04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 05 || अयोध्‍यावासिनी गोपियों के आख्‍यान के प्रसंग में राजा विमल की संतान के लिये‍ चिन्‍ता तथा महामुनि याज्ञवल्‍क्‍य द्वारा उन्‍हें बहुत-सी पुत्री होने का विश्‍वास दिलाना

श्री गर्ग संहिता
04.  माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 05 || अयोध्‍यावासिनी गोपियों के आख्‍यान के प्रसंग में राजा विमल की संतान के लिये‍ चिन्‍ता तथा महामुनि याज्ञवल्‍क्‍य द्वारा उन्‍हें बहुत-सी पुत्री होने का विश्‍वास दिलाना

श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, अब अयोध्‍यावासिनी गोपियों का वर्णन सुनो, जो चारों पदार्थों को देने वाला तथा साक्षात श्रीकृष्‍ण की प्राप्ति कराने वाला सर्वोत्‍कृष्‍ट साधन है।

मिथिलेश्‍वर, सिन्‍धु देश में चम्‍पका नाम से प्रसिद्ध एक नगरी थी, जिसमें धर्मपरायण विमल नामक राजा हुए थे।
वे कुबेर के समान कोष से सम्‍पन्‍न तथा सिंह के समान मनस्‍वी थे तथा वे भगवान विष्‍णु के भक्‍त और प्रशान्‍तचित्‍त महात्‍मा थे। 
वे अपनी अविचल भक्ति के कारण मूर्तिमान प्रहलाद-से प्रतीत होते थे। 
उन भूपाल के छ: हजार रानियाँ थीं, वे सब की सब सुन्‍दर रूप वाली तथा कमलनयनी थीं, परंतु भाग्‍यवश वे वन्‍ध्‍या हो गयीं। 
राजन, 'मुझे किसी पुण्‍य से उत्तम संतान की प्राप्ति होगी?' ऐसा विचार करते हुए राजा विमल के बहुत वर्ष व्‍यतीत हो गये। 

एक दिन उनके यहाँ मुनिवर याज्ञवल्‍क्‍य पधारे, राजा ने उनको प्रणाम करके उनका विधिवत पूजन किया और फिर उनके सामने वे विनीतभाव से खडे़ हो गये। 
नृपति शिरोमणि राजा को चिन्‍ता से आकुल देख सर्वज्ञ, सर्ववित तथा शांतस्‍वरूप महामुनि याज्ञवल्‍क्‍य ने उनसे पूछा।

याज्ञवल्‍क्‍य बोले:- राजन, तुम दुर्बल क्‍यों हो, तुम्‍हारे हृदय में कौन-सी चिन्‍ता खड़ी हो गयी है, इस समय तुम्‍हारे राज्‍य के सातों अंगों में तो कुशल मंगल ही दिखायी देता है?

विमल ने कहा:- ब्रह्मन, आप अपनी तपस्‍या एवं दिव्‍य दृष्टि से क्‍या नहीं जानते हैं, तथापि आपकी आज्ञा का गौरव मानकर मैं अपना कष्‍ट बता रहा हूँ। 
मुनिश्रेष्‍ठ, मैं संतानहीनता के दु:ख से चिन्तित हूँ, कौन-सा तप और दान करूँ, जिससे मुझे संतान की प्राप्ति हो।

श्रीनारदजी कहते हैं:- विमल की यह बात सुनकर याज्ञवल्‍क्‍यमुनि के नेत्र ध्‍यान में स्थित हो गयो, वे मुनिश्रेष्‍ठ भूत और वर्तमान का चिन्‍तन करते हुए दीर्घकाल तक ध्‍यान में मग्‍न रहे। 

याज्ञवल्‍क्‍य बोले:- राजेन्‍द्र, इस जन्‍म में तो तुम्‍हारे भाग्‍य में पुत्र नहीं है, नहीं हैं, परंतु नृपश्रेष्‍ठ, तुम्‍हे पुत्रियाँ करोड़ों की संख्‍या में प्राप्‍त होंगी।

राजा ने कहा:- मुनीन्‍द्र, पुत्र के बिना कोई भी इस भूतल पर पूर्वजों के ऋण से मुक्‍त नहीं होता, पुत्रहीन के घर में सदा ही व्‍यथा बनी रहती है, उसके इसलोक या परलोक में कुछ भी सुख नहीं मिलता। 

याज्ञवल्क्य बोले:- राजेन्‍द्र, खेद न करो भविष्‍य में भगवान श्रीकृष्‍ण का अवतार होने वाला है, तुम उन्‍हीं को दहेज के साथ अपनी सब पुत्रियाँ समर्पित कर देना। 
नृपश्रेष्‍ठ, उसी कर्म से तुम देवताओं, ऋषियों तथा पितरों के ऋण से छूटकर परमोक्ष प्राप्‍त कर लोगे।

श्रीनारदजी कहते हैं:- महामुनि का यह वचन सुनकर उस समय राजा को बड़ा हर्ष हुआ, उन्‍होंने महर्षि याज्ञवल्‍क्‍य से पुन: अपना संदेह पूछा?

राजा बोले:- मुनीश्‍वर, कितने वर्ष बीतने पर किसी देश में और किस कुल में साक्षात श्रीहरि अवतीर्ण होंगे, उस समय उनका रूप-रंग क्‍या होगा?

यागवल्‍क्‍य बोले:- महाबाहो, इस द्वापरयुग के जो अवशेष वर्ष हैं, उन्‍हीं में तुम्‍हारे राज्‍यकाल से एक सौ पंद्रह वर्ष व्‍यतीत होने पर यादवपुरी मथुरा में यदुकुल के भीतर भद्रपदमास, कृष्‍णपक्ष, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण योग, वृषलग्‍न, वव करण और अष्‍टमी तिथि में आधी रात के समय चन्‍द्रोदय-काल में, जब कि सब कुछ अन्‍धकार से आच्‍छन्‍न होगा, वसुदेव-भवन में देवकी के गर्भ से साक्षात श्रीहरि का आविर्भाव होगा।
ठीक इसी तरह जैसे यज्ञ में अ‍रणि-काष्‍ठ से अग्नि का प्राकट्य होता है। 
भगवान के वक्ष:स्‍थल पर श्रीवत्‍स का चिन्‍ह होगा, उनकी अंगकान्ति मेघ के समान श्‍याम होगी। 

वे वनमाला से अलंकृत और अतीव सुन्‍दर होंगे, पीताम्‍बरधारी, कमलनयन तथा अवतारकाल में चतुर्भुज होंगे। 
तुम उन्‍हें अपनी कन्‍याएँ देना, तुम्‍हारी आयु अभी बहुत है। तुम उस समय तक जीवित रहोगे, इसमें संशय नहीं है।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में माधुर्य खण्‍ड के अन्‍तर्गत श्रीनारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘अयोध्‍यावासिनी गोपांगनाओं का उपाख्‍यान' नामक पाँचवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।

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