01. गोलोक खण्ड || अध्याय 15 || यशोदा द्वारा श्रीकृष्ण के मुख में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का दर्शन; नन्द और यशोदा के पूर्व-पुण्य का परिचय; गर्गाचार्य का नन्द-भवन में जाकर बलराम और श्रीकृष्ण के नामकरण संस्कार करना तथा वृषभानु के यहाँ जाकर उन्हें श्रीराधा-कृष्ण के नित्य-सम्बन्ध एवं माहात्म्य का ज्ञान कराना।

01. गोलोक खण्ड || अध्याय 15 ||   यशोदा द्वारा श्रीकृष्ण के मुख में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का दर्शन; नन्द और यशोदा के पूर्व-पुण्य का परिचय; गर्गाचार्य का नन्द-भवन में जाकर बलराम और श्रीकृष्ण के नामकरण संस्कार करना तथा वृषभानु के यहाँ जाकर उन्हें श्रीराधा-कृष्ण के नित्य-सम्बन्ध एवं माहात्म्य का ज्ञान कराना।

श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! एक दिन साँवले-सलोने बालक श्री कृष्ण सोने के रत्नजटित पालने पर सोये हुए थे। उनके मुख पर लोगों के मन को मोहने वाले मन्द हास्य की छटा छा रही थी। दृष्टिजनित पीड़ा के निवारण के लिये नन्द नन्दन के ललाट पर काजल का डिठौना शोभा पा रहा था। कमल के समान सुन्दर नेत्रों में काजल लगा था। अपने उस सुन्दर लाला को मैया यशोदा ने गोद में ले लिया। वे बालमुकुन्द पैर का अँगूठा चूस रहे थे। उनका स्वभाव चपल था। नील, नूतन, कोमल एवं घुँघराले केशबन्धों से उनकी अंगच्छटा अद्भुत जान पड़ती थी। वक्ष:स्थल पर श्रीवत्स चिह्न, बघनखा तथा चमकीला अर्धचन्द्र (नामक आभूषण) शोभा दे रहे थे। अपार दयामयी गोपी श्री यशोदा अपने उस लाला को लाड़ लड़ाती हुई बड़े आनन्द का अनुभव कर रही थी।
राजन! बालक श्रीकृष्ण दूध पी चुके थे। उन्हें जँभाई आ रही थी। माता की दृष्टि उधर पड़ी तो उनके मुख में पृथिव्यादि पाँच तत्त्वों सहित सम्पूर्ण विराट (ब्रह्माण्ड) तथा इन्द्रप्रभृति श्रेष्ठ देवता दृष्टिगोचर हुए। तब श्री यशोदा के मन में त्रास छा गया। अत: उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं। महाराज ! परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्ण सर्वश्रेष्ठ हैं। उनकी ही माया से सम्पूर्ण संसार सत्तावान बना है। उसी माया के प्रभाव से यशोदा जी की स्मृति टिक न सकी। फिर अपने बालक श्रीकृष्ण पर उनका वात्सल्यपूर्ण दयाभाव उत्पन्न हो गया। अहो ! श्री नन्दरानी के तप का वर्णन कहाँ तक करूँ !! श्री बहुलाश्व ने पूछा- मुनिवर ! नन्दजी ने यशोदा के साथ कौन-सा महान तप किया था, जिसके प्रभाव से भगवान श्रीकृष्णचन्द्र उनके यहाँ पुत्र रूप में प्रकट हुए।

श्री नारद जी ने कहा- आठ वसुओं में प्रधान जो ‘द्रोण’ नामक वसु हैं, उनकी स्त्री का नाम ‘धरा’ है। इन्हें संतान नहीं थी। वे भगवान श्री विष्णु के परम भक्त थे। देवताओं के राज्य का भी पालन करते थे। राजन ! एक समय पुत्र की अभिलाषा होने पर ब्रह्माजी के आदेश से वे अपनी सहधर्मिणी धरा के साथ तप करने के लिये मन्दराचल पर्वत पर गये। वहाँ दोनों दम्पति कन्द, मूल एवं फल खाकर अथवा सूखे पत्ते चबाकर तपस्या करते थे। बाद में जल के आधार पर उनका जीवन चलने लगा। तदनंतर उन्होंने जल पीना भी बन्द कर दिया। इस प्रकार जनशून्य देश में उनकी तपस्या चलने लगी। उन्हें तप करते जब दस करोड़ वर्ष बीत गये, तब ब्रह्माजी प्रसन्न होकर आये और बोले- ‘वर माँगो’। उस समय उनके ऊपर दीमकें चढ़ गयी थीं। अत: उन्हें हटाकर द्रोण अपनी पत्नि के साथ बाहर निकले। उन्होंने ब्रह्मा जी को प्रणाम किया और विधिवत उनकी पूजा की। उनका मन आनन्द से उल्लसित हो उठा। वे उन प्रभु से बोले

श्री द्रोण ने कहा- ब्रह्मण ! विधे ! परिपूर्णतम जनार्दन भगवान श्री कृष्ण मेरे पुत्र हो जायँ और उनमें हम दोनों की प्रेम लक्षणा भक्ति सदा बनी रहे, जिसके प्रभाव से मनुष्य दुर्लभजन्या भवसागर को सहज ही पार कर जाता है। हम दोनों तपस्वीजनों को दूसरा कोई वर अभिलषित नहीं है।

श्री ब्रह्माजी बोले- तुम लोगों ने मुझ से जो वर माँगा है, वह कठिनाई से पूर्ण होने वाला और अत्यंत दुर्लभ है। फिर भी दूसरे जन्म में तुम लोगों की अभिलाषा पूरी होगी।

श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! वे ‘द्रोण’ ही इस पृथ्वी पर ‘नन्द’ हुए और ‘धरा’ ही ‘यशोदा नाम से विख्यात हुई। ब्रह्मा जी की वाणी सत्य करने के लिये भगवान श्री कृष्ण पिता वसुदेव जी की पुरी मथुरा से व्रज में पधारे थे। भगवान श्रीकृष्ण का शुभ चरित्र सुधा-निर्मित खाँड़ से भी अधिक मीठा है। गन्धमादन पर्वत के शिखर पर भगवान नर-नारायण के श्रीमुख से मैंने इसे सुना है। उनकी कृपा से मैं कृतार्थ हो गया। वही कथा मैंने तुमसे कही है; अब और क्या सुनना चाहते हो?

श्री बहुलाश्व ने पूछा- महामुने ! शिशुरूपधारी उन सनातन पुरुष भगवान श्रीहरि ने बलराम जी के साथ कौन-कौन-सी लीलाएँ कीं, यह मुझे बताइये। श्री नारद जी ने कहा- राजन ! एक दिन वसुदेवजी के भेजे हुए महामुनि गर्गाचार्य अपने शिष्यों के साथ नन्दभवन में पधारे। नन्द जी ने पाद्य आदि उत्तम उपचारों द्वारा मुनिश्रेष्ठ गर्ग की विधिवत पूजा की और प्रदक्षिणा करके उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। नन्दजी बोले- आज हमारे पितर, देवता और अग्नि सभी संतुष्ट हो गये। आपके चरणों की धूलि पड़ने से हमारा घर परम पवित्र हो गया। महामुने ! आप मेरे बालक का नामकरण कीजिये। विप्रवर प्रभो ! अनेक पुण्यों और तीर्थों का सेवन करने पर भी आपका शुभागमन सुलभ नहीं होता।

श्री गर्गजी ने कहा- नन्दराय जी ! मैं तुम्हारे पुत्र का नामकरण करूँगा, इसमें संशय नहीं है; किंतु कुछ पूर्वकाल की बात बताऊँगा, अत: एकांत स्थान में चलो। श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! तदनन्तर गर्ग जी नन्द यशोदा तथा दोनों बालक श्रीकृष्ण एवं बलराम को साथ लेकर गोशाला में, जहाँ दूसरा कोई नहीं था, चले गये। वहाँ उन्होंने उन बालकों का नामकरण संस्कार किया। सर्वप्रथम उन्होंने गणेश आदि देवताओं का पूजन किया, फिर यत्नपूर्वक ग्रहों का शोधन (विचार) करके हर्ष से पुलकित हुए महामुनि गर्गाचार्य नन्द से बोले। गर्गजी ने कहा- ये जो रोहिणी के पुत्र हैं, इनका नाम बताता हूँ- सुनो। इनमें योगीजन रमण करते हैं अथवा ये सब में रमते हैं या अपने गुणों द्वारा भक्त जनों के मन को रमाया करते हैं, इन कारणों से उत्कृष्ट ज्ञानीजन इन्हें ‘राम’ नाम से जानते हैं। योगमाया द्वारा गर्भ का संकर्षण होने से इनका प्रादुर्भाव हुआ है, अत: ये ‘संकर्षण’ नाम से प्रसिद्ध होंगे। अशेष जगत का संहार होने पर भी ये शेष रह जाते हैं, अत: इन्हें लोग ‘शेष’ नाम से जानते हैं। सबसे अधिक बलवान होने से ये ‘बल’ नाम से भी विख्यात होंगे।*¹

नन्द ! अब अपने पुत्र के नाम सावधानी के साथ सुनो- ये सभी नाम तत्काल प्राणिमात्र को पावन करने वाले तथा चराचर समस्त जगत के लिये परम कल्याणकारी है। ‘क’ का अर्थ है- कमलाकांत; ‘ऋ’ कार का अर्थ है- राम; ‘ष’ अक्षर षड़विध ऐश्वर्य के स्वामी श्वेत द्वीप निवासी भगवान विष्णु का वाचक है। ‘ण’ नरसिंह का प्रतीक है और ‘अकार’ अक्षर अग्निभुक (अग्निरूप से हविष्य के भोक्ता अथवा अग्नि देव के रक्षक) का वाचक है तथा दोनों विसर्ग रूप बिन्दु (:) नर-नारायण के बोधक हैं। ये छहों पूर्ण तत्त्व जिस महामंत्र रूप परिपूर्णतम शब्द में लीन हैं, वह इसी व्युत्पत्ति के कारण ‘कृष्ण' कहा गया है। अत: इस बालक का एक नाम ‘कृष्ण’ अंग कांति को प्राप्त हुआ है, इस कारण से यह नन्दनन्दन ‘कृष्ण’ नाम से विख्यात होगा।

इनका एक नाम ‘वासुदेव’ भी है। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है- ‘वसु’ नाम है इन्द्रियों का। इनका देवता है-चित्त। उस चित्त में स्थित रहकर जो चेष्टाशील है, उन अंतर्यामी भगवान को ‘वासुदेव’ कहते हैं। वृषभानु की पुत्री राधा जो कीर्ति के भवन में प्रकट हुई हैं, उनके ये साक्षात प्राणनाथ बनेंगे; अत: इनका एक नाम ‘राधापति’ भी है। जो साक्षात परिपूर्णतम स्वयं भगवान श्रीकृष्णचन्द्र हैं, असंख्य ब्रह्माण्ड जिनके अधीन हैं और जो गोलोकधाम में विराजते हैं, वे ही परम प्रभु तुम्हारे यहाँ बालकरूप से प्रकट हुए हैं। पृथ्वी का भार उतारना, कंस आदि दुष्टों का संहार करना और भक्तों की रक्षा करना- ये ही इनके अवतार के उद्देश्य हैं।

भरतवंशोद्भव नन्द! इनके नामों का अंत नहीं है। वे सब नाम वेदों में गूढ़रूप से कहे गये हैं। इनकी लीलाओं के कारण भी उन-उन कर्मों के लेकर आश्चर्य नहीं करना चाहिये। तुम्हारा अहोभाग्य है; क्योंकि जो साक्षात परिपूर्णतम परात्पर श्री पुरुषोत्तम प्रभु हैं, वे तुम्हारे घर पुत्र के रूप में शोभा पा रहे हैं।

श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! यों कहकर श्री गर्गजी जब चले गये, तब प्रमुदित हुए महामति नन्दराय ने यशोदा सहित अपने को पूर्ण काम एवं कृतकृत्य माना। तदनंतर ज्ञानिशिरोमणि ज्ञानदाता मुनि श्रेष्ठ श्रीगर्गजी यमुना तट पर सुशोभित वृषभानु जी की पुरी में पधारे। छत्र धारण करने से वे दूसरे इन्द्र की तथा दण्ड धारण करने से साक्षात धर्मराज की भाँति सुशोभित होते थे। साक्षात दूसरे सूर्य की भाँति वे अपने तेज से सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे। पुस्तक तथा मेखला से युक्त विप्रवर गर्ग दूसरे ब्रह्मा की भाँति प्रतीत होते थे। शुक्ल वस्त्रों से सुशोभित होने के कारण वे भगवान विष्णु की सी शोभा पाते थे। उन मुनिश्रेष्ठ को देख कर वृषभानु जी ने तुरंत उठकर अत्यंत आदर के साथ सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर वे उनके सामने खड़े हो गये। पूजनोपचार के ज्ञाता वृषभानु ने मुनि को एक मंगलमय आसन पर बिठाकर पाद्य आदि के द्वारा उन ज्ञानिशिरोमणि गर्ग का विधिवत पूजन किया। फिर उनकी परिक्रमा करके महान ‘वृषभानुवर’ इस प्रकार बोले

श्री वृषभानु ने कहा- संत पुरुषों का विचरण शान्तिमय है; क्योंकि वह गृहस्थ जनों को परम शांति प्रदान करने वाला है। मनुष्यों के भीतरी अन्धकार का नाश महात्माजन ही करते हैं, सूर्यदेव नहीं। भगवन ! आपका दर्शन पाकर हम सभी गोप पवित्र हो गये। भूमण्डल पर आप जैसे साधु-महात्मा पुरुष तीर्थों को भी पावन बनाने वाले होते हैं। मुने ! मेरे यहाँ एक कन्या हुई है, जो मंगल की धाम है और जिसका ‘राधिका’ नाम है। आप भली-भाँति विचार कर यह बताने की कृपा कीजिये कि इसका शुभ विवाह किसके साथ किया जाय। सूर्य की भाँति आप तीनों लोकों में विचरण करते हैं। आप दिव्यदर्शन हैं, जो इसके अनुरूप सुयोग्य वर होगा, उसी के हाथ में इस कल्याणमयी कन्या को दूंगा।

श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! तदनंतर मुनिवर गर्गजी वृषभानु जी का हाथ पकड़े यमुना के तट पर गये। वहाँ एक निर्जन और अत्यंत सुन्दर स्थान था, जहाँ कालिन्दीजल की कल्लोल मालाओं की कल-कल ध्वनि सदा गूँजती रहती थी। वहीं गोपेश्वर वृषभानु को बैठाकर धर्मज्ञ मुनीन्द्र गर्ग इस प्रकार कहने लगे।

श्री गर्ग जी बोले- वृषभानुजी ! एक गुप्त बात है, यह तुम्हें किसी से नहीं कहनी चाहिये। जो असंख्य ब्रह्माण्डों के अधिपति, गोलोकधाम के स्वामी, परात्पर तथा साक्षात परिपूर्णतम हैं; जिनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है; स्वयं वे ही भगवान श्री कृष्ण नन्द के घर में प्रकट हुए हैं।

श्री वृषभानु ने कहा- महामुने ! नन्दजी का भी भाग्य अद्भुत है, धन्य एवं अवर्णनीय है। अब आप भगवान श्री कृष्ण के अवतार का सम्पूर्ण कारण मुझे बताइये।

श्री गर्ग जी बोले- पृथ्वी का भार उतारने और कंस आदि दुष्टों का विनाश करने के लिये ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर भगवान श्री कृष्ण पर अवतीर्ण हुए है। उन्हीं परम प्रभु श्रीकृष्ण की पटरानी, जो प्रिया श्री राधिकाजी गोलोकधाम में विराजती हैं, वे ही तुम्हारे घर पुत्री रूप से प्रकट हुई है। तुम उन पराशक्ति राधिका को नहीं जानते।

श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! उस समय गोप वृषभानु के मन में आनन्द की बाढ़ आ गयी और वे अत्यंत विस्मित हो गये। उन्होंने कलावती (कीर्ति) को बुलाकर उनके साथ विचार किया। पुन: श्रीराधा-कृष्ण के प्रभाव को जानकर गोपवर वृषभानु आनन्द के आँसू बहाते हुए पुन: महामुनि गर्ग से कहने लगे।

श्री वृषभानु ने कहा- द्विजवर! उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण को मैं अपनी यह कमलनयनी कन्या समर्पण करूँगा। आपने ही मुझे यह सन्मार्ग दिखलाया है; अत: आपके द्वारा ही इसका शुभ विवाह-संस्कार सम्पन्न होना चाहिये।

श्री गर्ग जी ने कहा- राजन ! श्री राधा और श्री कृष्ण का पाणिग्रहण संस्कार मैं नहीं कराऊँगा। यमुना के तट पर भाण्डीर-वन में इनका विवाह होगा। वृंदावन के निकट जनशून्य सुरम्य स्थान में स्वयं श्रीब्रह्माजी पधारकर इन दोनों का विवाह करायेंगे। गोपवर ! तुम इन श्रीराधिका को भगवान श्री कृष्ण की वल्लभा समझो। संसार में राजाओं के शिरोमणि तुम हो और लोकों का शिरोमणि गोलोकधाम है। तुम सम्पूर्ण गोप गोलोकधाम से ही इस भूमण्ड़ल आये हो। वैसे ही समस्त गोपियाँ भी श्री राधिका जी की आज्ञा मानकर गोलोक से आयी हैं। बड़े-बड़े यज्ञ करने पर देवताओं को भी अनेक जन्मों तक जिनकी दर्शन दुर्घट है, वे साक्षात श्री राधिका जी तुम्हारे मन्दिर के आँगन में गुप्त रूप से विराज रही हैं और बहुसंख्यक गोप और गोपियाँ उनका साक्षात दर्शन करती हैं।

श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! श्री राधिकाजी और भगवान श्रीकृष्ण का यह प्रशंसनीय प्रभाव सुनकर श्रीवृषभानु और कीर्ति दोनों अत्यंत विस्मित तथा आनन्द से आह्वादित हो उठे और गर्गजी से कहने लगे। दम्पति बोले- ब्राह्मण ! ‘राधा’ शब्द की तात्त्विक व्याख्या बताइये। महामुने इस भूतल पर मनके संदेह दूर करने वाला आपके समान दूसरा कोई नहीं है। श्री गर्ग जी ने कहा- एक समय की बात है, मैं गन्धमादन पर्वत पर गया। साथ में शिष्य वर्ग भी थे। वहीं भगवान नारायण के श्रीमुख से मैंने सामवेद का यह सारांश सुना है। ‘रकार’ से रमा का, ‘आकार’ से गोपिकाओं का, ‘धकार’ से धरा का तथा ‘आकार’ से विरजा नदी का ग्रहण होता है। परमात्मा भगवान श्रीकृष्ण का सर्वोत्कृष्ट तेज चार रूपों में विभक्त हुआ। लीला, भू, श्री और विरजा ये चार पत्नियाँ ही उनका चतुर्विध तेज हैं। ये सब-की-सब कुंज भवन में जाकर श्री राधिका जी के श्रीविग्रह में लीन हो गयीं। इसीलिये विज्ञजन श्री राधा को ‘परिपूर्णतम’ कहते हैं। गोप! जो मनुष्य बारंबार ‘राधाकृष्ण’ के इस नाम का उच्चारण करते हैं, उन्हें चारों पदार्थ तो क्या, साक्षात भगवान श्रीकृष्ण भी सुलभ हो जाते हैं *³।

श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! उस समय भार्या सहित श्री वृषभानु के आश्चर्य की सीमा न रही। श्रीराधा-कृष्ण के दिव्य प्रभाव को जानकर वे आनन्द के मूर्तिमान विग्रह बन गये। इस प्रकार श्री वृषभानु ने ज्ञानिशिरोमणि श्री गर्ग जी की पूजा की। तब वे सर्वज्ञ एवं त्रिकालदर्शी मुनीन्द्र गर्ग स्वयं अपने स्थान को सिधारे।

इस प्रकार श्री गर्ग संहिता में गोलोक खण्ड के अंतर्गत नारद-बहुलाश्व संवाद में ‘नन्द-पत्नि का विश्वरूप दर्शन तथा श्रीकृष्ण–बलराम नामकरण संस्कार’ नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ


*¹ रमन्ते योगिनी ह्यस्मिन् सर्वत्र रमतीति वा ।। गुणैश्च रमयन् भक्तां स्तेमन रामं विदु: परे । गर्भसंकर्षणादस्ये संकर्षण इति स्मृत: ।। सर्वावशेषाद् यं शेषं बलाधिक्यांद् बलं विदु: (गर्ग0, गोलोक0 15। 25-26½)

*² सद्य: प्राणिपवित्राणि जगतां मंगलानि च। ककार: कमलाकान्त‍ ॠकारो राम इत्यिपि ।।
षकार: षड्गुणपति: श्वेगतद्वीपनिवासकृत्। णकारो नरसिंहोऽयमकारो ह्यक्षरोऽग्निभुक् ।।
विसर्गौ च तथा ह्येतौ नरनारायणावृषी। सम्प्रनलीनाश्च षट् पूर्णा यस्मिञ्छब्दे महामनौ ।।
परिपूर्णतमे साक्षात् तेन कृष्ण : प्रकीर्तित:। शुक्लो‍ रक्तस्तथा पीतो वर्णोऽस्याभनुयुगं धृत: ।।
द्वापरान्ते कलेरादौ बालोऽयं कृष्ण‍तां गत:। तस्मामत् कृष्ण् इति ख्या तो नाम्नायं नन्दनन्दन: ।-(गर्ग0, गोलोक0 15। 28-32)

*³ रमया तु रकार: स्‍यादाकारस्‍त्‍वादिगोपिका। धकारो धरया हि स्‍यादाकारो विरजा नदी ।। श्रीकृष्‍णस्‍य परस्‍यापि चतुर्धा तेजसोऽभवत्। लीला भू: श्रीश्च विरजा चतस्‍त्र: पत्‍न्‍य हि ।। सम्‍प्रलीनाश्च ता: सर्वा राधायां कुञ्जमन्दिरे। परिपूर्णतमां राधां तस्‍मादाहुर्मनीषिण: ।। राधाकृष्‍णेति हे गोप ये जपन्ति पुन: पुन:। चतुपष्‍दार्थं किं तेषां साक्षात् कृष्‍णोऽपि लभ्‍यते ।।-(गर्ग0, गोलोक0 15। 68-71)


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