03. गिरिराजखण्‍ड || अध्याय 05 || गोपों का श्रीकृष्‍ण के विषय में संदेह मूलक विवाद तथा श्रीनन्‍दराज एवं वृषभानुवर के द्वारा समाधान

श्री गर्ग संहिता
03. गिरिराज खण्‍ड || अध्याय 05 || गोपों का श्रीकृष्‍ण के विषय में संदेह मूलक विवाद तथा श्रीनन्‍दराज एवं वृषभानुवर के द्वारा समाधान

श्रीनारदजी कहते हैं:- एक समय समस्‍त गोपों और गोपियों ने नन्‍दनन्‍दन के उस अद्भूत चरित्र को देखकर यशोदासहित नन्‍द के पास जकार कहा।

गोप बोले:- "हे यशोमय गोपराज, तुम्‍हारे वंश में पहले कभी कोई भी ऐसा बालक नहीं उत्‍पन्‍न हुआ था, जो पर्वत उठा ले; तुम स्‍वयं तो एक शिलाखण्‍ड भी सात दिन तक नहीं उठाये रह सकते। 
कहां तो सात वर्ष का बालक और कहां उसके द्वारा इतने बड़े गिरिराज को हाथ पर उठाये रखना; इससे तुम्‍हारे इस महाबली पुत्र के विषय में हमें शंका होती है। 
जैसे गजराज एक कमल उठा ले और जैसे बालक गोबर-छत्‍ता हाथ में ले ले, उसी तरह इसने खेल-ही-खेल में एक हाथ से गिरिराज को उठा लिया था।

यशोदे, तुम गोरी हो, और नन्‍दजी, तुम भी सुवर्णसदृश गौरवर्ण के हो, किंतु यह श्‍यामवर्ण का उत्‍पन्‍न हुआ है; इसका रूप-रंग इस कुल के लोगों से सर्वथा विलक्षण है। 
यह बालक तो ऐसा है, जैसे क्षत्रियों के कुल में उत्‍पन्‍न हुआ हो। 
बलभद्रजी भी विलक्षण हैं, किंतु इनकी विलक्षणता कोई दोष की बात नहीं है, क्‍योंकि इनका जन्‍म चन्‍द्रवंश में हुआ है। 
यदि तुम सच-सच नहीं बताओगे तो हम तुम्‍हे जाति से बहिष्‍कृत कर देंगे; अथवा यह बताओ कि गोपकुल में इसकी उत्‍पत्ति कैसे हुई, यदि नही बताओगे तो हम से तुम्‍हारा झगड़ा होगा।"

श्रीनारदजी कहते हैं:- गोपों की बात सुनकर यशोदाजी तो भय से कांप उठीं, किंतु उस समय क्रोध से भरे हुए गोपगणों से नन्‍दराज इस प्रकार बोले।

श्रीनन्‍दजी ने कहा:- "गोपगण, मैं एकाग्रचित होकर गर्गजी की कही हुई बात तुम्‍हें बता रहा हूं, जिससे तुम्‍हारे मन की चिन्‍ता और व्‍यथा शीघ्र दूर हो जायगी। 
पहले ‘कृष्‍ण’ शब्‍द के अक्षरों का अभिप्राय सुनो:- ‘ककार’ कमलाकान्‍त का वाचक है, ‘ऋकार’ राम का बोधक है, ‘षकार’ श्‍वेतद्वीप निवासी षड्विध ऐश्‍वर्य गुणों के स्‍वामी भगवान विष्‍णु का वाचक है, ‘णकार’ साक्षात नरसिंह स्‍वरूप है, ‘अकार’ उस अक्षर पुरुष का बोधक है, जो अग्नि को भी पी जाता है। अन्‍त में जो ‘विसर्ग’ नामक दो बिन्‍दु हैं, ये ‘नर’ और नारायण’ ऋषियों के प्रतीक हैं। 
ये छहों पूर्ण तत्‍व जिस परिपूर्णतम परमात्‍मा में लीन हैं, वही साक्षात ‘कृष्‍ण’ है; इसी अर्थ में इस बालक का नाम ‘कृष्‍ण‘ कहा गया है। 
युग के अनुसार इसका वर्ण सत्‍युग में ‘शुक’, त्रेता में ‘रक्‍त’ तथा द्वापर में ‘पीत’ होता आया है; इस समय द्वापर के अन्‍त और कलियुग के आदि में यह बालक ‘कृष्‍ण’ रूप को प्राप्‍त हुआ है, इस कारण से यह नन्‍दनन्‍दन ‘कृष्‍ण’ नाम से विख्‍यात है। 

पांच ज्ञानेन्द्रियां तथा मन, बुद्धि, चित्‍त ये तीन प्रकार के अन्‍त: करण ‘आठ वसु’ कहे गये हैं; इनके अधिष्‍ठाता देवता भी इसी नाम से प्रसिद्ध हैं। 
इन वसुओं में अन्‍तर्यामीरूप से स्थित होकर ये श्रीकृष्‍णदेव ही चेष्‍टा करते हैं, इसलिये इन्‍हें ‘वासुदेव’ कहा गया है।

’वृषभानुनि‍न्‍दनी राधा’ जो कीर्ति के भवन में प्रकट हुई है, उसके साक्षात पति ये ही हैं, इसलिये इन्‍हें ‘राधापति’ भी कहा गया है। 
ये साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्‍ण के असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों के अधिपति हैं और सर्वत्र व्‍यापक होते हुए भी स्‍वरूप से गोलोकधाम में विराजते हैं।"

श्रीनन्‍दजी ने कहा:- "गोपगण, मैं एकाग्रचित होकर गर्गजी की कही हुई बात तुम्‍हें बता रहा हूं, जिससे तुम्‍हारे मन की चिन्‍ता और व्‍यथा शीघ्र दूर हो जायगी। 
उन्होंने कहा ये साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्‍ण के असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों के अधिपति हैं और सर्वत्र व्‍यापक होते हुए भी स्‍वरूप से गोलोकधाम में विराजते हैं। 
वे ही ये भगवान भूतल का भार उतारने, कंसादि दैत्‍यों को मारने तथा भक्‍तों का पालन करने के लिये तुम्‍हारें पुत्र रूप में प्रकट हुए हैं। 
भरतवंशी नन्‍द, इस बालक के अनन्‍त नाम हैं, जो वेदों के लिये भी गोपनीय हैं तथा इसकी लीलाओं के अनुसार और भी बहुत-से नाम विख्‍यात होंगे; अत: इसके कितने ही महान विलक्षण कर्म क्‍यों न हों, उनके सम्‍बन्‍ध में कोई विस्‍मय नहीं करना चाहिये। 
गोपगण, अपने पुत्र के विषय में गर्गजी की कही हुई इस बात को सुनकर मैं कभी संदेह नही करता, क्‍योंकि पृथ्‍वी पर वेद-वाक्‍य और ब्राह्मण-वचन ही प्रमाण हैं’’।

गोप बोले:- यदि महामुनि गर्गाचार्य तुम्‍हारे घर आये थे, तब उसी समय नामकरण-संस्‍कार में तुमने भाई-बन्‍धुओं को क्‍यों नहीं बुलाया?
चुपचाप अपने घर में ही बालक का नामकरण-संस्‍कार कर लिया; यह तुम्‍हारी अच्‍छी रीति है कि सारा कार्य घर में ही गुपचुप कर लिया जाये।

श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन् , यों कहकर क्रोध से भरे हुए गोप नन्‍द मन्दिर से निकलकर वृषभानुवर के पास गये।
वृषभानुवर नन्‍दराज के साक्षात सहायक थे, तथापि इसकी परवाह न करके जातीय संघटन के बल से उन्‍मत्‍त हुए गोप उनके पास जाकर बोले।

गोपों ने कहा:- हे वृषभानुवर, तुम हमारे जाति वर्ग में प्रधान और महामनस्‍वी हो; अत: गोपेश्‍वर भूपाल तुम नन्‍दराज को जाति से अलग कर दो।

वृषभानुवर बोले:- नन्‍दराज का क्‍या दोष है, जिससे मैं उनको त्‍याग दूं; नन्‍दराज तो समस्‍त गोपों के प्रिय, अपनी जाति के मुकुट तथा मेरे भी परम प्रिय हैं।

गोप बोले:- राजन्, महामते, यदि तुम नन्‍दराज को नहीं छोडोगे तो हम सब व्रजवासी तुम्‍हें छोड़ देंगे।
तुम्‍हारे घर में कन्‍या बडी आयु की होकर विवाह के योग्‍य हो गयी है और तुमने हमारी जाति के प्रधान होकर भी धन-सम्‍पत्त्‍िा के मद से मतवाले हो अब तक उसे किसी श्रेष्‍ठ वर के हाथ में नहीं सौंपा है, इसलिये तुम्‍हारे उपर पाप चढ़ा हुआ है। 
महामते नरेश, आज से हम तुम्‍हें जाति भ्रष्‍ट तथा अपने से अलग मान लेंगे, नहीं तो शीघ्र नन्‍दराज को छोड़ दो, छोड़ दो।

वृषभानुवर ने कहा:- गोपगण, मैं एकाग्रचित्‍त होकर गर्गजी की कही हुई बात बता रहा हूँ, जिससे शीघ्र ही तुम्‍हारी चिन्‍ता-व्‍यथा दूर हो जायेगी। 

उन्‍होनें बताया- 'असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों के अधिपति, लोकेश्‍वर, परात्‍पर भगवान श्रीकृष्‍ण नन्‍दगृह में बालक होकर अवतीर्ण हुए हैं; उनसे बढ़कर श्रीराधा के लिये कोई वर नहीं है। 
ब्रह्माजी की प्रार्थना से भूमिका भार उतारने ओर कंसादि के वध करने के लिये भूतल पर श्रीकृष्‍ण का अवतार हुआ है। 
गोलोक में 'श्रीराधा' नाम की जो श्रीकृष्‍ण की पटरानी हैं, वे ही तुम्‍हारी घर में कन्‍या रूप से अवतीर्ण हुई हैं; उन 'परा देवी' को तुम नहीं जानते।

मैं इन दोनों का विवाह नहीं कराउंगा, इनका विवाह यमुनातट पर भाण्‍डीर-वन में होगा।
वृन्‍दावन के समीप निर्जन सुन्‍दर स्‍थल में साक्षात ब्रह्माजी पधारकर श्रीराधा तथा श्रीकृष्‍ण विवाह-कार्य सम्‍पन्‍न करायेंगे। 
अत: गोपप्रवर, तुम श्रीराधा को लोकचूडामणि साक्षात परमात्‍मा श्रीकृष्‍ण की अर्धांगस्‍वरूप एवं गोलोक धाम की महारानी समझो। 

तुम समस्‍त गोपगण भी गोलोक में इस भूतल पर आये हो; इसी तरह गोपियां और गौएं भी श्रीराधा की इच्‍छा से ही गोलोक से गोकुल में आयी है।' 
यों कहकर साक्षात महामुनि गर्गाचार्य जब चले गये, उसी दिन से श्रीराधा के विषय में मैं कभी कोई संदेह या शंका नहीं करता, इस भूतल पर ब्राह्मण वचन वेदवाक्‍यवत प्रमाण हैं। 
गोपों, यह सब रहस्‍य मैंने तुम्‍हें सुना दिया, अब और क्‍या सुनना चाहते है?

इस प्रकार श्रीगर्ग-संहिता में गिरिराज खण्डं के अन्तहर्गत श्रीनारद बहुलाश्व् संवाद में ‘गोप विवाद’ नामक पाचवां अध्याय पूरा हुआ।

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