03. गिरिराजखण्ड || अध्याय 11 || सिद्ध के द्वारा अपने पूर्व जन्म के वृतांत का वर्णन तथा गोलोक से उतरे हुए विशाल रथ पर आरूढ़ हो उसका श्री कृष्ण लोक में गमन

श्री गर्ग संहिता

03.  गिरिराजखण्ड || अध्याय 11 || सिद्ध के द्वारा अपने पूर्व जन्म के वृतांत का वर्णन तथा गोलोक से उतरे हुए विशाल रथ पर आरूढ़ हो उसका श्री कृष्ण लोक में गमन

श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, सिद्ध की यह बात सुनकर ब्राह्मण को बड़ा विस्मय हुआ; गिरिराज के प्रभाव को जानकर उसने सिद्ध ने पुन: प्रश्‍न किया।
ब्राह्मण ने पूछा:- महाभाग इस समय तो तुम साक्षात दिव्‍यरूपधारी दिखायी देते हो, परंतु पूर्वजन्‍म में तुम कौन थे और तुमने कौन-सा पाप किया था?

सिद्ध ने कहा:- पूर्वजन्‍म में एक धनी वैश्‍य था, अत्‍यंत समृद्ध वैश्‍यबालक होने के कारण मुझे बचपन से ही जुआ खेलने की आदत पड़ गयी थी।

धूर्तों ओर जुआरियों की गो‍ष्‍ठी में मैं सबसे चतुर समझा जाता था, आगे चलकर मैं वेश्‍या में आसक्‍त हो गया, कुपथ पर चलने और मदिरा के मद से उन्‍मत्‍त रहने लगा। 
ब्रह्मन, इसके कारण मुझे अपने माता-पिता और पत्‍नी की ओर से बड़ी फटकार मिलने लगी।

एक दिन मैंने माँ-बाप को तो जहर देकर मार डाला और पत्‍नी को साथ लेकर कहीं जाने के बहाने निकला और रास्‍ते में मैंने तलवार से उसकी हत्‍या कर दी।

इस तरह उन सबके धन को हथियाकर मैं उस वेश्‍या के साथ दक्षिण जाकर मैं अत्‍यंत निर्दयतापूर्वक लूट-पाट का काम करने लगा। 

एक दिन उस वेश्‍या को भी मैंने अँधेर कुएँ में डाल दिया। 

डाकू तो मैं हो ही गया था, मैंने फाँसी लगाकर सैकड़ों मनुष्‍यों को मौत के घाट उतार दिया। 

एक दिन की बात है वन में एक सर्प के ऊपर मेरा पैर पड़ गया और उसने मुझे डंस लिया।

फिर तो तत्‍काल मेरी मृत्‍यु हो गयी और यमराज के भयंकर दूतों ने आकर मुझ दुष्‍ट ओर महापात की को भयानक मुद्गगुरों से पीट-पीटकर बाँधा और नरक में पहुँचा दिया। 

मुझे महादुष्‍ट मानकर ‘कुम्‍भीपाक’ में डाला गया और वहाँ एक मन्‍वन्‍तर तक रहना पड़ा। 

तत्‍पश्‍चात् ‘तप्‍तसूर्मि’ नामक नरक में मुझ दुष्‍ट को एक कल्‍प तक महान दु:ख भोगना पड़ा। 

इस तरह चौरासी लाख नरकों में से प्रत्‍येक में अलग-अलग यमराज की इच्‍छा से मैं एक-एक वर्ष तक पड़ता और निकलता रहा। 

तदनन्‍तर भारतवर्ष में कर्मवासना के अनुसार मेरा दस बार तो सूअर की योनि में जन्‍म हुआ और सौ बार व्‍याघ्र की योनि में, फिर सौ जन्‍मों तक ऊंट और उतने ही जन्‍मों तक भैंसा हुआ। 

इसके बाद एक सहस्‍त्र जन्‍म तक मुझे सर्प की योनि में रहना पड़ा, फिर कुछ दुष्‍ट मनुष्‍यों ने मिलकर मुझे मार डाला।

विप्रवर, इस तरह दस हजार वर्ष बीतने पर जलशून्‍य विपिन में मैं ऐसा विकराल और महाखल राक्षस हुआ, जैसा कि तुमने अभी-अभी देखा है। 

बहुत दिनों तक मैं भूखा रहा और तुम्‍हें खा जाने के लिये यहाँ आया, इतने में ही तुमने मुझे गिरिराज के पत्‍थर से मार दिया।

मुने, मुझ पर साक्षात श्रीकृष्‍ण की कृपा हो गयी, जिससे मेरा कल्‍याण हो गया।

श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, वह इस प्रकार कह ही रहा था कि गोलोक से एक विशाल रथ उतरा, वह सहस्‍त्रों सूर्यों के समान तेजस्‍वी था और उसमें दस हजार घोडे़ जुते हुए थे। 

नरेश्‍वर, उससे हजारों पहियों के चलने की ध्‍वनि होती थी, लाखों पार्षद उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। 

मंजीर और क्षुद्र-घण्टिकाओं के समूह से आच्‍छादित वह रथ अत्‍यन्‍त मनोहर दिखायी देता था। 

ब्राह्मण के देखते-देखते ओर सिद्ध को लने के लिये जब वह रथ आया, तब ब्राह्मण और सिद्ध दोनों ने उस दिव्‍य रथ को नमस्‍कार किया। 

मिथिलेश्‍वर, तदनन्‍तर वह सिद्ध उस रथ पर आरूढ हो दिग्‍मण्‍डल को प्रकाशित करता हुआ परात्‍पर श्रीकृष्‍ण-लोक में पहुंच गया, जो निकुंज-लीला के कारण ललित एवं परम मनोहर है। 

मैथिल, वह ब्राह्मण भी गोवर्द्धन प्रभाव जान गया था, इसलिये वहाँ से लौटकर समस्‍त गिरिराजों के देवता गोवर्द्धन गिरि पर आया और उसकी परिक्रमा एवं उसे प्रणाम करके अपने घर को गया।

राजन, इस प्रकार मैंने यह विचित्र एवं उत्‍तम मोक्षदायक श्रीगिरिराज खण्‍ड तुम्‍हें कह सुनाया। 

पापी मनुष्‍य भी इसका श्रवण करके स्‍वप्‍न में भी कभी उग्रदण्‍डधारी प्रचण्‍ड यमराज का दर्शन नहीं करता। 

जो मनुष्‍य गिरिराज के यश से परिपूर्ण गोपराज श्रीकृष्‍ण की नूतन के लिये रहस्‍य को सुनता है, वह देवराज इन्‍द्र की भाँति इस लोक में सुख भोगता है और नन्‍दराज के समान परलोक में शांति का अनुभव करता है।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में गिरिराज खण्‍ड के अन्‍तर्गत श्रीनारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘श्रीगिरिराज प्रभाव प्रस्‍ताव वर्णन के प्रसंग में ‘सिद्धमोक्ष’ नामक ग्‍यारवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।

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