04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 10 || पुलिन्‍दकन्‍यारूपिणी गोपियों के सौभाग्‍य का वर्णन

श्री गर्ग संहिता
04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 10 || पुलिन्‍दकन्‍यारूपिणी गोपियों के सौभाग्‍य का वर्णन

श्रीनारदजी कहते हैं:- अब पुलिन्‍द (कोल-भील) जाति की स्त्रियों का जो गोपी-भाव को प्राप्‍त हुई थीं, मैं वर्णन करता हूँ, यह वर्णन समस्‍त पापों का अपहरण करने वाली, पुण्‍यजनक, अदभुत और भक्ति-भाव को बढ़ाने वाला है।

विन्‍ध्‍याचल के वन में कुछ पुलिन्‍द (कोल-भील) निवास करते थे, वे उद्भट योद्धा थे और केवल राजा का धन लूटते थे, गरीबों की कोई चीज कभी नहीं छूते थे। 
विन्‍ध्‍यदेश के बलवान राजा ने कुपित हो दो अक्षौहिणी सेनाओं के द्वारा उन सभी पुलिन्‍दों पर घेरा डाल दिया। 
वे पुलिन्‍द भी तलवारों, भालों, शूलों, फरसों, शक्तियों, ऋष्टियों, भुशण्डियों ओर तीर-कमानों से कई दिनों तक राजकीय सैनिकों के साथ युद्ध करते रहे। 
विजय की आशा न देखकर उन्‍होंने सहायता के लिये यादवों के राजा कंस के पास पत्र भेजा, तब कंस की आज्ञा से बलवान दैत्‍य प्रलम्‍ब वहाँ आया। 

उसका शरीर दो योजन उँचा था, देह का रंग मेघों की काली घटा के समान काला था, माथेपर मुकुट तथा कानों में कुण्‍डल धारण किये वह दैत्‍य सर्पों की माला से विभूषित था।
उसके पैरों में सोने की साँकल थी और हाथ में गदा लेकर वह दैत्‍य काल के समान जाना पड़ता था। 
उसकी जीभ लपलपा रही थी और रूप बड़ा भयंकर था, वह शत्रुओं पर पर्वत की चट्टानें तथा बड़े-बड़े वृक्ष उखाड़कर फेंकता था। 
पैरों की धमक से धरती को कँपाते हुए रणदुर्मद दैत्‍य प्रलम्‍ब को देखते ही भयभीत तथा पराजित हो विन्‍ध्‍य-नरेश सेनासहित समरांगण छोड़कर सहसा भाग चले, मानों सिंह को देखकर हाथी भाग जाता हो। 
तब प्रलम्‍ब उन सब पुलिन्‍दों को साथ ले पुन: मथुरापुरी को लौट आया, वे सभी पुलिन्‍द कंस के सेवक हो गये। 
नृपेश्वर, उन सबने अपने कुटुम्‍ब के साथ कामगिरि पर निवास किया।
उन्‍हीं के घरों में भगवान श्रीराम के उत्‍कृष्‍ट वरदान से वे पुलिन्‍द–स्त्रियाँ दिव्‍य कन्‍याओं के रूप में प्रकट हुई, जो मूर्तिमती लक्ष्‍मी की भाँति पूजित एवं प्रशंसित होती थीं। 
श्रीकृष्‍ण के दर्शन से उनके हृदय में प्रेम की पीड़ा जाग उठी।

वे पुलिन्‍द कन्‍याएँ प्रेम से विह्वल हो भगवान की श्रीसम्‍पन्‍न चरण रज को सिर पर धारण करके दिन-रात उन्‍हीं के ध्‍यान एवं चिन्‍तन में डूबी रहती थीं। 
वे भी भगवान की कृपा से रास में आ पहुँची और साक्षात गोलोक के अधिपति, सर्वसमर्थ, परिपूर्णतम परमेश्वर श्रीकृष्‍ण को उन्‍होंने सदा के लिये प्राप्‍त कर लिया। 
अहा, इन पुलिन्‍द-कन्‍याओं का कैसा महान सौभाग्‍य है कि देवताओं के लिये भी परम दुर्लभ श्रीकृष्‍ण चरणा‍रविन्‍दों की रज उन्‍हें विशेष रूप से प्राप्‍त हो गयी।
जिसकी भगवान के परम उत्‍कृष्‍ट पाद-पद्य-पराग में सुदृढ़ भक्ति है, वह न तो ब्रह्मजी का पद, न महेन्‍द्र का स्‍थान, न निरन्‍तर स्‍थायी सार्वभौम सम्राट का पद, न पाताल लोक का आधिपत्‍य, न योगसिद्धि और न अपुनर्भव (मोक्ष) को ही चाहता है। 
जो अकिंचन हैं, अपने किये हुए कर्मों के फल से विरक्‍त हैं, वे हरि चरण रज में आसक्‍त भगवान के स्‍वजन महात्‍मा भक्‍त मुनि जिस पद का सेवन करते हैं, वही निरपेक्ष सुख है, दूसरे लोग जिसे सुख कहते हैं, वह वास्‍तव में निरपेक्ष नहीं है।*1।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में माधुर्य खण्‍ड के अन्‍तर्गत श्रीनारद बहुलाश्व संवाद में ‘पुलिन्‍दी–उपाख्‍यान’ नामक दसवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।


*1.  परिपूर्णतं साक्षाद्गोलोकाधिपतिं प्रभुम् ।। श्रीकृष्‍णचरणम्‍भोजरजो देवै: सुदुर्लभम्। अहोभाग्‍यं पुलिन्‍दीनां तासां प्राप्‍तं विशेषत:।।
य: पारमेष्‍ठच्मखिलं न महेन्‍द्रधिष्‍ण्‍यं नो सार्वभौममनिशं न रसाधिपत्‍यम्।
नो योगसिद्धिमभितो न पुनर्भवं वा वाञ्छत्‍यलं परमपादरजस्‍सुभक्त:।।
निष्किंञ्चना: स्‍वकृतकर्मफलैर्विरागा यत्तत्‍पदं हरिजना मुनयो महान्‍त:।
भक्‍ता जुषन्ति हरिपादरज: प्रसक्‍ता अन्‍ये वदन्ति न सुखं किल नैरपेक्ष्‍यम्।।
(गर्ग0 माधुर्य0 10। 13-16)

Comments

Popular posts from this blog

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन

21.01 *श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन वृत्त*

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य