07. विश्वजितखण्‍ड || अध्याय 01 || राजा मरुत्त का उपाख्‍यान

गर्ग संहिता 
07. विश्वजितखण्‍ड || अध्याय 01 || राजा मरुत्त का उपाख्‍यान

 नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय साक्षिणे । प्रद्युम्रायानिरुद्धाय नम: संकर्षणाय च॥1॥ 
सबके हृदय में वास करने वाले सर्वसाक्षी वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध– चतुर्व्‍यूहस्‍वरूप आप भगवान को नमस्‍कार है। 

अज्ञानतिमिरन्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकय। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम:॥2॥ 
मैं अज्ञानरुपी रतौंधी के रोग से अंधा हो रहा था। जिन्‍होंने ज्ञानांजन की शलाका से मेरी दिव्‍य दृष्टि खोल दी है, उन श्रीगुरुदेव को मेरा नमस्‍कार है। 

श्रीगर्गजी ने कहा- मुने ! इस प्रकार भगवान श्रीकृष्‍ण का चरित्र मैंने तुमसे कह सुनाया, जो मनुष्‍यों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों पुरुषार्थों का देने वाला है। अब और क्‍या सुनना चाहते हो ? 

शौनक ने कहा- तपोधन ! श्रीकृष्‍ण के प्रिय भक्‍त तथा श्रीहरि में प्रगाढ़ प्रीति रखने वाले मै‍थिलराज बहुलाश्‍व ने फिर देवर्षि नारद से क्‍या पूछा, वही प्रसंग मुझे सुनाइये। 

श्रीगर्गजी बोले- मुने ! भगवान श्रीकृष्‍ण ने उग्रसेन को यादवों का राजा बनाया, यह सुनकर मिथिला नरेश बहुलाश्‍व को बड़ा विस्‍मय हुआ। उन्‍होंने नारदजी से प्रश्‍न किया। 

बहुलाश्‍व बोले- देवर्ष ! ये मरुत्त कौन थे ? ये किस पुण्‍य से भूतल पर यदुवंशियों के राजा उग्रसेन हो गये ? जिनके स्‍वयं भगवान श्रीकृष्‍णचन्‍द्र भी सहायक हुए, उनकी महिमा अद्भुत है। देवर्षि-शिरोमणे ! उनकी महता क्‍या थी ? यह मुझे बताइये। 

श्रीनारदजी ने कहा- राजन् ! सत्‍ययुग में सूर्यवंशी राजा मरुत्त चक्रवर्ती सम्राट थे। उन्‍होंने विधिपूर्वक विश्वजित्यज्ञ का अनुष्‍ठान किया था। वे हिमालय के उतर भाग में बहुत बड़ी सामग्री एकत्र करके, मुनिश्रेष्‍ठ संवर्त को आचार्य बनाकर यज्ञ के लिये दीक्षित हुए। उनके यज्ञ में पांच योजन विस्‍तृत कुण्‍ड बना था। एक योजन का तो ब्रह्मकुण्‍ड था और दो- दो कोस के पांच कुण्‍ड और बने थे। कुण्‍ड के गर्त का जो विस्‍तार था, तदनुसार वेदियों से दस मेखलाएं बनी थीं। उस यज्ञमण्‍डप में जो स्‍तम्‍भ बड़ी शोभा पाता था। उसमें सोने का यज्ञमण्‍डप बना था, जिसका विस्‍तार बीस योजन था। चँदोवों, बंदनवारों और कदलीखण्‍ड से सह यज्ञमण्‍डप मण्डित था। उस यज्ञ में ब्रह्मा-रुद्र आदि देवता अपने गणों के साथ पधारे थे। उस यज्ञ में दस लाख होता, दस लाख दीक्षित, पांच लाख अध्‍वर्यु और उदाता अलग थे। वहाँ चारों वेदों के विद्वान ब्राह्मण बुलाये गये थे, जो सम्‍पूर्ण शास्‍त्रों के अर्थतत्‍व के ज्ञाता थे। 
उस यज्ञ में हाथी की सूँड़ के समान घी की मोटी घृत-धाराओं की आहुति दी गयी थी, जिसको खाकर अग्न‍िदेव को अजीर्ण का रोग हो गया। मिथिलेश्‍वर ! उस यज्ञ के विषय में ऐसा होना कोई विचित्र बात न जानो। 

उस यज्ञ में विश्‍वदेवगण सभासद थे। वे जिन जिनके लिये भाग देना आवश्‍यक बताते थे, उन उनके लिये भाग का परिवेषण स्‍वयं मरुद्गण करते थे। उस यज्ञ के समय त्रिलोकी में कोई भी ऐसे जीव नहीं नहीं थे, जो भूखे रह गये हों। सम्‍पूर्ण देवताओं को सोमरस पीते-पीते अजीर्ण हो गया था।

यजमान राजा मरुत ने उस यज्ञ में आचार्य ने उस यज्ञ में आचार्य संवर्त को जम्‍बूद्वीप का राज्‍य दे दिया। इसके सिवा चौदह लाख हाथी, चौदह लाख भार सुवर्ण, सौ अरबी घोड़े तथा नौ करोड़ बहुमूल्‍य रत्‍न भी यज्ञान्‍त में महात्‍मा आचार्य को दक्षिणा के रूप में दिये। प्रत्‍येक ब्राह्मण को उन्‍होंने पांच–पांच हजार घोडे़, सौ-सौ हाथी और सौ-सौ भार सुवर्ण के बने हुए थे, जो अत्‍यन्‍त उद्दीप्‍त दिखायी देते थे। उनमें भोजन करके सब ब्राह्मण संतुष्‍ट होकर विदा हुए। ब्राह्मणों के फेंके हुए उच्छिष्‍ट स्‍वर्णपात्रों से हिमालय के पार्श्‍व में सौ योजन का सुवर्णमय पर्वत बन गया था, जो आज भी देखा जा सकता है। राजा मरुत का जैसा यज्ञ हुआ, वैसा दूसरे किसी राजा का कभी नहीं हुआ। राजेन्‍द्र ! सुनो, त्रिलोकी में वेसा यज्ञ न हुआ है न होगा। उस यज्ञकुण्‍ड में साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्‍ण ने प्रकट होकर महात्‍मा राजा मरुत को अपने स्‍वरूप का दर्शन कराया था। उन श्रीहरि का दर्शन करके, उनके चरणों में माथानवाकर, राजा मरुत दोनों हाथ जोडे़, खडे़ रहे; कुछ बोल न सके। उनके शरीर में रोमांच हो आया और वे प्रेम से विह्वल हो गये। इस तरह न उन प्रेमपूरित नरेश को अपने चरणों में प्रणत हुआ देख साक्षात भगवान श्रीकृष्‍ण मेघ के समान गम्‍भीर वाणी में बोले। श्रीभगवान ने कहा- राजन् ! तुमने अपने विनय से मुझे संतुष्‍ट किया है। निष्‍काम भाव से सम्‍पादित उत्तम यज्ञों द्वारा मेरी पूजा की है। महामते ! तुम मुझसे कोई उत्तम वर मांग लो। मैं तुम्‍हें वह वरदान दूँगा, जो स्‍वर्ग के देवताओं के लिये भी दुर्लभ हैं। श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! राजा मरुत ने भगवान का उपर्युक्‍त वचन सुनकर, हाथ जोड़ परिक्रमा करके, उन परमेश्‍वर हरि का परम भक्ति भाव से विशद उपचारों द्वारा पूजन किया और प्रणाम करके अत्‍यन्‍त गद्गद वाणी में कहा।

मरुत बोले- श्रीपुरुषोतम ! आपके चरणारविन्‍दों से बढ़कर दूसरा कोई उत्तम वर मैं नहीं जानता। जैसे प्‍यास लगने पर दुर्बुद्धि नरपशु गंगाजी के तट पर पहुँचकर भी प्‍यास बुझाने के लिये कुआं खोदते हैं (उसी प्रकार आपके चरणारविन्‍दों को पाकर दूसरे किसी वर की इच्‍छा करना दुर्बुद्धि का ही परिचय देना है) तथापि हे व्रजेश्‍वर ! आपकी आज्ञा का गौरव रखने के लिये मैं यही वर मांगता हूँ कि मेरे हृदय-कमल से आपका चरणारविन्‍द कदापि दूर न जाय; क्‍योंकि वही चारों पुरुषार्थों तथा अर्थ-सम्‍पदाओं का मूल कहा गया है। श्रीभगवान बोले- राजन्! तुम्‍हारी निर्मल मति धन्‍य है। तुम्‍हें वरदान का लोभ दिये जाने पर भी तुम्‍हारी बुद्धि में किसी कामना का उदय नहीं हुआ है। तथापि तुम मुझ से कोई अभीष्‍ट वर मांग लो; क्‍योंकि फल देकर भक्‍त को सुखी किये बिना मुझे सुख नहीं मिलता। श्री भगवान बोले- राजन् ! जब तक इस मन्‍वन्‍तर के अट्ठाईस युग बीतेंगे, जब तक तुम स्‍वर्ग का सुख भोगकर अट्ठाईसवें द्वापर में मेरे साथ पृथ्‍वी पर आकर अपने मनोरथ के समुद्र को गोवत्‍सव की खुरी के समान बना लोगे। अर्थात उस समय तुम्‍हारा यह सारा मनोरथ अनायास ही पूर्ण हो जायगा। श्रीनारदजी कहते हैं- मिथिलेश्‍वर ! यों कहकर साक्षात भगवान श्रीकृष्‍ण वहीं अन्‍तर्धान हो गये। वे ही ये राजा मरुत उग्रसेन हुए। श्रीहरि ने स्‍वयं उनके राजसूय-यज्ञ करवाया। मैथिलेश्‍वर ! त्रिलोकी में कौन सी एसी वस्‍तु है, जो भगवत भक्‍तों के लिये दुर्लभ हो ? नृपोतम ! जो मनुष्‍य मरुत के इस चरित्र को सुनता है, उसे भक्तियुक्‍त ज्ञान और वैराग्‍य की प्राप्ति होती है। 

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्‍वजित खण्‍ड के अन्‍तर्गत श्रीनारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘श्रीमरूत्त का उपाख्‍यान’ नामक पहला अध्‍याय पूरा हुआ।

Comments

Popular posts from this blog

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन

21.01 *श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन वृत्त*

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य