04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 24 || अरिष्‍टासुर और व्‍योमासुर का वध

श्री गर्ग संहिता
04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 24 || अरिष्‍टासुर और व्‍योमासुर का वध तथा माधुर्य खण्‍ड का उपसंहार

श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन्, एक दिन गोवर्धन के आस-पास बलराम सहित भगवान श्रीकृष्‍ण आँख मिचौनी का खेल खेलने लगे- जिसमें कोई चोर बनता है तो कोई रक्षक, वहाँ व्‍योमासुर नामक दैत्‍य आया। 
उस खेल में कुछ लड़के भेड़ बनते थे और कोई चोर बनकर उन भेड़ों को ले जाकर कहीं छिपाता था। 

व्‍योमासुर ने भेड़ बने हुए बहुत-से गोप-बालकों को बारी-बारी से ले जाकर पर्वत की कन्‍दरा में रखा और एक शिला से उसका द्वार बंद कर दिया। 
वह मयासुर का महान बलवान पुत्र था, यह तो सचमुच चोर निकला, यह जानकर भगवान मधुसूदन ने उसे दोनों भुजाओं द्वारा पकड़ लिया और पृथ्‍वी पर दे मारा। 

उस समय दैत्‍य मृत्‍यु को प्राप्‍त हो गया और उसके शरीर से निकला हुआ प्रकाशमान तेज दसों दिशाओं में घूमकर श्रीकृष्‍ण में लीन हो गया। 
उस समय स्‍वर्ग में और पृथ्‍वी पर जय-जयकार की ध्‍वनि होने लगी, देवता लोग परम आनन्‍द में मग्‍न होकर फूल बरसाने लगे।

बहुलाश्व ने पूछा;- मुने, यह व्‍योम नामक असुर पूर्वजन्‍म में कौन-सा पुण्‍यात्‍मा मनुष्‍य था, जिसने श्‍याम घन में बिजली की भाँति श्रीकृष्‍ण में विलय प्राप्‍त किया।

नारद जी बोले- राजन, काशी में भीमरथ नाम से प्रसिद्ध एक राजा थे, जो सदा दान-पुण्‍य में लगे रहते थे।
वे यज्ञकर्ता, दूसरों को मान देने वाले, धनुर्धर तथा विष्‍णु भक्तिपरायण थे।
वे राज्‍य पर अपने पुत्र को बिठाकर स्‍वयं मलयाचल पर चले गये और वहाँ तपस्‍या आरम्भ करके एक लाख वर्ष तक उसी में लगे रहे। 
उनके आश्रम में एक समय महर्षि पुलस्‍त्‍य शिष्‍यों के साथ आये, उनको देखकर भी वे मानी राजर्षि न तो उठकर खडे़ हुए और न उनके सामने प्रणत ही हुए। 
तब पुलस्‍त्‍य ने उन्‍हें शाप दे दिया- 'ओ महादुष्‍ट भूपाल, तू दैत्‍य हो जा।' 

तदनन्‍तर राजा जब उनके चरणों में पड़कर शरणागत हो गये, तब दीनवत्‍सल मुनिश्रेष्‍ठ पुलस्‍त्‍य ने उनसे कहा- 'द्वापर के अन्‍त में मथुरा जनपद के पवित्र व्रज मण्‍डल में साक्षात यदुवंशराज श्रीकृष्‍ण के बाहुबल से तुम्‍हे ऐसी मुक्ति प्राप्‍त होगी, जिसकी योगी लोग अभिलाषा रखते हैं- इसमें संशय नहीं है'।

श्रीनारदजी कहते है:- विदेहराज, वही यह राजा भीमरथ मय दैत्‍य का पुत्र हुआ और श्रीकृष्‍ण के बाहुवेग से मोक्ष को प्राप्‍त हुआ। 
एक दिन गोप बालकों के बीच में महाबली देत्‍य अरिष्‍ट आया, वह अपने सिंहनाद से पृथ्‍वी ओर आकाश को गुँजा रहा था और सींगों से पर्वतीय तटों को विदीर्ण कर रहा था। 
उसे देखते ही गोपियाँ, गोप तथा गौओं के समुदाय भय से इधर-उधर भागने लगे। 
दैत्‍यों के नाशक भगवान श्रीकृष्‍ण ने उन सबको अभय देते हुए कहा- 'डरो मत।' 

माधव ने उसके सींग पकड़ लिये और उसने पीछे ढकेल दिया, उस राक्षस ने भी श्रीकृष्‍ण को ढकेलकर दो योजन पीछे कर दिया। 
तब श्रीकृष्‍ण उसकी पूँछ पकड़ ली और बाहुवेग से घुमाते हुए उसे उसी प्रकार पृथ्‍वी पर पटक दिया, जैसे छोटा बालक कमण्‍डल को फेंक दे। 
अरिष्‍ट फिर उठा, क्रोध से उसके नेत्र लाल हो रहे थे, उस महादुष्‍ट वीर ने सींगो से लाल पत्‍थर उखाडकर मेघ की भाँति गर्जना करते हुए श्रीकृष्‍ण के ऊपर फेंका। 

श्रीकृष्‍ण ने उस प्रस्‍तर को पकड़कर उलटे उसी पर दे मारा, उस शिलाखण्‍ड के प्रहार से वह मन-ही-मन कुछ व्‍याकुल हो उठा। 
उसने अपने सींगों के अग्रभाग को पृथ्‍वी पर पटना आरम्‍भ किया, इससे पृथ्‍वी के भीतर से पानी निकल आया। 
तब श्रीकृष्‍ण ने उसके सींग पकड़कर बार-बार घुमाते हुए उसे पृथ्‍वी पर उसी प्रकार दे मारा, जैसे हवा कमल को उठाकर फेंक देती है। 
उसी समय वह वृषभ का रूप त्‍यागकर ब्राह्मण शरीरधारी हो गया और श्रीकृष्‍ण के चरणाविन्‍दों में प्रणाम करके गदद वाणी में बोला।

ब्राह्मण ने कहा:- भगवन्, मैं बृहस्‍पति का शिष्‍य द्विजश्रेष्‍ठ वरतन्‍तु हूँ।
मैं बृहस्‍पतिजी के समीप पढ़ने गया था, उस समय उनकी ओर पाँव फैलाकर उनके सामने बैठ गया था। 
इससे वे मुनि रोषपूर्वक बोले- 'तू मेरे आगे बैल की भाँति बैठा है, इससे गुरु की अवहेलना हुई है, अत: दुर्बुद्धे, तू बैल हो जा।' 
माधव, उस शाप से मैं वंगदेश में बैल हो गया, असुरों के संग में रहने से मुझमें असुरभाव आ गया था।
अब आपके प्रसाद से मैं शाप और असुरभाव से मुक्‍त हो गया।
आप श्रीकृष्‍ण को नमस्‍कार है, आप भगवान वासुदेव को प्रणाम है, प्रणतजनों के केश का नाश करने वाले आप गोविन्‍ददेव को बारंबार नमस्‍कार है।

श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन्, यों कहकर श्रीहरि को नमस्‍कार करके बृहस्‍पति के साक्षात शिष्‍य वरतन्‍तु भुवन को प्रकाशित करते हुए विमान से दिव्‍यलोक को चले गये। 
इस प्रकार मैंने अद्भुत माधुर्य खण्‍ड का तुमसे वर्णन किया, जो सब पापों को हर लेने वाला, पुण्‍यदायक तथा श्रीकृष्‍ण की प्राप्ति कराने वाला उत्तम साधन है। 
जो सदा इसका पाठा करते हैं, उनकी समस्‍त कामनाओं को यह देने वाला है और क्‍या सुनना चाहते हो?।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में माधुर्य खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में 'व्‍योमासुर और अरिष्‍टासुर का वध' नामक चौबीसवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।
।।माधुर्य खण्‍ड सम्‍पूर्ण।।

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