06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 03 || बलदेवजी का रेवती के साथ विवाह
06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 03 || बलदेवजी का रेवती के साथ विवाह
नारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान द्वारका में निवास का कारण बताया। अब उन परमेश्वर बन्धुओं के विवाह आदि के सारे वृतान्त सुनाउँगा। मिथिलेश्वर ! तुम पहले बलदेवजी के विवाह का वृतान्त सुनो, जो समस्त पापों को हर लेने वाला तथा आयु की वृद्धि करने वाला उत्तम पापों को हर लेने वाला आतथा यु की वृद्धि करने वाला उत्तम साधन है।
सूर्यवंश में महामनस्वी राजा आनर्त हुए, जिनके नाम से भयंकर गर्जना करने वाला समुद्र के तट पर आनर्त देश बसा हुआ था। राजा आनर्त के एक रैवत राजा के लक्षणों से सम्पन्न था। उसने कुशस्थलीपुरी का निर्माण करके वहीं रहकर राज्य शासन किया। रैवत के सौ पुत्र थे और रेवती नाम वाली एक कन्या। वह सर्वोत्तम चिरंजीवी तथा सुन्दर वर पाने की इच्छा रखती थी। एक दिन स्वर्णरत्नविभूषित रथ पर आरुढ़ हो अपनी पुत्री को भी उसी पर बिठाकर राजा रैवत भूमण्डल की परिक्रमा करने लगे। (इसी यात्रा का उद्देश्य था- पुत्री के लिये योग्य वर की खोज।) अन्ततोगत्वा राजा ने अपनी मंगलकारी ब्रह्मलोक में पदार्पण किया और वहाँ ब्रह्माजी के चरणों में शीश झुकाया। उस समय ब्रह्माजी की सभी में पूर्वचित्ति नाम की अप्सरा का गान हो रहा था, इसलिये वे एक क्षण तक चुपचाप बैठे रहे। तदनन्तर ब्रह्माजी को एकचित हुआ जानकर उनसे अपना अभिप्राय निवेदित कया।
रैवत बोले- प्रभो ! आप परम पुराणपुरुष हैं ! आपसे ही इस विश्वरूपी वृक्ष का अंकुर उत्पन्न हुआ है। आप पूर्ण परमात्मा परमेश्वर हैं और अपने पारमेष्ठय धाम में सदा स्थित रहकर इस जगत की सृष्टि, पालन और संहार किया करते हैं। देव ! वेद आपके मुख हैं, धर्म हृदय है, अधर्म पृष्ठभाग है, मनु बुद्धि है, देवता अंग हैं, असुर पैर हैं और सारा संसार आपका शरीर है। आप सम्पूर्ण विश्व को अपने हाथ पर रखे हुए आंवले की भाँति प्रत्यक्ष देखते हैं और जैसे सारथि रथ को अभीष्ट मार्ग में ले जाता है, उसी प्रकार आप संसाररूपी रथ को तीनों गुणों अथवा त्रिगुणात्मक विषयों की ओर ले जाने में समर्थ हैं। आप एकमात्र अद्वितीय हैं तथा जैसे मकड़ी अपने स्वरूप से ही एक जाला उत्पन्न करती और फिर उसे ग्रस लेती है उसी प्रकार आप जगतरूपी एक जाल बुन रहे हैं और समय महेन्द्र का निवास स्थान स्वर्ग लोक आपके वश में हैं; फिर सार्वभौम राज्य और योगसिद्धि आपके अधीन हों, इसके लिये तो कहना ही क्या है।
आप सदा पारमेष्ठय पद- ब्रह्मधाम में स्थित हैं, ऐसा अनन्तगुणशाली आप भूमा (महान एवं सर्वव्यापी) पुरुष को नमस्कार है। विधे ! स्वयम्भू (स्वयं प्रकट हुए) हैं, तीनों लोकों के पितामह (पिता के भी पिता) हैं। अपने इसी प्रभाव के कारण आपको ’सुरज्येष्ठ’ कहा जाता है। आप सर्वदर्शी हैं, अत: मेरी इस पुत्री के लिये आप शीघ्र ही मुझे कोई दिव्य, सर्वगुणसम्पन्न तथा चिरंजीवी वर बताइये। नारदजी कहते हैं- मैथिल ! यह सुनकर सर्वदर्शी भगवान स्वयम्भू ब्रह्मा ने राजा रैवत से हँसते हुए से कहा। श्रीब्रह्माजी बोले- राजन् ! इस क्षण तक पृथ्वी पर महाबली काल बड़ी तेजी के साथ बीत चुका है। सताईस चतुर्युगियां समाप्त हो चुकी हैं। मर्त्यलोक में तुम्हारे पुत्र, पौत्र और उनके भाई–बन्धु नहीं रह गये हैं। उनके पुत्रों के भीतर पोते-नातियों के गोत्र तक अब नहीं सुनायी देते हैं। अत: राजन् ! शीघ्र जाओ और सर्वश्रेष्ठ नररत्न सनातन पुरुष बलेदवजी को अधिपति परिपूर्णतम प्रभु बलराम और केशव भूमि का भार उतारने के लिये अवतीर्ण हुए भी वे दानों भक्तवत्सल हरि वसुदेवनन्दन होकर द्वारका में यदुवंशियों साथ विराज रहे हैं।
नारदजी कहते हैं- राजन् ! यह सुनकर नृपश्रेष्ठ रैवत ब्रह्माजी को नमस्कार करके पुन: समृद्धिशालिनी द्वारकापुरी में आये। बलदेवजी से कन्या का विवाह करके दहेज में विश्वकर्मा का बनाया हुआ एक दिव्य रथ प्रदान किया, जो एक योजन विस्तृत था। उस रथ में एक सहस्त्र अश्व जुते हुए थे। मिथिलेश्वर ! ब्रह्माजी के दिये हुए दिव्य वस्त्र तथा रत्न देकर राजा रैवत मंगलमय बदरिकाश्रम तीर्थ में तपस्या करने के लिये चले गये। उस समय यदुपुरी के घर-घर में महान उत्सव मनाया गया। तदनन्तर भगवान संकर्षण रानी रेवती के साथ बड़ी शोभा पाने लगे। जो मनुष्य बलदेवजी के विवाह की इस कथा को सुनेगा, वह सब पापों से मुक्त हो परम सिद्धि को प्राप्त होगा।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद संवाद में ‘बलदेव विवाहोत्सव’ नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ।
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