03. गिरिराजखण्ड || अध्याय 06 || गोपों का वृषभानुवर के वैभव की प्रशंसा करके नंदनंदन की भगवत्ता का परीक्षण करने के लिए उन्हें प्रेरित करना और वृषभानुवर का कन्या के विवाह के लिए वर को देने के नियमित बहुमूल्य एवं बहुसंख्यक मौक्तिक हार भेजना तथा श्री कृष्ण की कृपा से नंदराजका वधु के लिए उनसे भी अधिक मौक्तिक राशि भेजना।
श्री गर्ग संहिता
03. गिरिराजखण्ड || अध्याय 06 || गोपों का वृषभानुवर के वैभव की प्रशंसा करके नंदनंदन की भगवत्ता का परीक्षण करने के लिए उन्हें प्रेरित करना और वृषभानुवर का कन्या के विवाह के लिए वर को देने के नियमित बहुमूल्य एवं बहुसंख्यक मौक्तिक हार भेजना तथा श्री कृष्ण की कृपा से नंदराजका वधु के लिए उनसे भी अधिक मौक्तिक राशि भेजना।
श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, वृषभानुवर की यह बात सुनकर समस्त व्रजवासी शांत हो गये; उनका सारा संशय दूर हो गया तथा उनके मन में बडा़ विस्मय हुआ।
गोप बोले:- "राजन, तुम्हारा कथन सत्य है; निश्चय ही राधा श्रीहरि की प्रिया है; इसी के प्रभाव से भूतलपर तुम्हारा वैभव अधिक दिखायी देता है।
हजारों मतवाले हाथी, चंचल घोडे़ तथा देवताओं के विमान-सदृश करोडो़ सुन्दर रथ और शिबिकाएँ तुम्हारे यहां सुशोभित होती हैं।
इतना ही नहीं, सुवर्ण तथा रत्नों के आभूषणों से विभूषित कोटि-कोटि मनोहर गौएँ, विचित्र भवन, नाना प्रकार के मणिरत्न, भोजन-पान आदि का सर्वविध सौख्य-यह सब इस समय तुम्हारे घर में प्रत्यक्ष देखा जाता है; तुम्हारा अद्भूत बल देखकर कंस भी पराभूत हो गया है।
महावीर, तुम कान्यकुब्ज देश के स्वामी साक्षात् राजा भलन्दन के जामाता हो तथा कुबेर के समान कोषाधिपति।
तुम्हारे समान वैभव नन्दराज के घर में कहीं नहीं है; नन्दराज तो किसान, गोयूथके अधिपति और दीन हृदय वाले हैं।
प्रभो, यदि नन्द के पुत्र साक्षात् परिपूर्णतम श्रीहरि हैं तो हम सबके समान सामने नन्द के वैभव की परीक्षा कराइये।"
श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, उन गोपों की बात सुनकर महान वृषभानुवर ने नन्दराज के वैभव की परीक्षा की।
मैथिलेश्वर, उन्होंने स्थूल मोतियों के एक करोड हार लिये, जिनमें पिरोया हुआ एक-एक मोती एक-एक करोड स्वर्णमुद्रा के मोलपर मिलने वाला था और उन सबकी प्रभा दूर तक फैल रही थी।
नरेश्वर, उन सबको पात्रों में रखकर बडे कुशल वर-वरणकारी लोगों द्वारा सब गोपों के देखते-देखते वृषभानुवर ने नन्दराज जी के यहां भेजा।
श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, उन गोपों की बात सुनकर महान वृषभानुवर ने नन्दराज के वैभव की परीक्षा की।
नन्दराज की सभा में जाकर अत्यन्त कुशल वर-वरणकर्ता लोगों ने मौक्किक-हारों के पात्र उनके सामने रख दिये और प्रणाम करके उनसे कहा।
वर-वरणकर्ता बोले:- "नन्दराज, जिसके नेत्र नूतन विकसित कमल के समान शोभा पाते हैं तथा जो मुख में करोड़ों चन्द्र-मुखमण्डलों की-सी कान्ति धारण करती है, उस अपनी पुत्री श्रीराधा को विवाह के योग्य जानकर वृषभानुवर ने सुन्दर वर की खोज करते हुए यह विचार किया है कि तुम्हारे पुत्र श्रीकृष्ण दिव्य वर हैं।
गोवर्धन पर्वत को उठाने में समर्थ, दिव्य भुजाओं से सम्पन्नव तथा उद्भट वीर हैं।
प्रभों, वैश्य -प्रवर,, यह सब देख और सोच-विचारकर वृषभानु जी ने हम सबको यहाँ भेजा है; आप वर की गोद भरने के लिये पहले कन्या पक्ष की ओर से यह मौक्तिक राशि ग्रहण कीजिये, फिर इधर से भी कन्या की गोद भरने के लिये पर्याप्त मौक्तिक राशि प्रदान कीजिये यही हमारे कुल की प्रसिद्ध रीति है।"
श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन्, उस उत्कृष्ट द्रव्य राशि को देखकर नन्द राज बडे़ विस्मित हुए, तो भी वे कुछ विचारकर यशोदा जी से 'उसके तुल्य रत्न-राशि है या नहीं' इस बात को पूछने के लिये वह सब सामान लेकर अन्त: पुर में गये।
वहां उस समय नन्द और यशस्विनी यशोदा ने चिरकाल तक विचार किया, किंतु (अन्तोनगत्वास) इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि 'इस मोक्तिक राशि के बराबर दूसरी कोई द्रव्यक राशि मेरे घर में नहीं है; आज लोगों में हमारी सारी लाज गयी; हम-लोगों की सब ओर हंसी उड़ाया जायगी।
इस धन के बदले में हम दूसरा कौन-सा धन दें, क्या करें, श्रीकृष्ण के इस विवाह के निमित्त हमारे द्वारा क्या किया जाना चाहिये?
पहले तो जो कुछ वर के लिये आया है, उसे ग्रहण कर लेना चाहिये; पीछे अपने पास धन आने पर वधू के लिये उपहार भेजा जायगा।'
ऐसा विचार करते हुए नन्द और यशोदाजी के पास भगवान श्रीकृष्ण अलक्षितभाव से ही वहां आ गये।
उन मौक्तिक हारों में से सौ हार उन्होंने घर से बाहर खेतों में ले जाकर, अपने हाथ से मोती का एक-एक दाना लेकर उन्होनें उसी भांति सारे खेत में छींट दिया, जैसे किसान अपने खेतों में अनाज के दाने बिखेर देता है।
नन्द जी जब उन मुक्तामालाओं की गणना करने लगे, तब उनमें सौ मालाओं की कमी देखकर उनके मन में संदेह हुआ।
नन्द जी बोले:- हाय, पहले तो मेरे घर में जिस रत्न राशि के समान दूसरी कोई रत्न राशि थी ही नहीं, उसमें भी अब सौ की कमी हो गयी।
अहो, चारों ओर से भाई-बन्धुओं के बीच मुझ पर बड़ा भारी कलंक पोता जाएगा; अथवा यदि श्रीकृष्ण या बलराम ने खेलने के लिये उसमें से कुछ मोती लिये हों तो अब दीनचित्त होकर मैं उन्हीं दोनों बालकों से पूछूंगा।
श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, इस प्रकार विचारकर नन्द ने भी श्रीकृष्ण से उन मोतियों के विषय में आदरपूर्वक पूछा, तब जोर से हंसते हुए गोवर्धनधारी भगवान नन्द से बोले।
श्री भगवान ने कहा:- बाबा, हम सारे गोप किसान हैं, जो खेतों में सब प्रकार के बीज बोया करते हैं, अत: हमने खेत में मोती के बीज बिखेर दिये हैं।
श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, बेटे के मुंह से यह बात सुनकर व्रजेश्वर नन्द ने उस डांट बतायी और उन सबको चुन-बीनकर लाने के लिये उसके साथ खेतों में गये।
वहां मुक्ताफल के सैकड़ों सुन्दर वृक्ष दिखायी देने लगे, जो हरे-हरे पल्लवों से सुशोभित और विशालयकाय थे।
नरेश्र, जैसे आकाश में झुंड के झुंड तारे शोभा पाते हैं, उसी प्रकार उन वृक्षों में कोटि-कोटि मुक्ताफल के गुच्छे समूह के समूह लटके हुए सुशोभित हो रहे थे।
तब हर्ष से भरे हुए व्रजेश्वर नन्दराज ने श्रीकृष्ण को परमेश्वर जानकर पहले के समान ही मोटे-मोटे दिव्य मुक्ताफल उन वृक्षों से तोड़ लिये और उनके एक कोटि भार गाडियों पर लदवाकर उन वर-वरणकर्ताओं को दे दिये।
नरेश्वर, वह सब लेकर वे वरदर्शी लोग वृषभानुवर के पास गये ओर सबके सुनते हुए नन्दराज के अनुपम वैभव का वर्णन करने लगे।
उस समय सब गोप बड़े विस्मित हुए, नन्द-नन्दन को साक्षात श्रीहरि जानकर समस्त व्रजवासियों का संशय दूर हो गया और उन्होने वृषभानुवर को प्रणाम किया।
मिथिलेश्वर, उसी दिन से व्रज के सब लोगों ने यह जान लिया कि श्रीराधा के प्राणवल्लभ हैं।
मिथिलापते, जहां नन्दनन्दन श्रीहरि ने मोती बिखेरे थे, वहां ‘मुक्ता-सरोवर’ प्रकट हो गया, जो तीर्थों का राजा है।
जो वहां एक मोती का भी दान करता है, वह लाख मोतियों के दान का फल पाता है, इसमें संशय नहीं है।
राजन ! इस प्रकार मैंने तुमसे गिरिराज-महोत्सव का वर्णन किया, जो मनुष्यों के लिये भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला है, अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?
इस प्रकार श्रीगर्ग-संहितामें गिरिराज खण्ड के अन्तर्गत श्रीनारद बहुलाश्व–संवाद में ‘श्रीहरिकी भगवक्ता का परीक्षण’ नामक छठा अध्याय पूरा हुआ।
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