में वंशी लिये मुख से सुन्दर मन्द हास की छटा छिटका रहे थे, उनके भ्रूमण्डल पर राशि-राशि कामदेव मोहित थे।
व्रज-सुन्दरियों के यूथपति व्रजेश्वर श्रीकृष्ण कोटि-कोटि छत्र-चँवरों से सुसेवित थे।
उन्हें अत्यंत कोमल शिशु जानकर शंखचूड़ ने गोपियों को हर ले जाने का विचार किया।
श्री नारद जी ने कहा:- राजन, शंखचूड़ का मुँह था बाघ के समान और शरीर का रंग था एकदम काला-कलूटा।
वह दस ताड़ के बराबर ऊँचा था और जीभ लपलपाकर जबड़े चाटता हुआ बड़ा भयंकर जान पड़ता था।
उसे देखकर गोपांगनाएँ भय से थर्रा उठीं और चारों ओर भागने लगी, इससे महान कोलाहल होने लगा।
इस प्रकार शंखचूड़ के आते ही रासमण्डल में हाहाकार मच गया।
वह कामपीड़ित दुष्ट यक्षराज शतचन्द्रानना नामवाली गोपसुन्दरी को पकड़कर बिना किसी भय और आशंका के उत्तर दिशा की ओर दौड़ चला।
शतचन्द्रानना भय से व्याकुल हो ‘कृष्ण, कृष्ण’ पुकारती हुई रोने लगी।
यह देख श्रीकृष्ण अत्यंत कुपित हो, शाल का वृक्ष हाथ में लिये, उसके पीछे दौड़े; काल के समान दुर्जय श्रीकृष्ण को पीछा करते देख यक्ष उस गोपी को छोड़कर भय से विह्वल हो प्राण बचाने की इच्छा से भागा।
महादुष्ट शंखचूड़ भागकर जहाँ-जहाँ गया, वहाँ-वहाँ श्रीकृष्ण भी शालवृक्ष हाथ में लिये अत्यंत रोषपूर्वक गये।
राजन, हिमालय की घाटी में पहुँचकर उस यक्षराज ने भी एक शाल उखाड़ लिया और उनके सामने विशेषत: युद्ध की इच्छा से वह खड़ा हो गया।
भगवान ने अपने बाहुबल से शंखचूड़ पर उस शालवृक्ष को दे मारा; उसके आघात से शंखचूड़ आँधी के उखाड़े हुए पेड़ की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा।
शंखचूड़ ने फिर उठकर भगवान श्रीकृष्ण को मुक्के से मारा, मारकर वह दुष्ट यक्ष सम्पूर्ण दिशाओं को निनादित करता हुआ सहसा गरज ने लगा।
तब श्रीहरि ने उसे दोनों हाथों से पकड़ लिया और भुआओं के बल से घुमाकर उसी तरह पृथ्वी पर पटक दिया और वायु उखाड़े हुए कमल को फेंक देती है।
शंखचूड़ ने भी श्रीकृष्ण को पकड़कर धरती पर दे मारा।
जब इस प्रकार युद्ध चलने लगा, तब सारा भूमण्डल काँप उठा; तब माधव श्रीकृष्ण ने मुक्के की मार से उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया और उसकी चूड़ामणि ले ली-ठीक उसी तरह जैसे कोई पुण्यात्मा पुरुष कहीं से निधि प्राप्त कर लेता है।
नरेश्वर, शंखचूड़ के शरीर से एक विशाल ज्योति निकली और दिग्मण्ड़ल को प्रकाशित करती हुई व्रज में श्रीकृष्णसखा श्रीदामा के भीतर विलीन हो गयी।
इस प्रकार शंखचूड़ का वध करके भगवान मधुसूदन, हाथ में मणि लिये, फिर शीघ्र ही रास-मण्डल में आ गये।
दीनवत्सल श्रीहरि ने वह मणि शतचन्द्रानना को दे दी और पुन: समस्त गोपांगनाओं के साथ रास आरम्भ किया।
इस प्रकार श्री गर्ग संहिता में वृन्दावन खण्ड के अंतर्गत रासक्रीड़ा के प्रसंग में ‘शंखचूड़ का वध’ नामक तेइसवाँ अध्याय पूरा हुआ।
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