03. गिरिराजखण्‍ड || अध्याय 02 || गोपों द्वारा गिरिराज पूजन का महोत्‍सव

श्री गर्ग संहिता 
03. गिरिराज खण्‍ड || अध्याय 02 || गोपों द्वारा गिरिराज पूजन का महोत्‍सव

श्रीनारदजी कहते हैं:- साक्षात, श्रीनन्‍दनन्‍दन की यह बात सुनकर श्रीनन्‍द और सन्नन्‍द आदि व्रजेश्‍रगण बड़े विस्मित हुए।
फिर उन्‍होनें इन्द्र की पूजा का निश्‍चय त्‍यागकर श्रीगिरिराज पूजन का आयोजन किया। 
मिथिलेश्‍वर, नन्‍दराज अपने दोनों पुत्र- बलराम और श्रीकृष्‍ण को तथा भेंटपूजा की सामग्री को लेकर यशोदाजी के साथ गिरिराज-पूजन के लिये उत्‍कण्ठित हो प्रसन्‍नातापूर्वक गये; उनके साथ गर्गजी भी थे। 
नन्‍द, उपनन्‍द और वृषभानुगण अपने पुत्रों, पोतों ओर पत्नियों के साथ यज्ञ का सारा संभार लिये गिरिराज के पास आ पहुंचे।
सहस्‍त्रों बालरवि के दीप्ति से प्रकाशित शिबिका में आरूढ़ हो दिव्‍य वस्‍त्रों तथा रत्‍नमय आभूषणों से विभूषित श्रीराधा सुखी-समुदाय के साथ वहां आकर उसी प्रकार सुशोभित हुईं, जैसे शची चकोरी और भ्रमरियों के साथ शोभा पाती हों।
राजन् , श्रीराधा के दोनों बगल में सखियों से आवृत दो सर्वश्रेष्‍ठ चन्‍द्रमुखी सखियां-ललिता और विशाखा-चारू चंवर डुलाती हुई शोभा पाती थीं। 
नरेश्‍वर, इसी प्रकार रमा, विरजा, माधवी, माया, यमुना और गंगा आदि बत्‍तीस सखियां, आठ सखियां, सोलह सखियां और उन सबके यूथ में सम्मिलित असंख्‍य सखियां वहां आयीं। 
मिथिलानिवासिनी, कोसल-प्रदेशवासिनी तथा अयोध्‍यापुर निवासिनी, श्रुतिरूपा, ऋषिरूपा, यज्ञसीता स्‍वरूपा तथा वनवासिनी गोपियों का समुदाय भी वहां उपस्थित हुआ। 
रमा आदि वैकुण्‍ठवासिनी देवियां, वैकुण्‍ड से भी उपर के लोकों में रहने वाली दिव्‍यांगनाएं परम उज्‍जवल श्‍वेतद्वीप की निवासीनी बालाएं और ध्रुवादि लोकों तथा लोकाचल में रहने-वाली देवीरूपा गोपांगनाओं का दल भी वहा आ गया। 

जो समुद्र से उत्‍पन्‍न लक्ष्‍मी की सखियां थीं, दिव्‍य गुणत्रमयी अंगनाएं थीं, अदिव्‍य विमानचारियों की वनिताएं थी, जो ओषधिस्‍वरूपा थी, जो जालन्‍धर के अन्‍त:पुर की स्त्रियां थी, जो समुद्र-कन्‍याएं थीं तथा जो बर्हिष्‍मतीनगरी तथा सुतल आदि लोकों में निवास करने वाली थी, उन समस्‍त दिव्‍यांगनाओं का समुदाय गिरिराज गोवर्धन के पास आकर विराजमान हुआ।
अप्‍सराओं, समस्‍त नाग कन्‍याओं तथा व्रजवासिनियों के यूथ भी वस्‍त्राभूषणों से विभूषित हो, हाथों में पूजन-सामग्री और प्रदीप लिये गिरिराज के पास आ पहुंचे। 
बालक, युवक और वृद्ध गोप भी पीताम्‍बर, पगड़ी तथा मोरपंख से मण्डित तथा सुन्‍दर हार, गुंजा और वनमालाओं से विभूषित हो, नूतन यष्टि तथा वेणु लिये, वहां आकर शोभा पाने लगे।
गिरिराज हिमालय के मुख से उस उत्‍सव का समाचार सुनकर गंगाधर भगवान शिव मस्‍तक पर जटा-जूट बांधे, हाथ में कपाल लिये, अंगों में चिता की भस्‍म लगाये, सर्पों की माला तथा कंगनों से विभूषित हो, गिरिराजनन्दिनी उमा जी के साथ आदि वाहन नन्‍दीश्वर पर आरूढ़ हो, प्रमथगणों से घिरे हुए, गिरिराज-मण्‍डल में आये। 
मुख्‍य–मुख्‍य राजर्षि, ब्रहृार्षि, देवर्षि, सिद्धेश्‍वर, हंस आदि योगेश्‍वर तथा सहस्‍त्रों ब्राह्मणों वृन्‍द गिरिराज का दर्शन करने के लिये आस-पास एकत्र हो गये।

गोवर्धन पर्वत की एक-एक शिला रत्‍नमयी हो गयी; उसके सुवर्णमय श्रृंग चारों ओर अपनी दीप्ति फैलाने लगे। 
राजन् वह पर्वत मतवाले भ्रमरों तथा निर्झर शोभित कन्‍दराओं से उन्‍नतकाय गजराज की शोभा धारण करने लगा। 
उसी समय मेरू और हिमालय आदि गिरीन्‍द्र दिव्‍य रूप धारण करके, भेंट और मांगलिक वस्‍तुएं हाथ में लिये मूर्तिमान गोवर्धन को प्रणाम करने लगे। 
भगवान श्रीकृष्‍ण की बतायी हुई विधि के अनुसार द्विजो द्वारा गोवर्धन-पूजन सम्‍पन्‍न करके, ब्राह्मणों, अगियों तथा गोधन की सम्‍यक पूजा करने के पश्‍चात व्रजेश्‍वर नन्‍द ने गिरिराज की सेवा में बहुत-सा धन तथ बहुमूल्‍य भेंट सामग्री प्रस्‍तुत की। 
नन्‍द, उपनन्‍द, वृषभानु, गोपीवृन्‍द तथा गोपगण नाचने, गाने और बाजे बजाने लगे और भूतलवासी जन-समुदाय लाजा (लावा या खील) छींटने लगा। 
उस यज्ञ में गिरीन्‍द्रों का सम्राट गोवर्धन लागों से घिरकर किसी महाराज के समान सुशोभित होने लगा। 
साक्षात श्रीकृष्‍ण भी व्रज स्थित शैल गोवर्धन के बीच में एक दूसरे विशाल रूप धारण करके निकले और ‘मै गिरिराज गोवर्धन हूं’ यों कहते हुए वहां का सारा अन्‍नकूट भोग लगाने लगे। 
गोपालों और गोपियों के समुदाय में जो मुख्‍य-मुख्‍य लोग थे, उन्‍होंने गिरि का यह प्रभाव अपनी आंखों देखा तथा गिरिराज को वहां वर देने के लिये उद्यत देख सब-के-सब आश्‍चर्य चकित हो उठे, सबके मन में अपूर्व उल्‍लास छा गया।

उस समय गोपों ने कहा:- प्रभो, आज हमने जान लिया कि आप साक्षात गिरिराज देवता हैं; स्‍वयं नन्‍दनन्‍दन ने हमें आपके दर्शन का अवसर दिया है। 
आपकी कृपा से हमारा गोधन और बन्‍धु वर्ग प्रतिदिन इस भूतल पर वृद्धि को प्राप्‍त हो। 
‘ऐसा ही होगा’ यों कहकर किरीट और केयूर आदि आभूषणों से मनोहर अंगवाले दिव्‍यरूपधारी गिरिराजराज गोवर्धन क्षण-भर में वहां उनके निकट ही अन्‍तर्धान हो गये। 
तब नन्‍द-उपनन्‍द, वृषभानु, बलराम, वृषभानुराज सुचन्‍द्र, श्रीनन्‍दराज, श्रीहरि एवं समस्‍त गोप-गोपीगण अपने गोधनों के साथ वहां से चले। 
ब्राह्मण, योगेश्‍वर समुदाय, सिद्धसंघ, शिव आदि देवता तथा अन्‍य सब लोग गिरिराज को प्रणाम और उनका पूजन करके प्रसन्‍नता पूर्वक अनिच्‍छा से अपने-अपने घर को गये। 
राजन् , श्रीकृष्‍णचन्‍द्र के इस उत्‍तम चरित्र का तथा गिरिराज के उस विचित्र महोत्‍सव का मैंने तुम्‍हारे सामने वर्णन किया, यह पावन प्रसंग बड़े-बड़े पापों को हर लेने वाला है।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में गिरिराज खण्‍ड के अन्‍तर्गत श्रीनारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘श्रीगिरिराज महोत्‍सव वर्णन’ नामक दूसरा अध्‍याय पूरा हुआ।

Comments

Popular posts from this blog

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन

21.01 *श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन वृत्त*

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य