03. गिरिराजखण्ड || अध्याय 09 || गिरिराज गोवर्धन की उत्‍पत्ति का वर्णन

श्री गर्ग संहिता
03.  गिरिराजखण्ड || अध्याय 09 || गिरिराज गोवर्धन की उत्‍पत्ति का वर्णन

बहुलाश्‍व ने पूछा:- देवर्षे, महान आश्‍चर्य की बात है, गोवर्धन साक्षात पर्वतों का राजा एवं श्रीहरि को बहुत ही प्रिय है; उसके समान दूसरा तीर्थ न तो इस भूतल पर है और न स्‍वर्ग में ही। 
महमते, आप साक्षात श्रीहरि के हृदय हैं अत: अब यह बताइये कि यह गिरिराज श्रीकृष्‍ण के वक्ष:स्‍थल से कब प्रकट हुआ?

श्रीनारदजी ने कहा:- ‘राजन, महामते,, गोलोक के प्राकट्य वृतान्‍त सुनो; यह श्री‍हरि की आदि लीला से सम्‍बन्‍ध है और मनुष्‍यों को धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष- चारों पुरुषार्थ करने वाला है। 
प्रकृति से परे विद्यमान साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्‍ण सर्वसमर्थ, निर्गुण पुरुष एवं अनादि आत्‍मा हैं।
उनका तेज अन्‍तर्मुखी है, वे स्‍वयं प्रकाश प्रभु निरन्‍तर रमणशील हैं, जिन पर धामाभिमानी गणनाशील देवताओं का ईश्‍वर 'काल' भी शासन करने में समर्थ नहीं है। 
राजन, माया भी जिन पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती, उन पर महत्‍तत्‍व और सत्‍त्‍वादि गुणों का वश तो चल ही कैसे सकता है।
राजन, उनमें कभी मन, चित्‍त, बुद्धि और अहंकार का भी प्रवेश नहीं होता; उन्‍होनें अपने संकल्‍प से अपने ही स्‍वरूप में साकार ब्रह्म को व्‍यक्‍त किया। 
सबसे पहले विशालकाय शेषनाग का प्रादुर्भाव हुआ, जो कमलनाल के समान श्‍वेतवर्ण के हैं; उन्‍हीं की गोद में लोकवन्दित महालोक गोलोक प्रकट हुआ, जिसे पाकर भक्तियुक्‍त पुरुष फिर इस संसार में नहीं लौटता। 
फिर असंख्‍य ब्रह्मण्‍डों के अधिपति गोलोकनाथ भगवान श्रीकृष्‍ण के चरणारविन्‍द से त्रिपथगा गंगा प्रकट हुई।
नरेश्‍वर, तत्‍पश्‍चात् श्रीकृष्‍ण के बायें कंधे से सरिताओं में श्रेष्‍ठ यमुनाजी का प्रादुर्भाव हुआ, जो श्रृंगार-कुसुमों से उसी प्रकार सुशोभित हुई, जैसे छपी हुई पगड़ी के वस्‍त्र की शोभा होती है। 
तदनन्‍तर भगवान श्रीहरि के दोनों गुल्‍फों (टखनों या घुट्ठियों) से हेमरत्‍नों से युक्‍त दिव्‍य रासमण्‍डल और नाना प्रकार के श्रृंगार-साधनों के समूह का प्रादुर्भाव हुआ। 

इसके बाद महात्‍मा श्रीकृष्‍ण की दोनों पिं‍डलियों से निकुंज प्रकट हुआ, जो सभा भवनों, आँगनों, गलियों और मण्‍डपों से घिरा हुआ था। 
वह निकुंज वसन्‍त की माधुरी धारण किये हुए था, उसमें कूजते हुए कोकिलों की काकली सर्वत्र व्‍याप्‍त थी; मोर, भ्रमर तथा विविध सरोवरों से भी वह परिशोभित एवं परिसेवित दिखायी देता था। 
राजन, भगवान के दोनों घुटनों से सम्‍पूर्ण वनों में उत्‍तम श्री वृन्‍दावन का आविर्भाव हुआ; साथ ही उन साक्षात परमात्‍मा की दोनों जाँघों से लीला सरोवर प्रकट हुआ। 
उनके कटिप्रदेश से दिव्‍य रत्‍नों द्वारा जटित प्रभामयी स्‍वर्ण भूमिका प्राकट्य हुआ ओर उनके उदर में जो रोमावलियाँ हैं, वे ही विस्‍तृत माधवी लताएँ बन गयीं। 
उन लताओं मे नाना प्रकार के पक्षियों के झूंड सब ओर फैलकर कलरव कर रहे थे। 
गुंजार करते हुए भ्रमर उन लता-कुंजों की शोभा बढ़ा रहे थे, वे लताएँ सुन्‍दर फूलों और फलों के भार से इस प्रकार झुकी हुई थीं, जैसे उत्‍तम कुल की कन्‍याएँ लज्‍जा और विनय के भार से नतमस्‍तक रहा करती हैं। 
भगवान के नाभिकमल से सहस्‍त्रों कमल प्रकट हुए, जो हरिलोक के सरोवरों में इधर-उधर सुशोभित हो रहे थे।
भगवान के त्रिवली-प्रान्‍त से मन्‍दगामी और अत्‍यन्‍त शीतल समीर प्रकट हुआ और उनके गले की हँसी से 'मथुरा' तथा 'द्वारका'- इन दो पुरियों का प्रादुर्भाव हुआ।

श्रीहरि की दोनों भुजाओं से 'श्रीदामा' आदि आठ पार्षद उत्‍पन्‍न हुए।
कलाइयों से 'नन्‍द' और कराग्रभाग से 'उपनन्‍द' प्रकट हुए तथा श्रीकृष्‍ण की भुजाओं के मूल-भागों से समस्‍त वृषभानुओं का प्रादुर्भाव हुआ। 
नरेश्‍वर, समस्‍त गोपगण श्रीकृष्‍ण के रोम से उत्‍पन्‍न हुए हैं।
श्रीकृष्‍ण के मन से गौओं तथा धर्म धुरंधर वृषभों का प्राकट्य हुआ।
मैथिलेश्‍वर, उनकी बुद्धि से घास और झाड़ियां प्रकट हुईं।
भगवान के बायें कंधे से एक परम कान्तिमान गौर तेज प्रकट हुआ, जिससे लीला, श्री, भूदेवी, विरजा तथा अन्‍याय हरिप्रियाएँ आविर्भूत हुईं। 
भगवान की प्रियतमा जो 'श्रीराधा' हैं, उन्‍हीं को दूसरे लोग 'लीलावती' या 'लीला' के नाम से जानते हैं। 
श्रीराधा की दोनों भुजाओं से 'विशाखा' और 'ललिता'- इन दो सखियों का आविर्भाव हुआ। 
नरेश्‍वर, दूसरी-दूसरी जो सहचरी गोपियाँ हैं, वे सब राधा के रोम से प्रकट हुई हैं।
इस प्रकार मधुसूदन ने गोलोक की रचना की।

राजन, इस तरह अपने सम्‍पूर्ण लोक की रचना करके असंख्‍य ब्रह्मण्‍डों के अधिपति, परात्‍पर, परमात्‍मा, परमेश्‍वर, परिपूर्ण देव श्रीहरि वहाँ श्रीराधा के साथ सुशोभित हुए। 
उस गोलोक में एक दिन सुन्‍दर रासमण्‍डल में, जहाँ बजते हुए नूपुरों का मधुर शब्‍द गूँज रहा था, जहाँ का आँगन सुन्‍दर छत्र में लगी हुई मुक्‍ताफल की लडियों से अमृत की वर्षा होती रहने के कारण रस की बड़ी-बड़ी बूँदों से सुशोभित था।
मालती के चँदोवों से स्‍वत: झरते हुए मकरन्‍द और गन्‍ध से सरस एवं सुवासित था, जहाँ मृदंग, तालध्‍वनि और वंशीनाद सब और व्‍याप्‍त था, जो मधुरकण्‍ठ से गाये गये गीत आदि के कारण परम मनोहर प्रतीत होता था तथा सुन्‍दरियों के रासरस से परिपूर्ण एवं परम मनोरम था।
उसके मध्‍यभाग में स्थित कोटिमनोजमोहन हृदय वल्‍लभ से श्रीराधा ने रसदान-कुशल कटाक्षपात करके गंभीर वाणी में कहा।

श्रीराधा बोलीं:- जगदीश्‍वर, यदि आप रास में मेरे प्रेम से प्रसन्न हैं तो मैं आपके सामने अपने मन की प्रार्थना व्‍यक्‍त करना चाहती हूँ।

श्रीभगवान बोले:- प्रिये, वामोरू,, तुम्‍हारे मन में इच्‍छा हो, मुझसे माँग लो; तुम्‍हारे प्रेम के कारण मैं तुम्‍हें अदेय वस्‍तु भी दे दूँगा।

श्रीराधा ने कहा:- वृन्‍दावन में यमुना के तटपर दिव्‍य निकुंज पार्श्‍व भाग में आप रास रस के योग्‍य कोई एकान्‍त एवं मनोरम स्‍थान प्रकट कीजिये, देवदेव यही मेरा मनोरथ है।

नारदजी कहते हैं:- राजन, तब ‘तथास्‍तु‘ कहकर भगवान ने एकान्‍तलीला के योग्‍य स्‍थान का चिन्‍तन करते हुए नेत्र-कमलों द्वारा अपने हृदय की ओर देखा। 
उसी समम गोपी-समुदाय के देखते-देखते श्रीकृष्‍ण के हृदय से अनुराग के मूर्तिमान अंकुर की भांति एक सघन तेज प्रकट हुआ और रासभूमि में गिरकर वह पर्वत के आकर में बढ़ गया। 
वह सारा-का-सारा दिव्‍य पर्वत रत्‍नधातुमय था, सुन्‍दर झरनों और कन्‍दराओं से उसकी बड़ी शोभा थी। 
कदम्‍ब, बकुल, अशोक आदि वृक्ष तथा लता-जाल उसे और भी मनोहर बना रहे थे। 
मन्‍दार और कुन्‍दवृन्‍द से सम्‍पन्‍न उस पर्वत पर भाँति-भाँति के पक्षी कलरव कर रहे थे। 

विदेहराज, एक ही क्षण में वह पर्वत एक लाख योजना विस्‍तृत और शेष की तरह सौ कोटि योजन लंबा हो गया, उसकी ऊंचाई पचास करोड़ योजन की हो गयी। 
पचास कोटि योजना में फैला हुआ वह पर्वत सदा के लिये गजरा के समान स्थित दिखायी देने लगा।
मैथिल, उसके कोटि योजन विशाल सैकड़ों शिखर दीप्तिमान होने लगे; उन शिखरों से गोवर्धन पर्वत उसी प्रकार सुशोभित हुआ, मानो सुवर्णमय उन्‍नत कलशों से कोई ऊंचा महल शोभा पा रहा हो। 

कोई-कोई विद्वान उस गिरि को गोवर्धन और दूसरे लोग ‘शतश्रृंग’ कहते हैं।
इतना विशाल होने पर भी वह पर्वत मन से उत्‍सुक-सा होकर बढ़ने लगा; इससे गोलोक भय से विहवल हो गया और वहाँ सब ओर कोलाहल मच गया। 
यह देख श्रीहरि उठे और अपने साक्षात हाथ से शीघ्र ही उसे ताड़ना दी और बोले:- ‘अरे प्रच्‍छन्‍न रूप बढ़ता क्‍यों जा रहा है, सम्‍पूर्ण लोक को आच्‍छादित करके स्थित हो गया, क्‍या ये लोक यहाँ निवास नहीं करना चाहते? 
यों कहकर श्रीहरि ने उसे शांत किया-उसका बढ़ना रोक दिया।
उस उत्‍तम पर्वत को प्रकट हुआ देख भगवत्प्रिया श्रीराधा बहुत प्रसन्‍न हई। 
राजन, वे उसके एकान्‍तस्‍थल में श्रीहरि के साथ सुशोभित होने लगीं।
इस प्रकार यह गिरिराज साक्षात श्रीकृष्‍ण से प्रेरित होकर इस व्रजमण्‍डल में आया है, यह सर्वतीर्थमय है। 
लता-कुंजों से श्‍याम आभा धारण करने वाला यह श्रेष्‍ठ गिरि मेघ की भाँति श्‍याम तथा देवताओं का प्रिय है।श
भारत से पश्चिम दिशा में शाल्‍मलि द्वीप के मध्‍यभाग में द्रोणचाल की पत्‍नी के गर्भ से गोवर्धन ने जन्‍म लिया, महर्षि पुलस्‍त्‍य उसको भारत के व्रजमण्‍डल में ले आये।
विदेहराज, गोवर्धन के आगमन की बात मैं तुमसे पहले निवेदन कर चुका हूँ।
जैसे यह पहले गोलोक में उत्‍सुकतापूर्वक बढ़ने लगा था उसी तरह यहाँ भी बढ़े तो वह पृथ्‍वी तक के लिये एक ढक्‍कन बन जायेगा, यह सोचकर मुनि ने द्रोण पुत्र गोवर्धन को प्रतिदिन क्षीण होने का शाप दे दिया।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में गिरिराज खण्‍ड के अन्‍तर्गत श्रीनारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘गिरिराज की उत्‍पति’ नामक नवां अध्‍याय पूरा हुआ।

Comments

Popular posts from this blog

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन

21.01 *श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन वृत्त*

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य