03. गिरिराजखण्ड || अध्याय 04 || देवराज इन्द्र द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति तथा सुरभि ओर ऐरावत द्वारा उनका अभिषेक
श्री गर्ग संहिता
03. गिरिराज खण्ड || अध्याय 04 || देवराज इन्द्र द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति तथा सुरभि ओर ऐरावत द्वारा उनका अभिषेक
श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन्, गर्व गल जाने के कारण देवराज इन्द्र देवताओं के साथ उस पर्वत पर आये ओर एकान्त में श्रीकृष्ण को प्रणाम करके उनसे बोले।
इन्द्र ने कहा:- आप देवताओं के भी देवता, सर्वसमर्थ, पूर्ण परमेश्वर, पुराण पुरुष, पुरुषोत्तमोत्तम, प्रकृति से परे तथा परात्पर श्रीहरि हैं।
स्वर्ग के स्वामी जगत्पते, मेरी रक्षा करने के लिये दस अवतार धारण करने वाले भगवान आप ही हैं; इस समय भी आप परिपूर्णतम देवता कंसादि दैत्यराजों के विनाश के लिये ही अवतीर्ण हुए हैं।
आपकी माया से सिजकी चित्तवृति मोहित है, जो मद से उन्मत और अवहेलना का पात्र है, वही मैं आपका अपराधी इन्द्र हूं।
द्युपते, जैसे पिता पुत्र के अपराध को क्षमा कर देता है, उसी प्रकार आप मुझ अपराधी को क्षमा करें।
देवेश्वर, जगन्निवास, मुझ पर प्रसन्न होइये; गोवर्धन को उठाने वाले आप गोविन्द को नमस्कार है; गोकुल निवासी गोपाल को नमस्कार है।
करूणा की निधि तथा ज्रगत के विधाता, विश्व-मंगलकारी तथा ज्रगत के निवास स्थान आप परमात्मा को प्रणाम है।
जो विश्व मोहन तथा करोड़ों कामदेवों के भी मन को मथ देने वाले हैं, उन वृषभानुनन्दिनी के स्वामी नन्दराज कुलदीपक परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्ण को नमस्कार है।
असंख्य ब्रह्माण्डों के पति, गोलोक धाम के अधिपति एवं बलराम के साथ रहने वाले आप साक्षात भगवान श्रीकृष्ण को बारंबार नमस्कार है, नमस्कार है।
श्रीनारदजी कहते हैं:- इन्द्र द्वारा किये गये इस स्तोत्र का जो प्रात:काल उठकर पाठ करेगा, उसे सब प्रकार की सिद्धियां सुलभ होंगी और उसे किसी संकट से भय नहीं होगा।
इस प्रकार भगवान श्रीहरि की स्तुति करके देवराज इन्द्र ने हाथ जोड़कर समस्त देवताओं के साथ उन्हें प्रणाम किया।
इसके बाद क्षीरसागर से उत्पन्न हुई सुरभि गौ ने उस सुरम्य गोवर्धन पर्वत पर आकर अपनी दुग्ध धारा से गोपेश्वर श्रीकृष्ण को स्नान कराया।
फिर मत्त गजराज ऐरावत ने गंगाजल से भरी हुई चार सूंडो द्वारा भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक किया।
राजन्, फिर हर्षोल्लास से भरे हुए सम्पूर्ण देवता, गन्धर्व और किन्नर ऋषियों को साथ ले वेद-मंत्रों के उच्चारणपूर्वक पुष्पवर्षा करते हुए श्रीहरि की स्तुति करने लगे।
भगवान श्रीहरि की स्तुति करके देवराज इन्द्र ने हाथ जोड़कर समस्त देवताओं के साथ उन्हें प्रणाम किया।
इसके बाद क्षीरसागर से उत्पन्न हुई सुरभि गौ ने उस सुरम्य गोवर्धन पर्वत पर आकर अपनी दुग्ध धारा से गोपेश्वर श्रीकृष्ण को स्नान कराया।
फिर मत्त गजराज ऐरावत ने गंगाजल से भरी हुई चार सूंडो द्वारा भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक किया।
राजन् ! श्रीकृष्ण का अभिषेक सम्पन्न हो जाने पर वहा महान पर्वत गोवर्धन हर्ष एवं आनन्द से द्रवीभूत होकर सब ओर बहने लगा; तब भगवान ने प्रसन्न होकर उसके उपर अपना हस्तकमल रखा।
नरेश्वर, उस पर्वत पर भगवान के हाथ का वह चिन्ह आज भी दृष्टिगोचर होता है।
वह परम पवित्र तीर्थ हो गया, जो मनुष्यों के पापों का नाश करनेवाला है, वहीं चरणचिन्ह भी है।
मैथिल, उसे भी परम तीर्थ समझो जहां हस्तचिन्ह है, वहीं उतना ही बड़ा चरणचिन्द भी हुआ।
मैथिल, उसी स्थान पर सुरभि देवी के चरणचिन्ह भी बने गये।
मिथिलेश्वर, श्रीकृष्ण के स्नान के निमित जो आकाश गंगा का जल गिरा, उससे वहीं ‘मानसी गंगा’ प्रकट हो गयीं, जो सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाली हैं।
नरेश्वर, सुरभि की दुग्ध-धाराओं से गोविन्द ने जो स्नान किया, उससे उस पर्वत पर ‘गोविन्द कुण्ड’ प्रकट हो गया, जो बड़े-बड़े पापों को हर लेने वाला परम पावन तीर्थ है।
कभी-कभी उस तीर्थ के जल में दूध का-सा स्वाद प्रकट होता है; उसमें स्नान करके मनुष्य साक्षात गोविन्द के धाम को प्राप्त होता है।
इस प्रकार वहां श्रीहरि की परिक्रमा करके, उन्हें प्रणापूर्वक बलि (पूजोपहार) समर्पित करने के पश्चात, इन्द्र आदि देवता जय-जयकार पूर्वक पुष्प बरसाते हुए बड़े सुख से स्वर्गलोक को लौट गये।
राजेन्द्र, जो श्रीकृष्णाभिषेक की इस कथा को सुनता है, वह दस अश्वमेध यज्ञों के अवभृथ-स्नान से अधिक पुण्य-फल को पाता है; फिर वह परम-विधाता परमेश्वर श्रीकृष्ण के परमपद को प्राप्त होता है।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में गिरिराज खण्ड के अन्तर्गत श्रीनारद बहुलाश्व संवाद में ‘श्रीकृष्ण का अभिषेक’ नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ।
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