03. गिरिराजखण्ड || अध्याय 07 ||गिरिराज गोवर्धन सम्‍बन्‍धी तीर्थों का वर्णन

श्री गर्ग संहिता
03. गिरिराजखण्ड || अध्याय 07 ||
गिरिराज गोवर्धन सम्‍बन्‍धी तीर्थों का वर्णन

बहुलाश्‍व ने पूछा:- महायोगिन, आप साक्षात दिव्‍य दृष्टि सम्‍पन्‍न है, अत: यह बताइये कि महात्‍मा गिरिराज के आस-पास अथवा उनके ऊपर कितने मुख्‍य तीर्थ हैं?

श्रीनारद बोले:- राजन, समूचा गोवर्धन पर्वत ही सब तीर्थों से श्रेष्‍ठ माना जाता है।
वृन्‍दावन साक्षात गोलोक है और गिरिराज को उसका मुकुट बताकर सम्‍मानित किया गया है। 
वह पर्वत गोपों, गोपियों तथा गौओं का रक्षक एवं महान कृष्‍णप्रिय है; जो साक्षात पूर्णब्रह्मा का छत्र बन गया, उससे श्रेष्‍ठ तीर्थ दूसरा कौन है। 
भुवनेश्‍वर एवं साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्‍ण ने, जो असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों के अधिपति, गोलोक के स्‍वामी तथा परात्‍पर पुरुष हैं, अपने समस्‍त जनों के साथ इन्‍द याग को धता बताकर जिसका पूजन आरम्‍भ किया, उस गिरिराज से अधिक सौभाग्‍यशाली कौन होगा। 

मैथिल, जिस पर्वत पर स्थित हो भगवान श्रीकृष्‍ण सदा ग्‍वाल-बालों के साथ क्रीड़ा करते हैं, उसकी महिमा का वर्णन करने में तो चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं।
जहां बड़े-बड़े पापों की राशि का नाश करने वाली मानसी गंगा विद्यमान हैं, विशद गोविन्‍दकुण्‍ड तथा शुभ्र चन्‍द्रसरोवर शोभा पाते हैं जहां राधाकुण्‍ड, कृष्‍णकुण्‍ड, ललितिकुण्‍ड, गोपालकुण्‍ड तथा कुसुमसरोवर सुशोभित हैं, उस गोवर्धन की महिमा का कौन वर्णन कर सकता है।
श्रीकृष्‍ण के मुकुट का स्‍पर्श पाकर जहां की शिला का दर्शन करने मात्र से मनुष्‍य देवशिरोमणि हो जाता है। 

जिस शिला पर श्रीकृष्‍ण चित्र अंकित किये हैं, वह चित्रित और पवित्र 'चित्रशिला' नाम की शिला आज भी गिरिराज के शिखर पर दृष्टिगोचर होती है। 

बालकों के साथ क्रीडा़ की थी, उसे 'कन्‍दुकक्षेत्र' कहते हैं। 
वहां 'शक्रपद' ओर 'ब्रह्मपद' नामक तीर्थ हैं, जिनका दर्शन और और जिन्‍हें प्रणाम करके मनुष्‍य इन्‍द्रलोक और ब्रह्मलोक में जाता है।
जो वहां की धूल में लोटता है, वह साक्षात विष्‍णु पद को प्राप्‍त होता है।
जहां माधव ने गोपों की पगडियां चुरायी थीं, वह महापापहारी तीर्थ उस पर्वतपर 'ओष्‍णीव' नाम से प्रसिद्ध है।

एक समय वहा दधि बेचने के लिये गोपवधुओं का समुदाय आ निकला।
उनके नूपुरों की झनकार सुनकर मदनमोहन श्रीकृष्‍ण ने निकट आकर उनकी राह रोक ली। 
वंशी और नेत्र धारण किये श्रीकृष्‍ण ग्‍वाल-बालों द्वारा उनको चारों ओर से घेर लिया और स्‍वयं उनके आगे पैर रखकर मार्ग में उन गोपियों से बोले:- 'इस मार्ग पर हमारी ओर से कर वसूल किया जाता है, सो तुम लोग हमारा दान दे दो'।

गोपियाँ बोली:- तुम बडे़ टेढे़ हो, जो ग्‍वाल बालों के साथ राह रोककर खडे़ हो गये? 
तुम बडे़ गोरस-लम्‍पट हो; हमारा रास्‍ता छोड़ दो, नहीं तो माँ-बाप सहित तुमको हम बलपूर्वक राजा कंस के कारागार में डलवा देंगी।

श्रीभगवान ने कहा:- अरी, कंस का क्‍या हर दिखाती हो, मैं गोओं की शपथ खाकर कहता हूँ, महान उग्रदण्‍ड धारण करने वाले कंस को मैं उसके बन्‍धु-बान्‍धव सहित मार डालूँगा, अथवा मैं उसके मथुरा से गोवर्धन की घाटी में खींच लाऊंगा।

श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन, यों कहकर बालकों द्वारा पृथक-पृथक सबके दही पात्र मँगवाकर नन्‍दनन्‍दन बडे़ आनन्‍द के साथ भूमि पर पटक दिये। 

गोपियाँ परस्‍पर कहने लगीं:- 'अहो, यह नन्‍द का लाला तो बड़ा ही ढीठ और निडर है, निरकुंश है; इसके साथ तो बात भी नहीं करनी चाहिये। 
यह गाँव में तो निर्बल बना रहता है और वन में आकर वीर बन जाता है; हम आज ही चलकर यशोदाजी ओर नन्‍दरायजी से कहती है।'
यों कहकर गोपियाँ मुस्‍कराती हुई अपने घर को लौट गयीं। 

इधर माधव ने कदम्‍ब और पलाश के पत्‍ते के दोने बनाकर बालकों के साथ चिकना-चिकना दही ले-लेकर खाया तब से वहाँ वृक्षों के पत्‍ते दोने के आकार के होने लग गये। 
नृपेश्‍वर, वह परम पुण्‍य क्षेत्र 'द्रोण' नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो मनुष्‍य वहाँ दहीदान करके स्‍वयं भी पत्‍ते में रखे हुए दही को पीकर उस तीर्थ को नमस्‍कार करता है, उसकी गोलोक से कभी च्‍यूति नहीं होती। 
जहाँ नेत्र मूँदकर माधव बालकों के साथ लुका-छिपी के खेल खेलते थे, वहाँ 'लौकिक' नामक पापनाशन तीर्थ हो गया।

श्रीहरि लीला युक्‍त जो 'कदम्‍ब खण्‍ड' नामक तीर्थ है, वहाँ सदा ही श्रीकृष्‍ण लीलारत रहते हैं; इस तीर्थ का दर्शन करने मात्र से नर नारायण हो जाता है। 
मैथिली, जहाँ गोवर्धन पर रास में श्रीराधा ने श्रृंगार धारण किया था, वह स्‍थान 'श्रृंगार मण्‍डल' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 
नरेश्‍वर, श्रीकृष्‍ण ने जिस रूप से गोवर्धन पर्वत को धारण किया था, उनका वही रूप श्रृंगार मण्‍डल तीर्थ में विद्यमान है। 
जब कलियुग के चार हजार आठ सौ वर्ष बीत जायेंगे, तब श्रृंगार मण्‍डल क्षेत्र में गिरिराज की गुफा के मध्‍य भाग से सबके देखते-देखते श्रीहरि का स्‍वत: सिद्ध रूप प्रकट होगा। 
नरेश्‍वर, देवताओं का अभिमानचूर करने वाले उस स्‍वरूप को सज्‍जन पुरुष 'श्रीनाथजी' के नाम से पुकारेंगे। 
राजन, गोर्वधन पर्वत पर श्रीनाथ जी सदा ही लीला करते हैं; मैथिलेन्‍द्र, कलियुग में जो लोग अपने नेत्रों से श्रीनाथ जी के रूप का दर्शन करेंगे, वे कृतार्थ हो जायेंगे।

भगवान श्री कृष्ण भारत को चारों कोनों में क्रमश: जगन्‍नाथ, श्रीरंगनाथ, श्रीद्वारकानाथ और श्रीबद्रीनाथ के नाम से प्रसिद्ध है।
नरेश्‍वर, भारत के मध्‍य भाग में भी वे गोवर्धनाथ के नाम से विद्यमान हैं, इस प्रकार पवित्र भारत वर्ष में यह रहते हैं, उन सबका दर्शन करके नर नारायण हो जाता है। 
जो विद्वान पुरुष इस भूतल पर चारों नाथों की यात्रा करके मध्‍यवर्ती देवदमन श्रीगोवर्धन नाथ का दर्शन नहीं करता, उसे यात्रा का फल नहीं मिलता। 
जो गोवर्धन पर्वत पर देवदमन श्रीनाथ का दर्शन कर लेता है, उसे पृथ्‍वी पर चारों नाथों की यात्रा का फल प्राप्‍त हो जाता है।

मैथिल, जहाँ ऐरावत और सुरभि गौके चरणों के चिन्‍ह है, वहाँ नमस्‍कार करके पापी मनुष्‍य भी वैकुण्‍ठ धाम में चला जाता है। 
जो कोई भी मनुष्‍य महात्‍मा श्रीकृष्‍ण के हस्‍तचिन्‍ह का और चरणचिन्‍ह का दर्शन कर लेता है, वह साक्षात श्रीकृष्‍ण के धाम में जाता है। 
नरेश्‍वर, ये तीर्थ, कुण्‍ड और मन्दिर गिरिराज के अंगभूत है, उनको बता दिया, अब और क्‍या सुनना चाहते हो?

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीगिरिराज खण्‍ड के अन्‍तर्गत श्रीनारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘श्रीगिरिराज के तीर्थों का वर्णन' नामक सातवां अध्‍याय पूरा हुआ।

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