01. गोलोक खण्ड || अध्याय 16 || भाण्डीर वन में नन्दजी के द्वारा श्री राधाजी की स्तुति

01. गोलोक खण्ड || अध्याय 16 || भाण्डीर वन में नन्दजी के द्वारा श्री राधाजी की स्तुति: श्री राधा और श्रीकृष्ण का ब्रह्माजी के द्वारा विवाह; ब्रह्माजी के द्वारा श्रीकृष्ण का स्तवन तथा नवदम्पति की मधुर लीलाएँ

श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! एक दिन नन्द जी अपने नन्दन को अंक में लेकर लाड़ लड़ाते और गौएँ चराते हुए खिरक के पास से बहुत दूर निकल गये। धीरे-धीरे भाण्डीर वन जा पहुँचे, जो कालिन्दी-नीर का स्पर्श करके बहने वाले तीरवर्ती शीतल समीर के झोंके से कम्पित हो रहा था। थोड़ी ही देर में श्रीकृष्ण की इच्छा से वायु का वेग अत्यंत प्रखर हो उठा। आकाश मेघों की घटा से आच्छादित हो गया। तमाल और कदम्ब वृक्षों के पल्लव टूट-टूटकर गिरने, उड़ने और अत्यंत भय का उत्पादन करने लगे। उस समय महान अन्धकार छा गया। नन्द नन्दन रोने लगे। वे पिता की गोद में बहुत भयभीत दिखायी देने लगे। नन्द को भी भय हो गया। वे शिशु को गोद में लिये परमेश्वर श्री हरि की शरण में गये।

उसी क्षण करोड़ों सूर्यों के समूह की सी दिव्य दीप्ति उदित हुई, जो सम्पूर्ण दिशाओं में व्याप्त थी; वह क्रमश: निकट आती-सी जान पड़ी उस दीप्ति राशि के भीतर नौ नन्दों के राजा ने वृषभानु नन्दनी श्रीराधा को देखा। वे करोड़ों चन्द्र मण्डलों की कांति धारण किये हुए थी। उनके श्री अंगों पर आदिवर्ण नील रंग के सुन्दर वस्त्र शोभा पा रहे थे। चरण प्रांत में मंजीरों की धीर-ध्वनि से युक्त नूपुरों का अत्यंत मधुर शब्द हो रहा था। उस शब्द में कांचीकलाप और कंकणों की झनकार भी मिली थी। रत्नमय हार, मुद्रिका और बाजूबन्दों की प्रभा से वे और भी उद्भासित हो रही थी। नाक में मोती की बुलाक और नकबेसर की अपूर्व शोभा हो रही थी। कण्ठ में कंठा, सीमंत पर चूड़ामणि और कानों में कुण्डल झलमला रहे थे। श्री राधा के दिव्य तेज अभिभूत हो नन्द ने तत्काल उनके सामने मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा- ‘राधे ! ये साक्षात पुरुषोत्तम हैं और तुम इनकी मुख्य प्राणवल्लभा हो, यह गुप्त रहस्य मैं गर्गजी के मुख से सुनकर जानता हूँ। राधे ! अपने प्राणनाथ को मेरे अंक से ले लो। ये बादलों की गर्जना से डर गये हैं। इन्होंने लीलावश यहाँ प्रकृति के गुणों को स्वीकार किया है।
इसीलिये इनके विषय में इस प्रकार भयभीत होने की बात कही गयी है। देवि ! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। तुम इस भूतल पर मेरी यथेष्ट रक्षा करो। तुमने कृपा करके ही मुझे दर्शन दिया है, वास्तव में तो तुम सब लोगों के लिये दुर्लभ हो’*¹। 
श्री राधा ने कहा- नन्द जी ! तुम ठीक कहते हो। मेरा दर्शन दुर्लभ ही है। आज तुम्हारे भक्ति-भाव से प्रसन्न होकर ही मैंने तुम्हें दर्शन दिया है। 

श्री नन्द बोले- देवि ! यदि वास्तव में तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो तुम दोनों प्रिया-प्रियतम के चरणारविन्दों में मेरी सुदृढ भक्ति बनी रहे। साथ ही तुम्हारी भक्ति से भरपूर साधु-संतों का संग मुझे सदा मिलता रहे। प्रत्येक युग में उन संत-महात्माओं के चरणों में मेरा प्रेम बना रहे।

श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! तब ‘तथास्तु’ कहकर श्रीराधा ने नन्द जी को गोद से अपने प्राणनाथ को दोनों हाथों में ले लिया। फिर जब नन्दराय जी उन्हें प्रणाम करके वहाँ से चले गये, तब श्री राधिका जी भाण्डीर वन में गयीं। पहले गोलोकधाम से जो ‘पृथ्वी देवी’ इस भूतल पर उतरी थी, वे उस समय अपना दिव्य रूप धारण करके प्रकट हुई। उक्त धाम में जिस तरह पद्भराग मणि से जटित सुवर्णमयी भूमि शोभा पाती है, उसी तरह इस भूतल पर भी व्रजमण्डल में उस दिव्य भूमिका तत्क्षण अपने सम्पूर्ण रूप से आविर्भाव हो गया। वृन्दावन काम पूरक दिव्य वृक्षों के साथ अपन दिव्य रूप धारण करके शोभा पाने लगा।

कलिन्दनन्दिनी यमुना भी तट पर सुवर्णनिर्मित प्रासादी तथा सुन्दर रत्नमय सोपानों से सम्पन्न हो गयी। गोवर्धन पर्वत रत्नमयी शिलाओं से परिपूर्ण हो गया। उसके स्वर्णमय शिखर सब ओर से उद्भासित होने लगे। राजन ! मतवाले भ्रमरों तथा झरनों से सुशोभित कन्दराओं द्वारा वह पर्वतराज अत्यंत ऊँचे अंग वाले गजराज की भाँति सुशोभित हो रहा था। उस समय वृन्दावन के निकुंज ने भी अपना दिव्य रूप प्रकट किया। उसमें सभाभवन, प्रांगण तथा दिव्य मण्डप शोभा पाने लगे। वसंत ऋतु की सारी मधुरिमा वहाँ अभिवयक्त हो गयी। मधुपों, मयूरों, कपोतों तथा कोकिलों के कलरव सुनायी देने लगे।

निकुंजवर्ती दिव्य मण्डपों के शिखर सुवर्ण-रत्नादि से खचित कलशों से अलंकृत थे। सब ओर फहराती हुई पताकाएँ उनकी शोभा बढ़ाती थी। वहाँ एक सुन्दर सरोवर प्रकट हुआ, जहाँ सुवर्णमय सुन्दर सरोज खिले हुए थे और उन सरोजों पर बैठी हुई मधुपावलियाँ उनके मधुर मकरन्द का पान कर रही थी। दिव्यधाम की शोभा का अवतरण होते ही साक्षात पुरुषोत्तमोत्तम घनश्याम भगवान श्रीकृष्ण किशोरावस्था के अनुरूप दिव्य देह धारण करके श्री राधा के सम्मुख खड़े हो गये। उनके श्री अंगों पर पीताम्बर शोभा पा रहा था। कौस्तुभ मणि से विभूषित हो, हाथ में वंशी धारण किये वे नन्दनन्दन राशि-राशि मन्मथों (कामदेवों) को मोहित करने लगे। उन्होंने हँसते हुए प्रियतमा का हाथ अपने हाथ में थाम लिया और उनके साथ विवाह-मण्डप में प्रविष्ट हुए। उस मण्ड़प में विवाह की सब सामग्री संग्रह करके रखी गयी थी। मेखला, कुशा, सप्तमृत्तिका और जल से भरे कलश आदि उस मण्ड़प की शोभा बढ़ा रहे थे। वहीं एक श्रेष्ठ सिंहासन प्रकट हुआ, जिस पर वे दोनों प्रिया-प्रियतम एक-दूसरे से सटकर विराजित हो गये और अपनी दिव्य शोभा का प्रसार करने लगे। वे दोनों एक-दूसरे से मीठी-मीठी बातें करते हुए मेघ और विधुत की भाँति अपनी प्रभा से उद्दीप्त हो रहे थे। उसी समय देवताओं में श्रेष्ठ विधाता-भगवान ब्रह्मा आकाश से उतर कर परमात्मा श्रीकृष्ण के सम्मुख आये और उन दोनों के चरणों में प्रणाम करके, हाथ जोड़ कमनीय वाणी द्वारा चारों मुखों से मनोहर स्तुति करने लगे।
श्री ब्रह्मा जी बोले- प्रभो ! आप सबके आदि कारण हैं, किंतु आपका कोई आदि-अंत नहीं है। आप समस्त पुरुषोत्तमों में उत्तम हैं। अपने भक्तों पर सदा वात्सल्य भाव रखने वाले और ‘श्रीकृष्ण’ नाम से विख्यात हैं। अगणित ब्रह्माण्ड के पालक-पति हैं। ऐसे आप परात्पर प्रभु राधा-प्राणवल्लभ श्रीकृष्णचन्द्र की मैं शरण लेता हूँ। आप गोलोकधाम के अधिनाथ है, आपकी लीलाओं का कहीं अंत नहीं है। आपके साथ ये लीलावती श्रीराधा अपने लोक (नित्यधाम) में ललित लीलाएँ किया करती हैं। जब आप ही ‘वैकुण्ठनाथ’ के रूप में विराजमान होते हैं, तब ये वृषभानु नन्दिनी ही ‘लक्ष्मी’ रूप से आपके साथ सुशोभित होती हैं। जब आप ‘श्रीरामचन्द्र’ के रूप में भूतल पर अवतीर्ण होते हैं, तब ये जनक नन्दिनी ‘सीता’ के रूप में आपका सेवन करती हैं। आप ‘श्रीविष्णु’ हैं और ये कमलवन वासिनी ‘कमला’ हैं; जब आप ‘यज्ञ-पुरुष’ का अवतार धारण करते हैं, तब ये श्रीजी आपके साथ ‘दक्षिणा’ रूप में निवास करती हैं। आप पति शिरोमणी हैं तो ये पत्नियों में प्रधान हैं। आप ‘नृसिंह’ हैं तो ये आपके ह्र्दय में ‘रमा’ रूप से निवास करती हैं। आप ही ‘नर-नारायण’ रूप से रहकर तपस्या करते हैं, उस समय आपके साथ ये ‘परम शांति’ के रूप में विराजमान होती हैं।

आप जहाँ जिस रूप में रहते हैं, वहाँ तदनुरूप देह धारण करके ये छाया की भाँति आपके साथ रहती हैं। आप ‘ब्रह्म’ हैं और ये ‘तटस्था प्रकृति’। आप जब ‘काल’ रूप से स्थित होते हैं, तब इन्हें ‘प्रधान’ (प्रकृति) के रूप में जाना जाता है। जब आप जगत के अंकुर ‘महान’ (महत्तत्त्व) रूप में स्थित होते हैं। तब ये श्रीराधा ‘सगुण माया’ रूप से स्थित होती हैं। जब आप मन, बुद्धि, चित्त और अन्हकार-इन चारों अंत:करणों के साथ ‘अंतरात्मा’ रूप से स्थित होते हैं, तब ये श्रीराधा ‘लक्षणावृत्ति’ के रूप में विराजमान होती हैं।

जब आप ‘विराट’ रूप धारण करते हैं, तब ये अखिल भूमण्डल में ‘धारणा’ कहलाती हैं। पुरुषोत्तमोत्तम ! आपका ही श्याम और गौर-द्विविध तेज सर्वत्र विदित है। आप गोलोकधाम के अधिपति परात्पर परमेश्वर हैं। मैं आपकी शरण लेता हूँ। जो इस युगलरूप की उत्तम स्तुति का सदा पाठ करता है, वह समस्त धामों में श्रेष्ठ गोलोकधाम में जाता है और इस लोक में भी उसे स्वभावत: सौन्दर्य, समृद्धि और सिद्धियों की प्राप्ति होती है। यद्यपि आप दोनों नित्य-दम्पत्ति हैं और परस्पर प्रीति से परिपूर्ण रहते हैं, परात्पर होते हुए भी एक-दूसरे के अनुरूप रूप धारण करके लीला-विलास करते हैं; तथापि मैं लोक-व्यवहार की सिद्धि या लोकसंग्रह के लिये आप दोनों की वैवाहिक विधि सम्पन्न कराऊँगा।*²

श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! इस प्रकार स्तुति करके ब्रह्माजी ने उठकर कुण्ड में अग्नि प्रज्वलित की और अग्निदेव के सम्मुख बैठे हुए उन दोनों प्रिया-प्रियतम के वैदिक विधान से पाणिग्रहण-संस्कार की विधि पूरी की। यह सब करके ब्रह्माजी ने खड़े होकर श्री हरि और राधिकाजी से अग्निदेव की सात परिक्रमाएँ करवायीं। तदनंतर उन दोनों को प्रणाम करके वेदवेत्ता विधाता ने उन दोनों से सात मंत्र पढ़्वाये। उसके बाद श्रीकृष्ण के वक्ष:स्थल पर श्रीराधिका का हाथ रखवाकर और श्रीकृष्णल का हाथ श्रीराधिका के पृष्ठ।देश में स्थाापित करके विधाता ने उनसे मंत्रों का उच्चंस्व्र से पाठ करवाया। उन्होंने राधा के हाथों से श्रीकृष्णप के कण्ठम में एक केसरयुक्त माला पहनायी, जिस पर भ्रमर गुञ्जार कर रहे थे। इसी तरह श्रीकृष्णो के हाथों से भी वृषभानु नन्दिनी के गले में माला पहनवाकर वेदज्ञ ब्रह्माजी ने उन दोनों से अग्निदेव को प्रणाम करवाया और सुन्दार सिंहासन पर इन अभिनव दम्प्ति को बैठाया। वे दोनों हाथ जोड़े मौन रहे। पितामह ने उन दोनों से पांच मंत्र पढ़वाये और जैसे पिता अपनी पुत्री का सुयोग्यम वर के हाथ में दान करता है, उसी प्रकार उन्होंंने श्रीराधा को श्रीकृष्णा के हाथ में सौंप दिया।

राजन ! उस समय देवताओं ने फूल बरसाये और विद्याधरियों के साथ देवताओं ने फूल बरसाये और विद्याधरियों के साथ देवांगनाओं ने नृत्यत किया। गन्ध र्वों, विद्याधरों, चारणों और किंनरों ने मधुर स्वरर से श्रीकृष्ण के लिए सुमंगल गान किया। मृदंग, वीण, मुरचंग, वेणु, शंख, नगारे, दुन्दुसभि तथा करताल आदि बाजे बजनेलगे तथा आकाश में खडे़ हुए श्रेष्ठय देवताओं ने मंगल शब्दर का उच्चे स्व र से उच्चाणरण करते हुए बारम्बाुर जय जयकार किया। उस अवसर पर श्रीहरि ने विधाता से कहा- ब्रह्मन् ! आप अपनी इच्छास के अनुसार दक्षिणा बताइये। तब ब्रह्माजी ने श्रीहरि से इस प्रकार कहा- प्रभो ! मुझे अपने युगलचरणों की भक्ति ही दक्षिणा के रूप में प्रदान कीजिये। श्रीहरि ने ‘तथास्तुइ’ कहकर उन्हेंे अभीष्टझ वरदान दे दिया।तब ब्रह्माजी ने श्रीराधिका के मंगलमय युगल चरणारविन्दोंा को दोनों हाथों और मस्तरक से बारम्बाेर प्रणाम करके अपने धाम को प्रस्थाबन किया। उस समय प्रणाम करके जाते हुए ब्रह्माजी के मन में अत्यंयत हर्षोल्लामस छा रहा था।

तदन्तखर निकुञ्जभवन में प्रियतमा द्वारा अर्पित दिव्यी मनोरम चतुर्विध*³ अन्ने परमात्मा श्रीहरि ने हंसते-हंसते ग्रहण किया और श्रीराधा ने भी श्रीकृष्णर के हाथों से चतुर्विध अन्नन ग्रहण करके उनकीदी हुई पान-सुपारी भी खायी। इसके बाद श्री‍हरि अपने हाथ से प्रिया का हाथ पकड़कर कुञ्ज की ओर चले। वे दोनों मधुर आलाप करते तथा वृंदावन, यमुना तथा वन की लताओं को देखते हुए आगे बढ़ने लगे। सुन्दञर लता कुञ्जों और निकुञ्जों में हंसते और छिपते श्रीकृष्ण को शाखा की ओट में देखकर पीछे से आती हुई श्रीराधा ने उनके पीताम्बर का छोर पकड़ लिया।

फि‍र श्रीराधा भी माधव के कमलोपम हाथों से छूटकर भागीं और युगल-चरणों के नूपुरों की झनकार प्रकट करती हुई यमुना निकुञ्ज में छिप गयीं। जब श्रीहरि से एक हाथ की दूरी पर रह गयीं, तब पुन: उठकर भाग चलीं। जैसे तमाल सुनहरी लता से और मेघ चपला से सुशोभित होता है तथा जैसे नीलम का महान पर्वत स्वरर्णांकित कसौटी से शोभा पाता है, उसी प्रकार रमणी श्रीराधा से नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सुशोभित हो रहे थे। रास-रंगस्थली निर्जन प्रदेश में पहुँचकर श्रीहरि ने श्रीराधा के साथ रास का रस लेते हुए लीला-रमण किया। भ्रमरों और मयूरों कल-कूजन से मुखरित लताओं वाले वृन्दावन में वे दूसरे कामदेव की भाँति विचर रहे थे। परमात्मा श्रीकृष्ण हरि ने, जहाँ मतवाले भ्रमर गुञ्जारव करते थे, बहुत-से झरने तथा सरोवर जिनकी शोभा बढ़ाते थे और जिनमें दीप्तिमती लता-वल्लरियाँ प्रकाश फैलाती थीं, गोवर्धन की उन कन्दराओं में श्रीराधा के साथ नृत्य किया।

तत्पश्चात् श्रीकृष्ण ने यमुना में प्रवेश करके वृषभानु नन्दिनी के साथ विहार किया। वे यमुना जल में खिले हुए लक्षदल कमल को राधा के हाथ से छीनकर भाग चले। तब श्रीराधा ने भी हंसते-हंसते उनका पीछा किया और उनका पीताम्बर, वंशी तथा बेंत की छड़ी अपने अधिकार में कर लीं। श्रीहरि कहने लगे- ‘मेरी बांसुरी दे दो’ तब राधा ने उत्तर दिया- ‘मेरा कमल लौटा दो’ तब देवेश्वेर श्रीकृष्ण ने उन्हें कमल दे दिया। फिर राधा ने भी पीताम्बर, वंशी और बेंत श्रीहरि के हाथ में लौटा दिये। इसके बाद फि‍र यमुना के किनारे उनकी मनोहर लीलाएँ होने लगीं।

तदन्तर भाण्डीर-वन में जाकर व्रज गोप रत्न श्रीनन्दनन्दन ने अपने हाथों से प्रिया का मनोहर श्रृंगार किया- उनके मुख पर पत्र-रचना की, दोनों पैरों में महावर लगाया, नेत्रों में काजल की पतली रेखा खींच दी तथा उत्तमोत्तम रत्नों और फूलों से भी उनका श्रृंगार किया। इसके बाद जब श्रीराधा भी श्रीहरि को श्रृंगार धारण कराने के लिए उद्यत हुई, उसी समय श्रीकृष्ण अपने किशोर रूप को त्यागकर छोटे-से बालक बन गये। नन्द ने जिस शिशु को जिस रूप में राधा के हाथों में दिया था, उसी रूप में वे धरती पर लौटने और भय से रोने लगे। 

श्रीहरि को इस रूप में देखकर श्रीराधिका भी तत्काल विलाप करने लगीं और बोलीं- ‘हरे ! मुझ पर माया क्यों फैलाते हो ?’ इस प्रकार विषादग्रस्त होकर रोती हुई श्रीराधा से सहसा आकाशवाणी ने कहा- ‘राधे ! इस प्रकार सोच न करो। तुम्हा रा मनोरथ कुछ काल के पश्चात् पूर्ण होगा’।

यह सुनकर श्रीराधा शिशुरूपधारी श्रीकृष्ण को लेकर तुरंत व्रजराज की धर्मपत्नी। यशोदाजी के घर गयीं और उनके हाथ में बालक को देकर बोलीं- आपने पतिदेव ने मार्ग में इस बालक को मुझे दे दिया था। इसी समय नन्दय गृहिणी ने श्रीराधा से कहा- ‘वृषभानुनन्दिनी राधे ! तुम धन्य हो, क्योंकि तुमने इस समय जबकि आकाश मेघों की घटा से आच्छ्न्न है, वन के भीतर भयभीत हुए मेरे नन्हें से लाला की पूर्णतया रक्षा की है। यों कहकर नन्दरानी ने श्रीराधा का भली-भाँति सत्कार किया और उनके सद्गुणों की प्रशंसा की। इससे वृषभानुनन्दिनी श्रीराधा को बड़ी प्रसन्नता हुई। यशोदाजी की आज्ञा ले धीरे-धीरे अपने घर चली गयीं।

राजन इस प्रकार श्रीराधा के विवाह की मंगलमयी गुप्त कथा का यहाँ वर्णन किया गया। जो लोग इसे सुनते-पढ़ते अथवा सुनाते हैं, उन्हें कभी पापों का स्पर्श नहीं प्राप्त होता। 

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में गोलोक खण्ड के अन्तर्गत श्रीनारद-बहुलाश्व संवाद में ‘श्रीराधिका के विवाह का वर्णन’ नामक सोलहवां अध्याय पूरा हुआ।




*¹ तदैव कोटयर्कसमूहदीप्तिरागच्छेती वा चलती दिशासु। बभूव तस्यां वृषभानुपुत्रीं ददर्श राधां नवनन्दभराज: ।। कोटीन्दुतबिम्बहद्युतिमादधानां नीलाम्ब रं सुन्दरमादिवर्णन्। मञ्जीरधीरध्वनिनूपुराणामाबिभ्रतीं शब्दषमतीवमञ्जुम् ।। काञ्चीकलाकंकणशब्दुमिश्रां हारांगुलीयांगदविस्फमरन्तीम्। श्रीनासिकामौक्तिकहंसिकीभि: श्रीकण्ठाचूडामणिकुण्डरलाढयाम् ।। तत्तेजसा धर्षित आशु नन्दोा नत्वा।थ तामाह कृताञ्जलि: सन्। अयं तु साक्षात्पुिरुषोत्तणमस्वंशब प्रियासि मुख्या सि सदैव राधे ।। गुप्तं। त्विदं गर्गमुखेन वेद्मि गुहाण राधे निजनाथमंकात्। एनं गृहं प्रापय मेघभीतं वदामि चेत्थंस प्रकृतेर्गुणाढयम् ।। नमामि तुभ्यंत भुवि रक्ष मां त्वंह यथेप्सितं सर्वजनैर्दुरापा ।-(गर्ग0, गोलोक, 16। 4-8½)

*² अनादिमाद्यं पुरुषोत्तमोत्तमं श्रीकृष्‍णचन्‍द्र निजभक्तवत्‍सलम्। स्‍वयं त्‍वसंख्‍याण्‍डपतिं परात्‍परं राधापतिं त्‍वां शरणं व्रजाम्‍यहम् ।। गोलोकनाथस्‍त्‍वमतीवलीलो लीलावतीयं निजलोकलीला। वैकुण्‍ठनाथोऽसि य‍दा त्‍वमेव लक्ष्‍मीस्‍तदेयं वृषभानुजा हि ।। त्‍वं रामचन्‍द्रो जनकात्‍मजेयं भूमौ हरिस्‍त्‍वं कमलालयेयम्। यज्ञावतारोऽसि यदा तदेयं श्रीर्दक्षिणा स्‍त्री पतिपत्निमुख्‍यौ । त्‍वं नारसिंहाऽसि रमा हृदीयं नारायणस्‍त्‍वं च नरेण युक्त:। तदा त्वियं शान्तिरतीव साक्षाच्‍छायेव याता च तवानुरूपा ।। त्‍वं ब्रह्म चेयं प्रकृतिस्‍तटस्‍था कालो यदेमां च विदु: प्रधानम्। महान् यदा त्‍वं जगदंकुराऽसि राधा तदेयं सगुणा च माया ।। यदान्‍तरात्‍मा विदितश्चतुर्भिस्‍तदा त्वियं लक्षणरूपवृति:। यदा विराड्देहधरस्‍त्‍वमेव तदाखिलं वा भुवि धारणेयम् ।। श्‍यामं च गौरं विदितं द्विधा महस्‍तवैव साक्षात् पुरुषोत्‍तमोत्‍तम। गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्‍परं त्‍वां शरणं व्रजाम्‍यहम् ।। सदा पठेद् यो युगलस्‍तवं परं गोलोकधाम प्रवरं प्रयाति स:। इहैव सौन्‍दर्यसमृद्धिसिद्धयो भवन्ति तस्‍यापि निसर्गत: पुन: ।। यदा युवां प्रीतियुतौ च दम्‍पती परात्‍परौ तावनुरूपरूपिततौ। तथापि लोकव्‍यवहारसंग्रहाद् विधिं विवाहस्‍य तु कारयाम्‍यहम् ।।-(गर्ग0, गोलोक0 16। 21-29)

*³ भक्ष्यष, भोज्यओ, लेह्य, चोष्य - ये ही चार प्रकार के अन्नृ हैं।



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