06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 10 || द्वारकापुरी; गोमती और चक्रतीर्थ का महात्‍म्‍य;

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 10 || द्वारकापुरी, गोमती और चक्रतीर्थ का महात्‍म्‍य; कुबेर के वैष्‍णवयज्ञ में दुर्वासा मुनि द्वारा घण्‍टानाद और पार्श्‍वमौलि को शाप

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे द्वारका के आगमन का कारण बाताया, जो समस्‍त पापों को हर लेने वाला और पुण्‍यदायक है; अब तुम और क्‍या सुनना चाहते हो ।

बहुलाक्ष ने पूछा‌‌- मुनिश्रेष्ठ! कल्याणस्वरूपा द्वारका से द्वारकानगरी की भमि सर्वतीर्थमयी है, अत: वहाँ के मुख्य-मुख्य तीर्थों को मुझे बताइये।

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! द्वारका से प्रभास तक की सीमा बनाकर जो तीर्थमयी यज्ञभूमि है, वही मोक्षदायिनी ‘द्वारका’ है। उसका विस्‍तार सौ योजन है। द्वारका नगरी का दर्शन करके नर नारायण हो जाता है। द्वारका में कोई गधा भी मर जाय तो वह चतुर्भुज होकर वैकुण्‍ठलोक में जाता है। जो द्वारका का दर्शन करता है, उसकी कथा सुनता है तथा कभी ’द्वारका’ इस नाम का उच्‍चारण करता है, अथवा वहाँ दर्शन– स्‍नान करके तिनके का भी दान करता है वह मृत्‍यु के पश्‍चात परमगति को प्राप्‍त होताहै।

एक समय भक्‍त रेवत को प्रेमानन्‍द में आकुल देख श्रीहरि ने उसे अपेन स्‍वरूप का दर्शन कराया। उस समय उनके मुँह पर अश्रुधारा बह चली थी। भगवान के नेत्र बिन्‍दुओं से महानदी गोमती प्रकट हुई, जिसके दर्शनमात्र से ब्रह्महत्‍या- जैसे पातको से छुटकारा मिल जाता है। जो मनुष्‍य गोमती-तट की पवित्र रज लेकर अपने सिर पर धारण करता है, वह सौ जन्‍मों के किये हुए पाप से तत्‍काल मुक्‍त हो जाता है– इसमें संशय नहीं है। मनुष्‍य कहीं भी स्‍नान करते समय यदि ’गोम‍ती’- इस नाम का उच्‍चारण कर लेता है ता उसे निस्‍संदह गोमती में स्‍नान करने का पुण्‍य फल प्राप्‍त हो जात है।

विदेहराज ! जो मकर-राशि में सूर्य के स्थित रहते समय माघ मास में प्रयाग की त्रिवेणी में स्‍नान करता है, वह सौ अश्‍वमेध-यज्ञों का पुण्‍य फल पा लेता है; परंतु यदि वह सूर्य के मकरगत होने पर गोमती में स्‍नान कर ले तो उसे प्रयाग स्‍नान की अपेक्षा सहस्‍त्र गुना अधिक पुण्‍य प्राप्‍त होता है। गोमती का माहात्‍मय अताने में चार मुखों वाले ब्रह्मा भी समर्थ नही हैं। गोमती के ’चक्रतीर्थ’ में जो-जो पाषाण हैं, वे सब के-सब चक्रभाव को प्राप्‍त होता है; अत: उनकी यत्‍नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। जो चक्र के चि‍न्‍ह से युक्‍त होने पर भी चक्रपाणि के पद को प्राप्‍त होता है।करोड़ों जन्‍मों के संचित पापों से पतित हुआ पात की मनुष्‍य भी चक्रतीर्थ की सीढ़ियों तक पहँचकर मोक्ष पद पर आरुढ़ हो जाता है। बहुलाश्‍व ने पूछा- महामते ! महानदी गोमती में जो चक्रतीर्थ है, वह शुभ अर्थ को देने वाला तथा लोगों के लिये अधिक माननीय कैसे हो गया ? मुझे बताइये।

श्रीनारदजी कहा- राजन् ! इसी विषय में विज्ञजन इस प्राचीन इतिहास का वर्णन किया करते हैं, जिसके के श्रवणमात्र से सर्वथा पापों की हानि हो जाती है। 

एक समय की बात है, अलकापुरी के स्‍वामी राजाधिराज धर्मात्‍मा निधिपति भगवान कुबेर ने कैलास के उतर तट की भूमि पर वैष्‍णवयज्ञ आरम्‍भ किया। उनके उस यज्ञ मे स्‍वयं भगवान विष्‍णु अपने धाम से उतर आये थे। ब्रह्म, शिव, जम्‍भभेदी, इन्‍द्र, जल-जन्‍तुओं के अधिपति वरुण, वायु, यम, सूर्य, सोम, सर्वजनेश्‍वरी, पृथ्‍वी, गन्‍धर्व, अप्‍सरा और सिद्ध-सभी उस यज्ञ में वहाँ पधारे थे। नरेश्‍वर ! समस्‍त देवर्षि और ब्रह्मर्षि भी वहाँ आये। उस समय कुबेर का पुत्र नलकूबर धनाध्‍यक्ष था। यज्ञ की रक्षा में वीरभद्र को नियुक्‍त किया गया था। सत्‍पुरुषों की सेवा का भार गजानन गणपति के ऊपर था। समस्‍त मरुद्रण रसोई परोसने का कार्य करते थे।

स्‍वामि कार्तिकेय धर्मपरायण रहकर सभा मण्‍डप में समागत अतिथि‍जनों की पूजा सत्‍कार करते थे तथा घण्‍टानाद और पार्श्‍व मौलि- ये दोनों कुबेर के मन्‍त्री, जो सम्‍पूर्ण शास्‍त्र वेताओं में श्रेष्‍ठ थे, दानाध्‍यक्ष बनाये गये थे। इस प्रकार महान उत्‍सव से परिपूर्ण उस यज्ञ का विधिपूर्वक अनुष्‍ठान सम्‍पन्न हुआ। यज्ञान्‍त का अवभृथ-स्‍नान करके महामनस्‍वी राजराज कुबेर ने देवताओं को उनका उत्तम भाग दिया और ब्राह्मणों को पर्याप्‍त दक्षिणा दी। इस प्रकार उस श्रेष्‍ठ यज्ञ के परिपूर्ण होने पर जब समस्‍त देवर्षिगण संतुष्‍ट हो गये, तब दण्‍ड, छत्र और जटा धारण किये महर्षि दुर्वासा वहाँ आ पहुँचे। वे स्‍वभाव से ही क्रोधी और कृशासन, समिधा, जलपात्र और मृगचर्म धारण किये वे श्रेष्‍ठ मुनि वहाँ पधारे। वहाँ पधारे हुए उन महर्षि पास जाकर उनकी विधिपूर्वक पूजा करके भयभीत हुए कुबेर ने परिक्रमापूर्वक उनके चरणों में प्रणाम किया और कहा- ‘ब्रह्मन्! आपके पदार्पण करने से आज मेरा जन्‍म सफल हो गया, भवन सार्थक हो गया और यह मेरा यज्ञ भी सफल हो गया’।

इस तरह उनके संतोष देने पर भगवान दुर्वासा मुनि जोर-जोर से हँसते हुए उन मनुष्‍यधर्मा देवता कुबेर से बोले- ‘तुम राजराज, धर्मात्‍मा, दानी और ब्राह्मण भक्‍त हो। तुमने भगवान विष्‍णु को संतुष्‍ट करने वाले वैष्‍णव यज्ञ का अनुष्‍ठान किया है। प्रभो! वैश्रवण! मैंने कहीं कभी भी तुमसे कुछ नहीं मांगा है,परंतु आज यदि तुमने मेरी याचना सफल कर दी तो मैं तुम्‍हें उत्तम वर दूँगा; नहीं तो अत्‍यन्‍त भयंकर शाप देकर तुम्‍हें भस्‍म कर डालूँगा। त्रिलोकी की सारी-नवों निधियां तुम्‍हारे घर में मौजूद हैं, उन सबको मुझे दे दो; तुम्‍हारा भला हो। मैं उन निधियों के लिये ही यहाँ आया हूँ।

नारदजी कहते हैं- राजन! यह सुनकर दानशील, उदारचेता, गुह्यकों के स्‍वामी राजराज ने उनसे कहा-‘बहुत अच्‍छा, आप मेरे प्रतिग्रह स्‍वीकार करें। इस प्रकार निधियों को दे डालने की चेष्‍टा करते हुए निधिपति कुबेर से उनके दानाध्‍यक्षमन्‍त्री घण्‍टानाद और पार्श्‍वमौलि लोभी से मोहित होकर बोले। उन दोनों ने कहा- यह लोभी ब्राह्मण अकेला ही तो है, सारी निधियां लेकर क्‍या करेगा ? इसे एक लाख दिव्‍य दीनार दे दीजिये, बाकी अपने पास रखिये। अपनी वृति की तथा उत्तर दिशा की रक्षा कीजिये।

नारदजी कहते हैं- राजन्! उन मन्त्रियों का वह कठोर वचन सुनकर दुर्वासा रोष से आग बबूला हो उठे। उनकी भौंहे टेढ़ी हो गयी तथा उनके नेत्र लाल हो गये। सारा ब्रह्मण्‍ड बटलोई की तरह दो निमेष तक हिलता रहा। कुबेर को अपने चरणों में पड़ा देख मुनि ने उन दोनों मन्त्रियों को शाप दे दिया।

मुनि ने कहा- महादुष्‍ट घण्‍टानाद! तेरी बुद्धि पाप में ही लगी रहने वाली है। तू अत्‍यन्‍त लोभी है, ग्राहक की भाँति धनग्राही है; अत: हे महाखल! तू ग्रहा हो जा। पापपूर्ण विचार रखने वाले पार्श्‍वमौल! तू भी धन के लोभ और मद से भरा हुआ है और हाथी की भाँति प्रेरणा दे रहा है; अत: दुर्बुद्ध! तू हाथी हो जा।

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! उन दोनों को शाप दे कुबेर से निधि लेकर मुनिवर दुर्वासा ने पुन: कुबेर को अत्‍यन्‍त दुर्लभ वर प्रदान किया- ‘कुबेर! इस दान से तुम्‍हारे पास नौ निधियां द्विगुणित होकर आ जाय। ‘यों कहकर वे निधियों के साथ वहाँ से चल दिये। आहा! परम तेजस्‍वी महर्षियों का बल कैसा अद्भुत है!।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्‍व संवाद में गोमती के उपाख्‍यान के प्रसंग में ‘चक्रतीर्थ का माहात्‍म्‍य’ नामक दसवां अध्‍याय पूरा हुआ।


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