01. गोलोक खण्ड || अध्याय 20 || दुर्वासा द्वारा भगवान की माया का एवं गोलोक में श्रीकृष्ण का दर्शन तथा श्रीनन्दनन्दरनस्तोत्र

01. गोलोक खण्ड || अध्याय 20 || दुर्वासा द्वारा भगवान की माया का एवं गोलोक में श्रीकृष्ण का दर्शन तथा श्रीनन्दनन्दरनस्तोत्र

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! एक दिन मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा परमात्मां श्रीकृष्णदचन्द्र का दर्शन करने के लिए व्रजमण्डल में आये। उन्होंने कालिन्दी के निकट पवित्र वालुकामय पुलिन के रमणीय स्थल में महावन के समीप श्रीकृष्ण को निकट से देखा। वे शोभाशाली मदनगोपाल बालकों के साथ वहाँ लोटते, परस्पर मल्ल युद्ध करते तथा भाँति-भाँति की बालोचित लीलाएँ करते थे। इन सब कारणों से वे बड़े मनोहर जान पड़ते थे। उनके सारे अंग धूल से धूसरित थे। मस्तक पर काले घुंघराले केश शोभा पाते थे। दिगम्बर वेष में बालकों के साथ दौड़ते हुए श्रीहरि को देखकर दुर्वासा के मन में बड़ा विस्माय हुआ। श्रीमुनि (मन-ही-मन) कहने लगे- क्या यह वही षडविध ऐश्व‍र्य से सम्पन्न ईश्वर है ? फिर यह बालकों के साथ धरती पर क्यों लौट रहा है ? मेरी समझ में यह केवल नन्द का पुत्र है, परात्पर श्रीकृष्ण नहीं है।

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! जब महामुनि दुर्वासा इस प्रकार मोह में पड़ गये, तब खेलते हुए श्रीकृष्ण स्वयं उनके पास उनकी गोद में आ गये।

फि‍र उनकी गोद से हट गये। श्रीकृष्ण की दृष्टि बाल-सिंह के समान थी। वे हंसते और मधुर वचन बोलते हुए पुन: मुनि के सम्मुख आ गये। हंसते हुए श्रीकृष्ण के श्वाास से खिंचकर मुनि उनके मुंह में समा गये। वहाँ जाकर उन्होंने एक विशाल लोक देखा, जिसमें अरण्य और निर्जन प्रदेश भी दृष्टिगोचर हो रहे थे। उन अरण्यों (जंगलों) में भ्रमण करते हुए मुनि बोल उठे- ‘मैं कहाँ से यहाँ आ गया ? इतने में ही उन महामुनि को एक अजगर निगल गया। उसके पेट में पहुँचने पर मुनि ने वहाँ सातों लोकों और पातालों सहित समूचे ब्रह्माण्ड का दर्शन किया। उसके द्वीपों में भ्रमण करते हुए दुर्वासा मुनि एक श्वेंत पर्वत पर ठहर गये। उस पर्वत पर शतकोटि वर्षों तक भगवान का भजन करते हुए वे तप करते रहे। इतने में ही सम्पूंर्ण विश्वर के लिए भयंकर नैमित्तिक प्रलय का समय आ पहुँचा।

समुद्र सब ओर से धरातल को डुबाते हुए मुनि के पास आ गये। दुर्वासा मुनि उन समुद्रों में बहने लगे। उन्हें जल का कहीं अन्त नहीं मिलता था। इसी अवस्था में एक सहस्रव युग व्यतीत हो गये। तदनन्तर मुनि एकार्णव के जल में डूब गये। उनकी स्मृति शक्ति नष्टी हो गयी। फि‍र वे पानी के भीतर विचरने लगे। वहाँ उन्हें एक दूसरे ही ब्रह्माण्ड का दर्शन हुआ। उस ब्रह्माण्ड के छिद्र में प्रवेश करने पर वे दिव्य सृष्टि में जा पहुँचे। वहाँ से उस ब्रह्माण्ड के शिरोभाग में विद्यमान लोकों में ब्रह्मा की आयु पर्यन्त विचरते रहे।

इसी प्रकार वहाँ एक छिद्र देखकर श्रीहरि का स्मरण करते हुए वे उसके भीतर घुस गये। घुसते ही उस ब्रह्माण्म के बाहर आ निकले। फि‍र तत्काल उन्हें महती जलराशि दिखायी दी। उस जलराशि में उन्हें कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों की राशियां बहती दिखायी दीं। तब मुनि ने जल को ध्यान से देखा तो उन्हें वहाँ विरजा नदी का दर्शन हुआ। उस नदी के पार पहुँचकर मुनि ने साक्षात गोलोक में प्रवेश किया। वहाँ उन्हें क्रमश: वृन्दावन, गोवर्धन और सुन्दर यमुना पुलिन का दर्शन करके बड़ी प्रसन्नता हुई। फि‍र वे मुनि जब निकुंज के भीतर घुसे, तब उन्होंने अनन्त कोटि मार्तण्डों के समान ज्योतिर्मण्डल के अन्दर दिव्य लक्षदल कमल पर विराजमान साक्षात परिपूर्णतम पुरुषोत्तम राधाबल्लभ भगवान श्रीकृष्ण को देखा, जो असंख्य गोप-गोपियों से घिरे तथा कोटि-कोटि गौओं से सम्पन्न‍ थे। असंख्य ब्रह्माण्डों के अधिपति उन भगवान श्रीहरि के साथ ही उनके गोलोक का भी मुनि को दर्शन हुआ।

उन्हें देखकर भगवान श्रीकृष्ण। हंसने लगे। हंसते समय उनके श्वास से खिंचकर दु‍र्वासा मुनि उनके मुख के भीतर पहुँच गये। उस मुख से पुन: बाहर निकलने पर उन्होंने उन्हीं बालरूपधारी श्रीनन्दनन्दन को देखा, जो कालिन्दी के निकटवर्ती पुण्य वालुकामय रमणस्थली में बालकों के साथ विचर रहे थे। महावन में श्रीकृष्ण का उस रूप में दर्शन करके दुर्वासा मुनि यह समझ गये कि ये श्रीकृष्ण साक्षात परात्पर ब्रह्मा हैं। फि‍र तो उन्होंने श्रीनन्दनन्दन को बार-बार नमस्कार करके हाथ जोड़कर कहा।

श्रीमुनि बोले- जिसके नेत्र नूतन विकसित शतदल कमल के समान विशाल हैं, अधर बिम्बा फल की अरुणिमा को तिरस्कृित करने वाले हैं तथा श्रीअंग सजल जलधर की श्याममनोहर कान्ति को छीन लेते हैं, जिनके मुख पर मन्द मुस्कान की दिव्य छटा छा रही है तथा जो सुन्दर मधुर मन्द गति से चल रहे हैं। उन बाल्यावस्था से विलसित मनोज्ञ श्रीनन्दनन्दन को मैं मन से प्रणाम करता हूँ। जिनके चरणों में मंजीर और नूपुर झंकृत हो रहे हैं और कटि में खनखनाती हुई नूतन रत्ननिर्मित कांची (करधनी) शोभा दे रही हैं, जो बघनखा से युक्त यन्त्रसमुदाय तथा सुन्दर कण्ठाहार से सुशोभित हैं, जिनके भालदेश में दृष्टि जनित पीड़ा हर लेने वाली कज्जल की बेंदी शोभा दे रही है तथा जो कलिन्दनन्दिनी के तट पर बालोचित क्रीड़ा में संलग्नन है, उन श्रीहरि की मैं वन्दना करता हूँ। जिनक पूर्णचन्द्रोपम सुन्दर मुख पर नूतन नीलघन को श्याम विभा को तिरस्कृत करने वाले घुंघराले काले केश चमक रहे हैं, तथा जिनका मस्तकरूपी मुकुद कुछ झुका हुआ है। उन आप नन्दनन्दन श्रीकृष्ण तथा आपके अग्रज श्रीबलराम को मेरा बारंबार नमस्कार है। जो प्रात:काल उठकर इस ‘श्रीनन्दनन्दनस्तोत्र’ का पाठ करता है, उसके नेत्रों के समक्ष श्रीनन्दनन्दन सानन्द प्रकट होते हैं *¹।

श्रीनारदजी कहते हैं- इस प्रकार श्रीकृष्ण को प्रणाम करके मुनि शिरोमणि दुर्वासा उन्हीं का ध्यान और जप करते हुए उत्तर में बदरिकाश्रम की ओर चले गये।

श्रीगर्ग कहते हैं- शौनक ! इस प्रकार देवर्षिप्रवर महात्मा नारद ने बुद्धिमान राजा बहुलाश्व को भगवान श्रीकृष्ण का चरित्र सुनाया था। ब्रह्मान् ! वह सब मैने तुमसे कह सुनाया। भगवान का सुयश कलिकलषु का विनाश करने वाला, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- चारों पदार्थों को देने वाला तथा दिव्य (लोकातीत) है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?

शौनक बोले- तपोधन ! इसके बाद मिथिलानरेश बहुलाश्व ने शान्तस्व‍रूप, ज्ञानदाता महामुनि नारद से क्या पूछा, वही प्रसंग मुझसे कहिये।

श्रीगर्गजी ने कहा- शौनक ! ज्ञानदाता नारदजी को नमस्कार करके मानदाता मैथिलनरेश ने पुन: उनसे श्रीकृष्ण चरित्र के विषय में, जो मंगल का धाम है, प्रश्न किया।

श्रीबहुलाश्वन ने पूछा- प्रभो ! परमानन्दविग्रह साक्षात भगवान् श्रीकृष्ण, ने इसके बाद और कौन-कौन सी विचित्र लीलाएं कीं, यह मुझे बताइये। पूर्व के अवतारों द्वारा भी मंगलमयचरित्र सम्पादित हुए हैं। इस श्रीकृष्णावतार के द्वारा इसके बाद और कौन-कौन से पवित्र चरित्र किये गये, यह सब बताइये।

श्रीनारदजी ने कहा- राजन ! तुम्हें अनेक साधुवाद हैं, क्योंकि तुमने श्रीहरि के मंगलमय चरित्र के विषय में प्रश्न किया है। वृन्दावन में जो उनकी यशोवर्धक लीलाएं हुई हैं, उनका मैं वर्णन करूंगा। यह गोलोकखण्ड अत्यंत गोपनीय और परम अद्भुत है। गोलोक में रासमंडल में साक्षात श्रीकृष्ण ने निकुंज में राधिका को सुनाया और श्री राधा ने मुझे इसका ज्ञान प्रदान किया है। फि‍र मैंने तुमको वह सब सुना दिया। यह गोलोक खण्ड का वृत्तान्त सम्पूर्ण पदार्थों को देने वाला उत्कृष्ट साधन है। यदि ब्राह्मण इसका पाठ करता है तो वह सम्पूर्ण शास्त्रों के अर्थ का ज्ञाता होता है। क्षत्रिय इसे सुने तो वह प्रचण्ड पराक्रमी चक्रवर्ती सम्राट होता है, वैश्य सुने तो वह निधिपति हो जाये और शुद्र सुने तो वह संसार के बन्धन से छुटकारा पा जाये। जो इस जगत में फल की कामना से रहित होकर इसका पाठ करता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है। जो सम्यक् भक्तिभाव से युक्त हो नित्य इसका पाठ करता है, वह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के गोलोकधाम में, जो प्रकृति से परे है, पहुँच जाता है*²।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में गोलोक खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘दुर्वासा के द्वारा भगवान कीमा या का दर्शन तथा श्रीनन्दनन्दनस्तोत्र का वर्णन’ नामक बीसवां अध्याय पूरा हुआ।



*¹ श्रीमुनिरुवाच - बालं नवनीशतपत्रविशालनेत्रं बिम्‍बाधरं सजलमेघरुचिं मनोज्ञम्। मन्‍दस्मितं मधुरसुन्‍दरमन्‍दयानं श्रीनन्‍दनन्‍दनमहं मनसा नमामि ।।
मजीरनूपुररणन्नवरत्‍नकांची श्रीहारकेसरिनखप्रतियन्‍त्रसंघम्। दृष्टियार्तिहारिमषिबिन्‍दुविराजमानं वन्‍दे कलिन्‍दतनुजातटबालकेलिम् ।।
पूर्णेन्‍दुसुन्‍दरमुखोपरि कुंचिताग्रा: केशा नवीनघननीलनिभा: स्फुरन्त:। राजन्‍त आनतशिर: कुमुदस्‍य यस्‍य नन्‍दात्‍मजाय सबलाय नमो नमस्‍ते ।।
श्रीनन्‍दनन्‍दनस्‍तोत्रं प्रातरुत्‍थाय य: पठेत्। तन्नेत्रगोचरं याति सानन्‍दं नन्‍दनन्‍दन: ।।-(श्रीगर्ग0 गोलोक0 २०। २४-२७)


* ²इदं गोलोकखण्‍डं च गुह्यं परममद्भुतम्। श्रीकृष्‍णेन प्रकथितं गोलोके रासमण्‍डले ।।
निकुंजे राधिकायै च राधा मह्यं ददाविदम्। मया तुभ्‍यं श्रावितं च दत्तं सर्वार्थदं परम् ।।
इदं पठति विप्रस्‍तु सर्वशास्‍त्रार्थगो भवेत्। श्रुत्‍वेदं चक्रवर्ती स्‍यात् क्षत्रियश्‍चण्‍डविक्रम: ।।
वैश्‍यो निधिपतिर्भूयाच्‍छूद्रो मुच्‍येत बन्‍धनात्। निष्‍फलो योऽपि जगति जीवन्‍मुक्त: स जायते ।।
यो नित्‍यं पठते सम्‍यग् भक्तिभावसमन्वित:। स गच्‍छेत् कृष्‍णचन्‍द्रस्‍य गोलोकं प्रकृते: परम् ।।-(गर्ग0 गोलोक0 २०। ३६-४०)

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