04. माधुर्य खण्ड || अध्याय 06 || अयोध्यापुरवासिनी स्त्रियों का राजा विमल के यहाँ पुत्री रूप से उत्पन्न होना, उनके विवाह के लिये राजा का मथुरा में श्रीकृष्ण को देखने के निमित्त दूत भेजना, वहाँ पता न लगने पर भीष्म जी से अवतार-रहस्य जानकर उनका श्रीकृष्ण के पास दूत प्रेषित करना
श्री गर्ग संहिता
04. माधुर्य खण्ड || अध्याय 06 || अयोध्यापुरवासिनी स्त्रियों का राजा विमल के यहाँ पुत्री रूप से उत्पन्न होना, उनके विवाह के लिये राजा का मथुरा में श्रीकृष्ण को देखने के निमित्त दूत भेजना, वहाँ पता न लगने पर भीष्म जी से अवतार-रहस्य जानकर उनका श्रीकृष्ण के पास दूत प्रेषित करना
श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, यों कहकर जब साक्षात महामुनि याज्ञवल्क्य चले गये, तब चम्पका नगरी के स्वामी राजा विमल को बडा हर्ष हुआ।
अयोध्यापुरवासिनी स्त्रियाँ श्रीराम के वरदान से उनकी रानियों के गर्भ से पुत्री रूप में प्रकट हुईं, वे सभी राजकन्याएँ बड़ी सुन्दरी थीं।
उन्हें विवाह के योग्य अवस्था में देखकर नृपशिरोमणि चम्पकेश्वर को चिन्ता हुई, उन्होंने याज्ञवल्क्यजी की बात को याद करके दूत से कहा।
विमल बोले:- दूत, तुम मथुरा जाओ और वहाँ शूरपुत्र वसुदेव के सुन्दर घर तक पहुँचकर देखो।
वसुदेव का कोई बहुत सुन्दर पुत्र होगा, उसके वक्ष:स्थल में श्रीवत्स का चिन्ह होगा, अंगकान्ति मेघमाला की भाँति श्याम होगी तथा वह वनमालाधारी एवं चतुर्भुज होगा, यदि ऐसी बात हो तो मैं उसके हाथ अपनी समस्त सुन्दरी कन्याएँ दे दूँगा।
श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन् , महाराज विमल की यह बात सुनकर वह दूत मथुरापुरी में गया ओर मथुरा के बड़े-बड़े लोगों से उसने सारी अभीष्ट बातें पूछीं।
उसकी बात सुनकर मथुरा के बुद्धिमान लोग, जो कंस के डरे हुए थे, उस दूत को एकान्त में ले जाकर उसके कान में बहुत धीमे स्वर से बोले।
मथुरा निवासियों ने कहा:- वसुदेव के जो बहुत-से पुत्र हुए, वे कंस के द्वारा मारे गये, एक छोटी-सी कन्या बच गयी थी, किंतु वह भी आकाश में उड़ गयी।
वसुदेव यहीं रहते हैं, किंतु पुत्रों से बिछुड़ जाने के कारण उनके मन में बड़ा दु:ख है।
इस समय जो बात तुम हम-लोगों से पूछ रहे हो, उसे और कहीं न कहना, क्योंकि इस नगर में कंस का भय है।
मथुरापुरी में जो वसुदेव की संतान के संबंध में कोई बात करता है, उसे उनके आठवें पुत्र का शत्रु कंस भारी दण्ड देता है।
श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, जनसाधारण की यह बात सुनकर दूत चम्पकापुरी में लौट गया, वहाँ जाकर राजा से उसने वह अदभुत संवाद कह सुनाया।
दूत बोला:- महाराज, मथुरा में शूरपुत्र वसुदेव अवश्य हैं, किंतु संतानहीन होने के कारण अत्यन्त दीन की भाँति जीवन व्यतीय करते हैं।
सुना है कि पहले उनके अनेक पुत्र हुए थे, जो कंस के हाथ से मारे गये हैं, एक कन्या बची थी, किंतु वह भी कंस के हाथ से छूटकर आकाश में उड गयी।
यह वृतान्त सुनकर मैं यदुपुरी से धीरे-धीरे बाहर निकला, वृन्दावन में कालिन्दी के सुन्दर एवं रमणीय तटपर तटपर विचरते हुए हुए मैंने लताओं के समूह में अकस्मात् एक शिशु देखा।
राजन, गोपों के मध्य दूसरा कोई ऐसा बालक नहीं था, जिसके लक्षण उसके समान हों, उस बालके के वक्ष:स्थल पर श्रीवत्सा का चिन्ह था।
उसकी अंगकान्ति मेघ के समान श्याम थी और वह वनमाला धारण किये अत्यन्त सुन्दर दिखायी देता था।
परंतु अन्तर इतना ही है कि उस गोप-बालक के दो ही बाँहे थीं और आपने वसुदेव कुमार श्रीहरि को चतुर्भुज बतायाथा।
नरेश्वर, बताइये, अब क्या करना चाहिये, क्योंकि मुनि की बात झूठी नहीं हो सकती।
प्रभो, जहाँ जिस तरह आपकी इच्छा हो, उसके अनुसार वहाँ-वहाँ- मुझे भेजिये।
श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, जनसाधारण की यह बात सुनकर दूत चम्पकापुरी में लौट गया, वहाँ जाकर राजा से उसने वह अदभुत संवाद कह सुनाया।
राजन, दूत की बात सुनकर राजा विमल जब इस प्रकार विस्मित होकर विचार कर रहे थे, उसी समय हस्तिनापुर से सिन्धुदेश को जीतने के लिये भीष्म आये।
विमल बोले:- महाबुद्धिमान भीष्मजी, पहले याज्ञवल्क्य जी ने मुझसे कहा कहा कि मथुरा में साक्षात श्रीहरि वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से प्रकट होंगे, इसमें संशय नहीं है।
परंतु इस समय वसुदेव के यहाँ परमेश्वर श्रीहरि का प्राकट्य नहीं हुआ है साथ ही ऋषि की बात झूठी हो नहीं सकती, अत: इस समय मैं अपनी कन्याओं का दान किसके हाथ में करूँ।
आप साक्षात महाभागवत हैं और पूर्वापर की बातें जानने वालों में सबसे श्रेष्ठ हैं, बचपन से ही आपने इन्द्रियों पर विजय पायी है। आप वीर, धनुर्धर एवं वसुओं में श्रेष्ठ हैं। इसलिये यह बताइये कि अब मुझे क्या करना चाहिये?
श्रीनारदजी कहते हैं:- गंगानन्दन भीष्म जी महान भगवद्भक्त विद्वान, दिव्यदृष्टि से सम्पन्न, धर्म के तत्वज्ञ तथा श्रीकृष्ण के प्रभाव को जानने वाले थे, उन्होंने राजा विमल से कहा।
भीष्मजी बोले:- राजन, यह एक गुप्त बात है, जिसे मैंने वेदव्यासजी के मुँह से सुनी थी।
यह प्रसंग समस्त पापों को हर लेने वाला, पुण्यप्रद तथा हर्षवर्धक है, इसे सुनो:- परिपूर्णतम भगवान श्रीहरि देवताओं की रक्षा तथा दैत्यों का वध करने के लिये वसुदेव घर में अवतीर्ण हुए हैं।
किंतु आधी रात के समय वसुदेव कंस के भय से उस बालक को लेकर तुरंत गोकुल चले गये और वहाँ अपने पुत्र को यशोदा की शय्या पर सुलाकर, यशोदा और नन्द की पुत्री माया को साथ ले, मथुरापुरी में लौट आये।
इस प्रकार श्रीकृष्ण गोकुल में गुप्त रूप से पलकर बड़े हुए हैं, यह बात दूसरे कोई भी मनुष्य नहीं जानते।
वे ही गोपालवेषधारी श्रीहरि वृन्दावन में ग्यारह वर्षों तक गुप्त रूप से वास करेंगे, फिर कंस-दैत्य का वध करके प्रकट हो जायँगे।
अयोध्यापुरवासिनी जो नारियाँ श्रीरामचन्द्रजी के वर से गोपीभाव को प्राप्त हुई हैं, वे सब तुम्हारी पत्नियों के गर्भ से सुन्दरी कन्याओं के रूप में उत्पन्न हुई हैं।
तुम उन गूढ़ रूप में विद्यमान देवाधिदेव श्रीकृष्ण को अपनी समस्त कन्याएँ अवश्य दे दो, इस कार्य में कदापि विलम्ब न करो, क्योंकि यह शरीर काल के अधीन है।
यो कहकर जब सर्वज्ञ भीष्मजी हस्तिनापुर को चले गये, तब राजा विमल ने नन्दनन्दन के पास अपना दूत भेजा।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में माधुर्य खण्ड के अन्तर्गत श्रीनारद बहुलाश्व संवाद में ‘अयोध्यापुरवासिनी गोपीकाओं का उपाख्यान' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ।
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