03. गिरिराजखण्ड || अध्याय 10 || गोवर्द्धन-शिला के स्पर्श से एक राक्षस का उद्धार तथा दिव्यरूपधारी उस सिद्ध मुख से गोवर्द्धन की महिमा का वर्णन
श्रीगर्ग संहिता
03. गिरिराजखण्ड || अध्याय 10 || गोवर्द्धन-शिला के स्पर्श से एक राक्षस का उद्धार तथा दिव्यरूपधारी उस सिद्ध मुख से गोवर्द्धन की महिमा का वर्णन
श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, इस विषय में एक पुराने इतिहास का वर्णन किया जाता है, जिसके श्रवण-मात्र से बडे़-बडे़ पापों का विनाश हो जाता है।
गौतमी गंगा (गोदावरी) के तट पर विजय नाम से प्रसिद्ध एक ब्राह्मण रहता था।
वह अपना ऋण वसूल करने के लिए पापनशिनी मथुरापुरी में आया।
अपना कार्य पूरा करके जब वह घर को लौटने लगा, तब गोवर्द्धन के तट पर गया।
मिथिलेश्वर, वहाँ उसने एक गोल पत्थर ले लिया और धीरे-धीरे वन प्रान्त में होता हुआ जब वह व्रजमण्डल से बाहर निकल गया, तब उसे अपने सामने से आता हुआ एक घोर राक्षस दिखायी दिया।
उस राक्षस का मूँह उसकी छाती में था, उसके तीन पैर और छ: भुजाएँ थीं, परंतु हाथ तीन ही थे, ओठ बहुत ही मोटे और नाक एक हाथ उँची थी।
उसकी सात हाथ लंबी जीभ लपलपा रही थी, रोएँ काँटो के समान थे, आँखे बड़ी-बड़ी और लाल थीं, दाँत टेढ़े-मेढ़े और भयंकर थे।
राजन, वह राक्षस बहुत भूखा था, अत: 'घुर-पुर' शब्द करता हुआ वहाँ खड़े हुए ब्राह्मण के सामने आया।
ब्राह्मण ने गिरिराज के पत्थर से उस राक्षस को मारा, गिरिराज शिला का स्पर्श होते ही वह राक्षस-शरीर छोड़कर श्यामसुन्दर रूपधारी हो गया।
उसके विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमल पत्र के समान शोभा पाने लगे, वनमाला, पीताम्बर, मुकुट और कुण्डलों से उसकी बड़ी शोभा होने लगी।
हाथ में वंशी और बेंत लिये वह दूसरे कामदेव समान प्रतीत होने लगा।
इस प्रकार दिव्यरूपधारी होकर उसने दोनों हाथ जोड़कर ब्राह्मण देवता को बारंबार प्रणाम किया।
सिद्ध बोला:- ब्राह्मण श्रेष्ठ, तुम धन्य हो, क्योंकि दूसरों को संकट से बचाने के पुण्य कार्य में लगे हुए हो।
महामते, आज तुमने मुझे राक्षस की योनि से छुटकारा दिला दिया; इस पाषाण के स्पर्श मात्र से मेरा कल्याण हो गया, तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मेरा उद्धार करने में समर्थ नहीं था।
ब्राह्मण बोले:- सुव्रत, मैं तो तुम्हारी बात सुनकर आश्चर्य में पड़ गया हूँ।
मुझमें तुम्हारा उद्धार करने की शक्ति नहीं है, पाषाण के स्पर्श का क्या फल है, यह भी मैं नहीं जानता, अत: तुम्हीं बताओ।
सिद्ध ने कहा:- ब्रह्मन, श्रीमान गिरिराज गोवर्धन पर्वत साक्षात श्रीहरि का रूप है।
विप्रवर, केदार तीर्थ में पाँच हजार वर्षों तक तपस्या करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, वही फल गोवर्द्धन पर्वत पर तप करने से मनुष्य को क्षण भर में प्राप्त हो जाता है।
मलयाचल पर एक भार स्वर्ण का दान करने से जिस पुण्य फल की प्राप्ति होती है, उससे कोटिगुना पुण्य गिरिराज पर एक माशा सुवर्ण का दान करने से ही मिल जाता है।
जो मंगल प्रस्थ पर्वत पर सोने की दक्षिणा देता है, वह सैकड़ों पापों से युक्त होने पर भगवान विष्णु का सारूप्य प्राप्त कर लेता है।
भगवान के उसी पद को मनुष्य गिरिराज का दर्शन करने मात्र से पा लेता है, गिरिराज के समान पुण्य तीर्थ दूसरा कोई नहीं है।
ऋषभ पर्वत, कूटक पर्वत तथा कोलक पर्वत पर सोने से मढ़े सींग वाली गौओं का जो दान करता है, वह भी ब्राह्मणों का यत्नपूर्वक पूजन करके महान पुण्य का भागी होता है।
ब्रह्मन, उसकी अपेक्षा भी लाखगुना पुण्य गोवर्द्धन पर्वत की यात्रा करने मात्र से सुलभ होता है।
ऋष्यमूक, सह्यगिरि तथा देवगिरि की एवं सम्पूर्ण पृथ्वी की यात्रा करने पर मनुष्य जिस पुण्य फल को पाता है, गिरिराज गोवर्धन की यात्रा करने पर उससे भी कोटिगुना अधिक फल उसे प्राप्त हो जाता है।
अत: गिरिराज समान तीर्थ न तो पहले कभी हुआ है और न भविष्य में होगा ही।
श्रीशैल पर दस वर्षों तक रहकर वहाँ के विद्याधर कुण्ड में जो प्रतिदिन स्नान करता है, वह पुण्यात्मा मनुष्य सौ यज्ञों के अनुष्ठा का फल पा लेता है, परंतु गोवर्द्धन पर्वत के पुच्छ कुण्ड में एक दिन स्नान करने वाला मनुष्य कोटियज्ञों के साक्षात अनुष्ठा का पुण्य फल पा लेता हैं, इसमें संशय नहीं है।
इस गोवर्द्धन पर्वत पर जो यज्ञ करके उत्तम दक्षिणा देता है, वह स्वर्गलोग के मस्तक पर पैर रखकर भगवान विष्णु के धाम में चला जाता है।
गोवर्धन पर तीर्थ में जो स्नानादि शुभकर्म किया जाता है वह सब अनन्तगुना हो जाता है।
जो भगवान श्रीकृष्ण में मन लगाकर निर्मल गोविन्द कुण्ड में स्नान करता है, वह भगवान श्रीकृष्ण में मन लगाकर निर्मल गोविन्द कुण्ड में स्नान करता है, भगवान श्रीकृष्ण का सारूप्य प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है।
हमारे गोवर्द्धन पर्वत पर जो मानसी गंगा है, उनमें डुबकी लगाने की समानता करने वाले सहस्त्रों अश्वमेध यज्ञ तथा सैकड़ों राजसूय यज्ञ भी नहीं हैं।
विप्रवर, आपने साक्षात गिरिराज का दर्शन, स्पर्श तथ वहाँ स्नान किया है, अत: इस भूतल पर आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है।
यदि आपको विश्वास न हो तो मेरी ओर देखिये, मैं बहुत बड़ा महापात की था, किंतु गोवर्द्धन की शिला का स्पर्श होने मात्र से मैंने भगवान श्रीकृष्ण का सारूप्य प्राप्त कर लिया।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में गिरिराज खण्ड के अन्तर्गत श्रीनारद बहुलाश्व संवाद में ‘श्रीगिरिराज माहात्म्य’ नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ।
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