06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 07 || श्रीकृष्ण के हाथों से रुक्मी की पराजय
06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 07 || श्रीकृष्ण के हाथों से रुक्मी की पराजय तथा द्वारका में रुक्मिणी और श्रीकृष्ण का विवाह
श्रीनारदजी कहते हैं- रुक्मिणी के हरण और मित्रों की पराजय का वृतान्त सुनकर भीष्मकपुत्र रुक्मी ने समस्त भूपालों के सुनते हुए यह प्रतिज्ञा की- ‘राजाओं ! मैं आप लोगों के सामने यह सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि युद्ध में श्रीकृष्ण को मारकर रुक्मिणी को लौटाये बिना मैं कुण्डिनपुर में प्रवेश नहीं करुँगा’।
यों कहकर उस महा उद्भट वीर ने दिव्य कवच धारण किया, जो ठोस एवं श्याम वर्ण का था। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह नील मेघ से निर्मित हुआ हो। फिर उसने सिर पर सिन्धुदेशीय शिरस्त्राण (टोप) रखा; सौवीर देश का बना हुआ सुन्दर धनुष, लाट देश के दो तरकस, म्लेच्छ देश की तलवार, कुटल देश की ढाल, येठर की महाशक्ति, गुजरात की गदा, बंगाल का परिघ और कोंकण देश का हस्तत्राण (दस्ताना) धारण करके अंगुलियों में गोधा के चर्म से निर्मित अंगुलित्राण बाँध लिया और किरीट, रुक्मी ने युद्ध करने का निश्चय किया। फिर चंचल घोड़ों से युक्त जैत्ररथ पर आरुढ़ हो, दो अक्षौहिणी सेना साथ लिये उसने श्रीकृष्ण का पीछा किया। शत्रुओं की सेना को पुन: आती देख महाबली बलराम ने यादवों की सेना साथ ले समरागंण में उसका सामना किया। रुक्मी बार-बार धनुष टंकारता और कठोर वचन बोलता हुआ अतिरथी देवेश्वर श्रीकृष्ण के पास जा पहुँचा और बोला- ‘अरे ! खड़ा रह, खड़ा रह। यदि जीवित रहाना चाहता है तो तुरंत मेरी बहिन को छोड़ दे। नहीं तो मैं सेना सहित तुझे इसी समय यमलोक को भेज दूँगा। तेरे कुल पर राजा ययाति का शाप लगा हुआ है और तू ग्वालों की जूठन खाने वाला है। जरासंध के भय से भीत रहता है और कालयवन के आगे से पीठ दिखाकर भाग चुका है’।
यों कहकर उसने अपने तरकस से एक बाण निकालकर धनुष पर चढा़ दिया और उसे कान तक खींचकर श्रीकृष्ण की छाती को लक्ष्य करके चला दिया। उस बाण से आहत होन पर भी भगवान श्रीकृष्ण ने एक सायक से उसके धनुष की टंकार करने वाली प्रत्यंचा इस प्रकार काट दी, मानो गरुड़ ने किसी सर्पिणी को छिन्न-छिन्न कर डाला हो। फिर रुक्मी ने शीघ्र ही अपने धनुष पर टंकार-ध्वनि करने वाली दूसरी स्वर्णभूषित प्रत्यंचा चढ़ा ली और दस बाणों द्वारा रणभूमि में श्रीहरि को घायल कर दिया। तब श्रीकृष्ण ने एक बाण मारकर रुक्मी के प्रत्यंचा सहित धनुष को उसी क्षण वैसे ही काट दिया, जैसे ज्ञान के द्वारा त्रिगुणात्मक संसार बन्धन को काट दिया जाता है।
श्रीकृष्ण ने अपने अमोघ बाण द्वारा बीच से ही उसके धनुष के दो टुकडे़ कर दिये। फिर उन्होंने रुक्मी को सौ बाण मारकर युद्ध में क्षत-विक्षत कर दिया। धनुष कट जाने पर विदर्भ राजकुमार ने श्रीहरि के ऊपर चमचमाती हुई महाशक्ति उसी प्रकार चलायी, जैसे किसी मुनि ने विज्ञान के लिये महाशक्ति पर प्रहार किया, जिससे उसके दो टुकडे़ हो गये। उस खण्डित शक्ति ने रुक्मी के ही सारथि को मार डाला। भगवान की वेगशालिनी कौमोद की नाम वाली भारी गदा ने रुक्मी के रथ के ऊपर पड़कर उसे घोड़ा सहित उसी प्रकार चूर्ण कर दिया, जैसे वज्र के प्रहार से कोई पर्वत चकनाचूर हो गया हो। जब भगवान ने उसे पुन: चक्र चलाकर चूर्ण कर दिया। सोने के बाजूबंद से विभूषित बलवान रुक्मी ने बंगाल का परिघ हाथ में लेकर उसके द्वारा श्रीहरि के कंधे पर प्रहार किया और उस युद्ध-भूमि में मेघ के समान गर्जना करने लगा।
परिघ से ताडित होने पर भी पुष्पमाला के आघात को कुछ भी न गिनने वाले हाथी की भाँति भगवान अविचल रहे। उन्होंने उसी परिघ से समरांगण में रुक्मी पर आघात किया। परिघ की चोट खाकर रुक्मी मन-ही-मन कुछ व्याकुल हो उठा। फिर उसने युद्धभूमि में माधव की भर्त्सनार करते हुए ढाल और तलवार हाथ में ले ली। भगवान ने भी अपने खड्ग का प्रहार करके उसकी ढाल और तलवार काट दी। उस खड्ग के अग्रभाग से रुक्मी का शिरस्त्राण और विशाल कवच कटकर गिर पडे़। लगे-हाथ उसके दस्ताने भी काट दिये गये। अब उस युद्ध में रुक्मी के हाथ में केवल तलवार की मुट्ठी रह गयी थी। उस दशा में अपने पास आये हुए रुक्मी को श्रीहरि भुजदण्डों से पकड़कर पृथ्वी पर दे मारा और जैसे मृग के ऊपर सिंह सवार हो जाये उसी प्रकार वे उसके ऊपर चढ़ गये तथा रोषपूर्वक तीखी धार वाले अपने नन्दक नाम के खड्ग को हाथ में ले लिया। श्रीकृष्ण को अपने भाई के वध के लिये उद्यत देख रुक्मिणी भय से विह्वल हो उठी और पति के चरणों में गिरकर उस सती-साध्वी राजकुमारी ने करुणास्वरूप में कहा।
श्रीरुक्मिणी बोली- अनन्त ! देवेश्वर ! जगनिवास ! योगेश्वर ! आपकी शक्ति अचिन्त्य है। आप इस जगत् के पालक हैं। अत: करुणासागर ! आपके द्वारा शाल के समान विशाल भुजा वाले मेरे भाई का वध होना उचित नहीं है।
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! डर के मारे विलाप करती हुई रुक्मिणी का मुँह दु:ख के कारण सूख गया था। उसका कण्ठ रुँध गया। अपनी प्रिया सती रुक्मिणी की ऐसी अवस्था देखकर श्रीहरि रुक्मी के वध से विरत हो गये। फिर उसी के कमरबन्ध से बांधकर तीखी धार वाले खड्ग से श्रीहरि ने रुक्मी के आधे मुख की दाढ़ी-मुँछ के बाल साफ कर दिये ।
इतने में ही दो अक्षौहिणी सेना को परास्त करके सैनिकों सहित बलरामजी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने देखा कि रुक्मी कुरूप और दीन अवस्था में बँधा पड़ा है। फिर तो उनके हृदय में दया आ गयी और उसका बन्धन खोलकर बलरामजी ने श्रीहरि को फटकारते हुए कहा- ‘कृष्ण ! तुमने यह अच्छा नहीं किया, यह लोकनिन्दित कर्म है। अपनी पत्नी के भाइयों के साथ इस प्रकार परिहास नहीं किया जाता। जिसके बडे़ भाई को तुमने विरूप कर दिया, वह रुक्मिणी भाई की इस दुर्दशा से चिन्तित होकर तुम्हें क्या कहेगी ?‘ श्रीकृष्ण से यों कहकर वे रुक्मिणी से बोले-‘’कल्याणि ? ‘तुम शोक न करो। शुचिस्मिते ! स्वस्थ हो जाओ। आर्यकुमारी ! महामते ! तुम शोक बिलकुल छोड़ दो, मन में दु:ख मत मानो।
प्रिय अथवा अप्रिय जो भी प्राप्त होता है, वह सब मैं काल का किया हुआ मानता हूँ। जैसे घनमाला वायु के अधीन होती है, उसी प्रकार यह सारा जगत काल के वशीभूत है। उस काल को तुम कलना करने वालों का स्वामी परमेश्वर ण्वं विष्णु समझो। ‘मैं’ और ’मेरा’ यह भाव ही जगत) के लिये बन्धन का कारण होता है। अहंता और ममता रहित भाव ही ‘मोक्ष’ है, इसमें संशय नहीं है; सुख और दु:ख देने वाला दूसरा कोई नहीं है। यह सब लोगों का अपना भ्रम ही है। शत्रु, मित्र और उदासीन की कल्पना संसारी लोगों द्वारा अज्ञान के कारण की गयी है’। इस प्रकार भगवान बलराम के समझाने पर भीष्मक पुत्र रुक्मी वैमनस्य छोड़करचला गया और रुक्मिणी को भी प्रसन्नता हुई। रुक्मी का मनोरथ व्यर्थ हो चुका था, बलराम और श्रीकृष्ण के द्वारा जीवित छोड़ दिये जाने पर अपने विरूपकरण की घटना को याद करके उसने तपस्या में लग जाने का विचार किया। किंतु मुख्य मन्त्रियों के मना करने पर उसने तप का विचार छोड़ दिया, तथापि कुण्डिनपुर में फिर पैर नही रखा। रुक्मी ने अपने निवास के लिये भोजकट नामक एक उत्तम नगर का निर्माण कराया।
राजन् ! बलराम और यदुवंशी योद्धाओं से घिरे हुए रुक्मिणी सहित भगवान गोविन्द अपनी विजयदुन्दुभि बजवाते हुए द्वारका को चले गये। वहाँ बड़ा भारी उत्सव मनाया गया। मार्गशीर्ष मास में साक्षात श्रीहरि ने वैदिक विधि के अनुसार रुचिर मुखवाली रुक्मिणी के साथ विवाह किया। रुक्मिणी पति श्रीहरि का विवाह सम्पन्न हो जाने पर श्रीरुक्मिणी देवी उनके रुक्ममन्दिर (सुवर्णमय भवन) की शोभा बढा़ने लगीं। पुण्यवती द्वारकापुरी उस समय देवराज इन्द्र की अमरावती के समान सुशोभित हो रही थी। भीष्मनन्दिनी रुक्मिणी के विवाह की इस विचित्र कथा को जो भक्तिभाव से सुनता और सुनता है, वह भक्त इस लोक में भी वैभव से सम्पन्न रहता है और देहावसान के पश्चात वही मोक्ष भागी होता है।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में 'श्रीरुक्मिणी का विवाह' नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ।
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