04. माधुर्य खण्ड || अध्याय 11 || श्री लक्ष्मी जी की सखियों का वृषभानुओं के घरों में कन्या रूप से उत्पन्न होकर माघ मास के व्रत से श्रीकृष्ण को रिझाना और पाना।
श्री गर्ग संहिता
04. माधुर्य खण्ड || अध्याय 11 || श्री लक्ष्मी जी की सखियों का वृषभानुओं के घरों में कन्या रूप से उत्पन्न होकर माघ मास के व्रत से श्रीकृष्ण को रिझाना और पाना।
श्रीनारदजी कहते हैं:- मिथिलेश्वर, अब दूसरी का भी वर्णन सुनो, जो समस्त पापों को हर लेने वाला, पुण्यदायक तथा श्रीहरि के प्रति भक्ति भाव की वृद्धि करने वाला है।
राजन, व्रज में छ: वृषभानु उत्पन्न हुए हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं:- नीतिवित्, मार्गद, शुक्ल, पतंग, दिव्यावाहन तथा गोपेष्ट, ये नामानुरूप गुणों वाले थे।
उनके घर में लक्ष्मीपति नारायण के वरदान से जो कुमारियाँ उत्पन्न हुई, उनमें से कुछ तो रमा-वैकुण्ठवासिनी और कुछ समुद्र से उत्पन्न हुई लक्ष्मीजी की सखियाँ थीं।
कुछ अजितपदवासिनी और कुछ उर्ध्व वैकुण्ठलोक निवासिनी देवियाँ थीं, कुछ लोकाचलवासिनी समुद्रसम्भवा लक्ष्मी सहचारियाँ थीं।
उन्होंने सदा श्रीगोविन्द के चरणारविन्द का चिन्तन करते हुए माघ मास का व्रत किया, उस व्रत का उद्देश्य था- श्रीकृष्ण को प्रसन्न करना।
माघ मास के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को, जो भावी वसन्त के शुभागमन का सूचना प्रथम दिन है, उनके प्रेम की परीक्षा लेने के लिये श्रीकृष्ण उनके घर के निकट आये।
वे व्याघ्रचर्म का वस्त्र पहने, जटा के मुकुट बाँधे, समस्त अंगो में विभूति रमाये योगी के वेष में सुशोभित हो, वेणु बजाते हुए जगत् के लोगों का मन मोह रहे थे।
अपनी गलियों में उनका शुभागमन हुआ देख सब ओर से मोहित एवं प्रेम-विहृल हुई गोपांग्नाएं उस तरूण योगी का दर्शन करने के लिये आयीं।
उन अत्यंत सुन्दर योगी को देखकर प्रेम और आनन्द डूबी हुई समस्त गोपकन्याएँ परस्पर कहने लगीं।
गोपियाँ बोलीं:- यह कौन बालक है, जिसकी आकृति नन्दनन्दन से ठीक-ठीक मिलती-जुलती है, अथवा यह किसी धनी राजा का पुत्र होगा, जो अपनी स्त्री के कठोर वचनरूपी बाण से मर्म बिंध जाने के कारण घर से विरक्त हो गया और सारे कृत्यकर्म छोड बैठा है।
यह अत्यन्त रमणीय है, इसका शरीर कैसा सुकुमार है, यह कामदेव के समान सारे विश्व का मन मोह लेने वाला है।
अहो, इसकी माता, इसके पिता, इसकी पत्नी और इसकी बहिन इसके बिना कैसे जीवित होंगी,"।
यह विचार करके सब ओर से झुंड़-की-झुड़ व्रजांगनाएं उनके पास आ गयीं और प्रेम से विह्वल तथा आश्चर्य चकित हो उन योगीश्वर से पूछने लगीं।
गोपियों ने सिद्धयोगी बने भगवान श्री कृष्ण से पूछा:- "योगीबाबा, तुम्हारा नाम क्या है, मुनिजी तुम रहते कहाँ हो?
तुम्हारी वृत्ति क्या है और तुमने कौन-सी सिद्धि पायी है, वक्ताओं में श्रेष्ठ, हमें ये सब बातें बताओ।"
सिद्धयोगी ने कहा:- "मैं योगेश्वर हूँ और सदा मानसरोवर में निवास करता हूँ, मेरा नाम स्वयं प्रकाश है, मैं अपनी शक्ति से सदा बिना खाये-पीये ही रहता हूँ।
व्रजांगनाओं, परमहंसों का जो अपना स्वार्थ आत्म साक्षात्कार है, उसी की सिद्धि के लिये मैं जा रहा हूँ।
मुझे दिव्यदृष्टि प्राप्त हो चुकी है, मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों की बातें जानता हूँ, मंत्र-विद्या द्वारा उच्चाटन, मारण, मोहन, स्तम्भन तथा वशीकरण भी जानता हूँ।"
गोपियों ने पूछा:- "योगीबाबा, तुम तो बड़े बुद्धिमान हो; यदि तुम्हें तीनों कालों की बातें ज्ञात हैं तो बताओ न, हमारे मन में क्या है?"
सिद्धयोगी ने कहा:- "यह बात तो आप-लोगों के कान में कहने योग्य है अथवा यदि आप-लोगों की आज्ञा हो तो सब लोगों के सामने ही कह डालूँ।"
गोपियाँ बोली:- "मुने, तुम सचमुच योगेश्वर हो; तुम्हे तीनों कालों का ज्ञान है, इसमें संशय नहीं।
यदि तुम्हारे वशीकरण-मंत्र से, उसके पाठ करने मात्र से तत्काल वे यहीं आ जायँ, जिनका कि हम मन-ही-मन चिन्तन करती हैं, तब हम मानेंगी कि तुम मंत्रज्ञों में सबसे श्रेष्ठ हो।"
सिद्धयोगी ने कहा:- व्रजांगनाओं, तुमने तो ऐसा भाव व्यक्त किया है, जो परम दुर्लभ और दुष्कर है, तथापि मैं तुम्हारी मनोनीत वस्तु को प्रकट करूँगा, क्योंकि सत्पुरुषों की कही हुई बात छूठ नहीं होती।
व्रज की वनिताओ, चिन्ता न करो, अपनी आँखें मूँद लो, तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध होगा, इसमें संशय नहीं है।"
श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन , ‘बहुत अच्छा’ कहकर जब गोपियों ने अपनी आँखे मूँद लीं’ तब भगवान श्रीहरि योगी का रूप छोडकर श्रीनन्दनन्दन के रूप में प्रकट हो गये।
गोपियों ने आँखें खोलकर देखा तो सामने नन्दनन्दन सानन्दन मुस्करा रहे हैं।
पहले तो वे अत्यन्त विस्मित हुई, फिर योगी का प्रभाव जाने पर उन्हें हर्ष हुआ और प्रियतम का वह मोहन रूप देखकर वे मोहित हो गयीं।
तदनन्तर माघ मास के महारास में पावन वृन्दावन के भीतर श्रीहरि ने उन गोपांगनाओं के साथ उसी प्रकार विहार किया, जैसे देवांग्नाओं के साथ देवराज इन्द्र करते है।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में माधुर्य खण्ड के अन्तर्गत श्रीनारद बहुलाश्व संवाद में ‘रमावैकुण्ठ, श्वेतद्वीप, उर्ध्ववैकुण्ठ, अजितपद तथा श्रीलोकाचल में निवास करने वाली ‘लक्ष्मीजी की सखियों के गोपी रूप में प्रकट होने का आख्यान’ नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ।
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