06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 06 || श्रीकृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण तथा यादव-वीरों के साथ युद्ध
प्रलयकाल के महासागर की भाँति उस विशाल सेना को देखकर यदुश्रेष्ठ योद्धा उसे पर करने के लिये श्रीकृष्ण के पास आ गये। श्रीकृष्ण ही उनके केवट और जहाज थे। देवता और दानवों भाँति उन स्वकीय एवं परकीय सैनिकों में अत्यन्त अदभुत तथा रोमांचकारी तुमुल युद्ध होने लगा। उस संग्राम में सवार हाथी सवारों के साथ, पैदल पैदलों के साथ, हाथी सवार हाथी सवारों के साथ आरि घुड़सवारों के साथ जूझने लगे। शस्त्रों की वर्षा से अन्धकार सा छा गया। उस समय रुक्मिणी को भय से विह्वल हुई देख भगवान श्रीकृष्ण ने अभयदान देते हुए कहा- ‘डरो मत’ ।
बलदेवजी के छोटे भाई वीरवर गद अपने महान धनुष को कम्पित करते हुए शत्रुओं की सेना में उसी प्रकार घुस गये, जैसे वन में दावानल। गद के बाणों से अंगों के विदर्ण हो जाने के कारण कितने ही रथी योद्धाओं के कवच कटकर छिन्न-भिन्न हो गये, घोड़े और सारथि मारे गये तथा वे स्वयं भी प्राणशून्य होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। पैदल योद्धाओं के पैर कट गये। राजन् ! गद के बाणों से व्यथित हो शत्रु योद्धा आंधी के उखाडे़ हुए वृक्षों की भाँति धराशायी हो गये। नरेश्वर ! घोड़ों पर चढे़ हुए कितने ही वीर गद के बाणों से विदीर्ण हो समरांगण में बृहती फल की भॉंति घोड़ों सहित गिर पडे़। इसी प्रकार गदके बाणों से कुंभस्थल फट जाने के कारण बीच-बीच से विदीर्ण हुए हाथी कुष्मांड के टुकड़ों की भांति पृथ्वी पर पड़े शोभा पा रहे थे।
तदनन्तर शत्रुओं की सारी सेना भाग चली। यह देख गदा-युद्ध विशारद महाबली शाल्व ने गद के ऊपर अपनी गदा से आघात किया। गदा की चोट खाकर गदा-युद्ध के प्रभाव को जानने वाले धनुर्धर गद धनुष द्वारा युद्ध करना छोड़कर तत्काल मन से अत्यन्त व्यथा का अनुभव करते हुए युद्धभूमि में गिर पडे़। गिरकर भी वे सहसा उठ खडे़ हुए और तत्काल बलदेवजी की दी हुई गदा को गद ने अपने हाथ में ले लिया। लाख भार लोहे की बनी हुई वह भारी गदा कौमोद की के समान सुदृढ़ थी। उसके द्वारा गद ने राजा शाल्व पर उसी प्रकार चोट की, जैसे इन्द्र ने वज्र द्वारा किसी पर्वत पर आघात किया हो। गदा के प्रहार से व्यथित हो राजा शाल्व जब पृथ्वी पर गिर पड़ा, तब पौण्ड्रक, जरासंध, दन्तवक्र और विदूरथ ये चारों वीर गद के प्रति रोष से भरे हुए वहाँ आ पहुँचे। महावीर पौण्डक ने भी जैसे कोई कटुवचनों से मित्रता के सम्बन्ध को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार दस तीखे बाण मारकर गद के रथ पर फहराती हुई पताका को काट डाला ।
राजेन्द्र ! तत्पश्चात दन्तवक्र ने गदा की चोट से गद के सुदर रथ को भी इस तरह चूर-चूर कर डाला, माने किसी ने डंडे की मार से मिट्टी का सुन्दर घड़ा फोड़ डाला हो। विदेहराज ! इसी प्रकार जरासंध ने उस रथ के घोडे़ मार डाले और विदूरथ ने सारथि को तीखे बाणों से पृथ्वी पर मार गिराया। तब मुसल हाथ मे ले बलवान बलदेवजी बड़ी तीव्र गति से वहाँ आ पहँचे और उन्होंने दन्तवक्र के विकराल एवं भयानक मुख पर बडे़ जोर से प्रहार किया। समरांगण में युद्ध करते हुए दन्तवक्र के मुख में मुसल की चोट पड़ने पर उसके मुख में जो एक टेढ़ दांत बच रहा था, वह भी पर गिर पड़ा। फिर तो रुक्मिणी सहित दैत्यनाशन श्रीहरि हँसने लगे। इसी समय रोष से भेर हुए बलदेवजी ने अपने मुसल से शीघ्रतापूर्वक पौण्ड्रक जरासंध तथा दुष्ट विदूरथ को भी चोट पहुँचायी। ये तीनों ही वीर खून से लथपथ हो युद्धभूमि में मूर्च्छित होकर गिर पडे़।
इसके बाद वहाँ आयी हुई सारी सेना को कुपित हुए महाबली बलदेव ने हल से खींचकर मुसल की मार से मौत के घाट उतार दिया। उस समरांगण में दस योजन दूर तक हाथी, घोड़े और पैदल सैनिक पिस उठे, चूर-चूर हो गये और धरती पर सदा के लिये सो गये। तब मरने से बचे हुए जरसंध आदि समस्त नरेश मैदान छोड़कर भाग गये और जिसकी उमंग नष्ट हो गयी थी तथा जो अत्यन्त हतोत्साह हो चला था, उस शिशुपाल के पास जाकर बोले- पुरुषसिंह ! तुम अपने मन की इस ग्लानि को त्याग दो। एक विवाह तो क्या इस भूतल पर तुम्हारे सौ विवाह हो जायँगे।
हम लोग आज ही द्वारका में चलकर बलराम और श्रीकृष्ण को बांध लेंगे तथा समुद्र की कांची धारण करने वाले इस पृथ्वी को यादवों से सूनी कर डालेंगे’। इस प्रकार मित्रों के प्रबोध देने पर चेदिराज शिशुपाल चन्द्रिकापुर को चला गया और मरने से बचे हुए दूसरे समस्त नरेश भी अपने-अपने नगर को पधारे।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में 'रुक्मिणी-हरण और यदुवंशियों की विजय नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ।।6।।
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