04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 09 || पूर्वकाल में एकादशी का व्रत करके मनोवांछित फल पाने वाले पुण्‍यात्‍माओं का परिचय तथा यज्ञसीता स्‍वरूपा गोपिकाओं को एकादशी व्रत के प्रभाव से श्रीकृष्‍ण सांनिध्‍य की प्राप्ति

श्री गर्ग संहिता
04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 09 || पूर्वकाल में एकादशी का व्रत करके मनोवांछित फल पाने वाले पुण्‍यात्‍माओं का परिचय तथा यज्ञसीता स्‍वरूपा गोपिकाओं को एकादशी व्रत के प्रभाव से श्रीकृष्‍ण सांनिध्‍य की प्राप्ति

गोपियाँ बोलीं:- सम्‍पूर्ण शास्‍त्रों के अर्थज्ञान में पारंगत सुन्‍दरी वृषभानु नन्दिनी, तुम अपनी वाणी से बृहस्‍पति मुनि की वाणी का अनुकरण करती हो। 
राधे, यह एकादशी-व्रत पहले किसने किया था? यह हमें विशेष रूप से बताओ, क्‍योंकि तुम साक्षात ज्ञान की निधि हो।

श्रीराधा ने कहा:- गोपियो, सबसे पहले देवताओं ने अपने छीने गये राज्‍य की प्राप्ति तथा दैत्‍यों के विनाश के मिले एकादशी व्रत का अनुष्‍ठान किया था। 
राजा वैशन्‍त ने पूर्वकाल में यमलोकगत पिता के उद्धार के लिये एकादशी-व्रत किया था।
लुम्‍पक नाम के एक राजा को उसके पाप के कारण कुटुम्‍बीजनों ने अकस्‍मात त्‍याग दिया था, लुम्‍पक ने भी एकादशी का व्रत किया और उसके प्रभाव से अपना खोया हुआ राज्‍य प्राप्‍त कर लिया। 
भद्रावती नगरी में पुत्रहीन राजा के तुमान् ने संतों के कहने से एकादशी-व्रत का अनुष्‍ठान किया और उन्‍हें पुत्र की प्राप्ति हो गयी। 

एक ब्राह्मणी को देवपत्नियों ने एकादशी व्रत का पुण्‍य प्रदान किया, जिससे उस मानवी ने धन-धान्‍य तथा स्‍वर्ग का सुख प्राप्‍त किया।
पुष्‍पदन्‍ती और माल्‍यवान- दोनों इन्‍द्र के शाप से पिशाच भाव को प्राप्‍त हो गये थे, उन दोनों ने एकादशी का व्रत किया और उसके पुण्‍य-प्रभाव से उन्‍हें पुन: गन्‍धर्वत्‍व की प्राप्ति हो गयी। 
पूर्वकाल में श्रीरामचन्‍द्रजी ने समुद्र सेतु बाँधने तथा रावण का वध करने के लिये एकादशी का व्रत किया था।
प्रलय के अन्‍त में उत्‍पन्‍न हुए आँवले के वृक्ष के नीचे बैठकर देवताओं ने सबके कल्‍याण के लिये एकादशी का व्रत किया था। 
पिता की आज्ञा से मेधावी ने एकादशी का व्रत किया, जिससे वे अप्‍सरा के साथ सम्‍पर्क के दोष से मुक्‍त हो निर्मल तेज से सम्‍पन्‍न हो गये। 

ललित नामक गन्‍धर्व अपनी पत्‍नी के साथ ही शापवश राक्षस हो गया था, किन्‍तु एकादशी-व्रत के अनुष्‍ठान से उसने पुन: गन्‍धर्वत्‍व प्राप्‍त कर लिया।
एकादशी के व्रत से ही राजा मांधाता, सगर, कुकुत्‍स्‍थ और महामति मुचुकुन्‍द पुण्‍यलोक को प्राप्‍त हुए। 
धुन्‍धुमार आदि अन्‍य बहुत-से राजाओं ने भी एकादशी-व्रत के प्रभाव से ही सद्गति‍ प्राप्‍त की तथा भगवान शंकर ब्रह्मकपाल से मुक्‍त हुए। 
कुटुम्‍बीजनों से परित्‍यक्‍त महादुष्‍ट वैश्‍य–पुत्र धृष्‍ट बुद्धि एकादशी व्रत करके ही वैकुण्‍ठलोक में गया था। 

राजा रूकमांगद ने भी एकादशी का व्रत किया था और उसके प्रभाव से भूमण्‍डल का राज्‍य भोगकर वे पुरवासियों सहित वैकुण्‍ठ लोक में पधारे थे। 
राजा अम्‍बरीष ने भी एकादशी का व्रत किया था, जिससे कहीं भी प्रतिहत न होने वाला ब्रह्मशाप उन्‍हें छू न सका।
हेमामाली नामक यक्ष कुबेर के शाप से कोढी हो गया था, किंतु एकादशी-व्रत का अनुष्‍ठान करके वह पुन: चन्‍द्रमा के समान कान्तिमान हो गया। 
राजा महीजित ने भी एकादशी का व्रत किया था, जिसके प्रभाव से सुन्‍दर पुत्र प्राप्‍तकर वे स्‍वयं भी वैकुण्‍ठगामी हुए। 

राजा हरिशचन्‍द्र ने भी एकादशी का व्रत किया था, जिससे पृथ्‍वी का राज्‍य भोगकर वे अन्‍त में पुरवासियों सहित वैकुण्‍ठ-धाम को गये। 
पूर्वकाल के सत्‍ययुग में राजा मुचुकुन्‍द का दामाद शोभन भारतवर्ष में एकादशी का उपवास करके उसके पुण्‍य-प्रभाव से देवताओं के साथ मन्‍दराचल पर चला गया, वह आज भी वहाँ अपनी रानी चन्‍द्रभागा के साथ कुबेर की भाँति राज्‍य सुख भोगता है। 
गोपियो, एकादशी को सम्‍पूर्ण तिथियों की परमेश्वरी समझो, उसकी समानता करने वाली दूसरी कोई तिथि नहीं है।

श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, श्रीराधा के मुख से इस प्रकार एकादशी की महिमा सुनकर यज्ञसीता-स्‍वरूपा गोपिकाओं ने श्रीकृष्‍ण-दर्शन की लालसा से विधिपूर्वक एकादशी व्रत का अनुष्‍ठान किया। 
एकादशी व्रत से प्रसन्‍न हुए साक्षात भगवान श्रीहरि ने मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा की रात में उन सबके साथ रास किया।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में माधुर्य खण्‍ड के अन्‍तर्गत श्रीनारद बहुलाश्व संवाद में यज्ञसीतोपाख्‍यान के प्रसंग में ‘एकादशी का माहात्‍म्‍य’ नामक नवाँ अध्‍याय पूरा हुआ

Comments

Popular posts from this blog

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन

21.01 *श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन वृत्त*

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य