04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 16 || श्री यमुना-कवच

श्री गर्ग संहिता
04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 16 || श्री यमुना-कवच

राजा मांधाता सौभरी मुनि से बोले:- महाभाग, आप मुझे श्रीकृष्‍ण की पटरानी यमुना के सर्वथा निर्मल कवच का उपदेश दीजिये, मैं उसे सदा धारण करूँगा। 

सौभरी बोले:- महामते नरेश, यमुनाजी का कवच मनुष्‍यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला तथा साक्षात चारों पदार्थों को देने वाला है, तुम इसे सुनो:- 

यमुनाजी के चार भुजाएँ हैं, वे श्‍यामा (श्‍यामवर्णा एवं षोडश वर्ष की अवस्‍था से युक्‍त) हैं। 
उनके नेत्र प्रफुल्‍ल कमलदल के समान सुन्‍दर एवं विशाल हैं, वे परम सुन्‍दरी हैं औद दिव्‍य रथ पर बैठी हुई हैं। 

इस प्रकार उनका ध्‍यान करके कवच धारण करे।

स्‍नान करके पूर्वाभिमुख हो मौन भावना से कुशासन-पर बैठे और कुशों द्वारा शिखा बाँधकर संध्‍या-वन्‍दन करने के अनन्‍तर ब्राह्मण (अथवा द्विजमात्र) स्‍वास्तिकासन से स्थित हो कवच का पाठ करे। 

यमुनाश्र्च कवचं सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
चतुष्‍पदार्थदं साक्षाच्‍छृणु राजन् महामते॥

कृष्‍णां चतुर्भुजां श्‍यामां पुण्‍डरीकदलेक्षणाम्।
रथस्‍थां सुन्‍दरीं ध्‍यावता धारयेत् कवचं तत:॥

स्‍न्नात: पूर्वमुखो मौनी कृतसंध्‍य: कुशासने।
कुशैर्बद्धशिखो विप्र: पठेद् वै स्‍वस्तिकासन:॥

यमुना मे शिर: पातु कृष्‍णा नेत्रद्वयं सदा।
श्‍यामा भ्रूभंगदेशं च नासिकां नाकवासिनी॥

कपोलौ पातु मे साक्षात् परमानन्‍दरूपिणी।
कृष्‍णवामांससम्‍भूता पातु कर्णद्वयं मम॥

अधरौ पातु कालिन्‍दी चिबुकं सूर्यकन्‍यका।
यमस्‍वसा कन्‍धरां च हृदयं मे महानदी॥

कृष्‍णप्रिया पातु पृष्‍ठं तटिनी मे भुजद्वयम्।
श्रोणीतटं च सुश्रोणी कटिं मे चारुदर्शना॥

ऊरुद्वयं तु रम्‍भोरूर्जानुनी त्‍वङघ्रिभेदिनी।
गुल्‍फौ रासेश्‍वरी पातु पादौ पापापहारिणी॥

अन्‍तर्बहिरधश्र्चोर्ध्‍वं दिशासु विदिशासु च।
समन्‍तात् पातु जगत: परिपूर्णतमप्रिया॥
(गर्ग0 माधुर्य0 16 । 2-10)

'यमुना' मेरे मस्‍तक की रक्षा करें और 'कृष्‍णा' सदा दोनों नेत्रों की। 
'श्‍यामा' भ्रूभंग-देश की और 'नाकवासिनी' नासिका की रक्षा करें। 
'साक्षात परमानन्‍दरूपिणी' मेरे दोनों कपोलों की रक्षा करें।
'कृष्‍णवामांससम्‍भूता' (श्रीकृष्‍ण के बायें कंधे से प्रकट हुई वे देवी) मेरे दोनों कानों का सरंक्षण करें।
'कालिन्‍दी' अधरों की और 'सूर्यकन्‍या' चिबुक (ठोढी) की रक्षा करें। 
'यमस्‍वसा' (यमराज की बहिन) मेरी ग्रीवा की और 'महानदी' मेरे हृदय की रक्षा करें। 
'कृष्‍णप्रिया' पृष्‍ठ-भाग का और 'तटिनी' मेरी दोनों भुजाओं का रक्षण करें।
'सुश्रोणी' श्रोणीतट (नितम्‍ब) की और 'चारूदर्शना' मेरे कटि-प्रदेश की रक्षा करें। 
'रम्‍भोरू' दोनों उरूओं (जाँघों) की और 'अङघ्रिभेदिनी' मेरे दोनों घुटनों की रक्षा करें। 
'रासेश्वरी' गुल्‍फों (घुट्ठियों) का और 'पापापहारिणी' पादयुगल का त्राण करे।
'परिपूर्णतम-प्रिया' भीतर-बाहर, नीचे-ऊपर तथा दिशाओं और विदिशाओं में सब ओर से मेरी रक्षा करें।

इदं श्रीयमुनायाश्र्च कवचं परमाद्भुतम्।
दशवारं पठेद् भक्‍त्‍या निर्धनो धनवान् भवेत्॥

त्रिभिर्मासै: पठेद् धीमान् ब्रह्माचारी मिताशन:। सर्वराज्‍याधिपत्‍यत्‍वं प्राप्‍यते नात्र संशय:॥

दशोत्तरशत: नित्‍यं त्रिमासावधि भक्तित:।
य: पठेत् प्रयतो भूत्‍वा तस्‍य किं किं न जायते॥

य: पठेत् प्रातरुत्‍थाय सर्वतीर्थफलं लभेत्।
अन्‍ते व्रजेत परं धाम गोलोकं योगिदुर्लभम्॥
(गर्ग. माधुर्य 261 । 11-14) 

यह श्रीयमुना का परम अद्भुत कवच है, जो भक्तिभाव से दस बार इसका पाठ करता है, वह निर्धन भी धनवान हो जाता है। 
जो बुद्धिमान मनुष्‍य ब्रह्मचर्य के पालनपूर्वक परिमित आहार का सेवन करते हुए तीन मास तक इसका पाठ करेगा, वह सम्‍पूर्ण राज्‍यों का आधिपत्‍य प्राप्‍त कर लेगा, इसमें संशय नहीं है। 
जो तीन महीने की अवधि तक प्रतिदिन भक्ति भाव से शु‍द्धचित्‍त हो इसका एक सौ दस बार पाठ करेगा, उसको क्‍या-क्‍या नहीं मिल जायेगा? 

जो प्रात:काल उठकर इसका पाठ करेगा, उसे सम्‍पूर्ण तीर्थों में स्‍नान का फल मिल जायेगा तथा अन्‍त में वह योगिदुर्लभ परमधार गोलोक में चला जायेगा।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में माधुर्य खण्‍ड के अन्‍तर्गत श्रीसौभरि-मांधाता के संवाद में ‘यमुना-कवच’ नामक सोलहवाँ अध्‍याय पूरा हुआ ।

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