06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 08 || श्रीकृष्ण का सोलह हजार एक सौ आठ रानियों के साथ विवाह
06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 08 || श्रीकृष्ण का सोलह हजार एक सौ आठ रानियों के साथ विवाह और उनकी संतति का वर्णन; प्रद्यम्न का प्राकट्य तथा रति और रुक्म–पुत्री के साथ उनका विवाह
श्रीनारदजीकहते हैं- मिथिलेश्वर ! अब श्रीकृष्ण की अन्य पत्नियों के मंगलमय विवाह का वृत्तान्त सुनो, जो समस्त पापों को हर लेने वाला तथा आयु की वृद्धि का सर्वोत्तम साधन है।
सत्राजित नाम से प्रसिद्ध यादव को साक्षात भगवान सूर्य ने स्यमन्तक मणि दे रखी थी। भगवान श्रीकृष्ण ने राजा उग्रसेन के लिये वह मणि मांगी। मिथिलेश्वर ! सत्राजित ने द्रव्य के लोभ से वह मणि नहीं दी; क्योंकि उस मणि से प्रतिदनि आठ भार सुवर्ण स्वत: प्राप्त होता रहता था। एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेन उस मणि को अपने कण्ठ में बांधकर सिन्धुदेशीय अश्व पर आरुढ़ हो शिकार खेलने के लिये वन में विचरने लगा। वहाँ एकसिंह ने प्रसेन को मार डाला। फिर उस सिंह को भी जाम्बवान ने मारा और तत्काल उस मणि को कंठ में धारण करके वन में गया था, किंतु श्रीकृष्ण ने वहाँ उसका वध कर दिया; इसीलिए आज सबेरे वह सभा भवन में नहीं आया’।
भगवान पर कलंक का टीका लग गया। वे कुछ नागरिकों को साथ ले वन में गये। महामते ! वहाँ उन्होंने पहले घोडे़ सहित मरे हुए प्रसेन के और किसी दूसरे द्वारा मारे गये सिंह के शव को पड़ा देखा। यह देखकर पदचिन्ह से पता लगाते हुए वे ऋक्षराज जाम्बवान की गुफा तक पहँच गये। फिर वहाँ से मणि लाने के लिये साक्षात श्रीहरि ने गुफा के भीतर प्रवेश करके अट्ठाईस दिनों तक युद्ध किया तथा ऋक्षराज जाम्बवान पर विजय पायी। राजेन्द्र ! जाम्बवान ने अपनी सुन्दरी कन्या जाम्बवती को उस मणि के साथ श्रीहरि के हाथ में दे दिया। उसे लेकर भगवान द्वारका में लौटे। उन्होंने सत्राजित को मणि दे दी और स्वयं कलंक से मुक्त हुए। सत्राजित को अपने कृत्य पर बड़ी लज्जा आयी और वे मुँह नीचे किये भयभीत-से रहने लगे। मिथिलश्वर ! उन्होंने यादव परिवार में शान्ति रखने के लिये अपनी पुत्री सत्यभामा तथा उस मणि को भी भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया।
तदनन्तर बन्धुवत्सल भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों की सहायता के लिये इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) गये। उन्होंने वर्षा के चार महीने वहीं व्यतीत किये। एक दिन गाण्डीवधारी अर्जुन के साथ रथ पर आरुढ़ हो श्रीहरि निर्मल नीरस भरी हुई यमुना के तीर पर शिकार खेलने के लिये विचरने लगे। वहाँ साक्षात कालिन्दी देवी भगवान श्रीकृष्ण को पतिरूप में प्राप्त करने की इच्छा से तपस्या कर रही थीं। पाण्डव अर्जुन ने उन्हें श्रीकृष्ण को दिखाया। फिर वे भगवान उन्हें साथ लेकर इन्द्रप्रस्थ आये। वहाँ से द्वारका में पहुँचकर उन्होंने मनोहरांगी सूर्यकन्या कालिन्दी के साथ विधिपूर्वक विवाह किया। उस समय परम मंगलमय उत्सव का विस्तार के साथ आयोजन किया गया था।
अवन्ती नरेश की एक पुत्री थी, जो रूप-लावण्य से मन को हर लेने वाली थी। उसका नाम था मित्रविन्दा। भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी की ही भाँति मित्रविन्दा को भी स्वयंवर से हर लाये।
राजा नग्नजित के एक पुत्री थी, जो लोगों में सत्या के नाम से विख्यात थी। उसके विवाह के लिए राजा ने यह प्रतिज्ञा की थी कि ’सात सांड़ों को जो एक साथ ही नाथ देगा, उसी वीर को मैं अपनी पुत्री दूँगा। ‘भगवान श्रीकृष्ण ने सब लोगों के देखते-देखते उन सातों सांड़ों को नाथकर सत्या के साथ विवाह किया।
केकयराजकुमारी भद्रा को भी भगवान श्रीहरि उसकी इच्छा के अनुसार अपने घर ले आये। वहाँ कालिन्दी की ही भाँति भद्रा के साथ उन्होंने विधिपूर्वक विवाह किया।
राजन् ! राजा बृहत्सेन के एक पुत्री थी, जिसे लोग लक्ष्मणा कहते थे। वह समस्त शुभी लक्षणों से सम्पन्न थी। उसके यहाँ स्वयंवर में मत्स्यवेध की शर्त रखी गयी थी। भगवान ने उस मत्स्य का भेदन किया और अपने ऊपर आक्रमण करने वाले शत्रुओं को परास्त करके लक्ष्मणा का हाथ पकडा़।
सोलह हजार एक सौ राजकुमारियां भौमासुर के कारागार में बंद थीं। भगवान ने भौमासुर का वध करके उसकी कैद से उनको छुडा़या। उन चारुदर्शना युवतियों की इच्छा देखकर वे उन्हें अपने साथ ले आये।
एक की मुहूर्त में विभिन्न भवनों में रहती हुई उन युवतियों के साथ अपनी माया से उतने ही रूप धारण करके भगवान ने उन सबका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। इस प्रकार सोलह हजार एक सौ आठ रानियों में से प्रत्येक ने श्रीकृष्ण के दस-दस पुत्र उत्पन्न किये। वे सभी गुणों में पिता के समान थे।
भीष्मककन्या रुक्मिणी के गर्भ से सबसे पहले प्रद्युम्न प्रकट हुए। वे कामदेव के अवतार थे और पिता की भाँति समस्त शुभलक्षणों से विभूषित थे। निर्दयी शम्बरासुर ने दस दिनों के भीतर ही उन्हें सूतिकागार से उठाकर समद्र में फेंक दिया। वहाँ उन्हें एक उदर में मरे नहीं। वह मत्स्य शम्बरासुर के पाकालय में चीरा गया तो उसमें से प्रद्युम्न निकले। वहाँ उनकी पूर्व पत्नी रति ने उनका पालन किया। जब वे बडे़ हुए और युवावस्था प्रारम्भ हुई, तब उन्हें अपने शत्रु की करतूत का पता चला। राजन् ! फिर अपने शत्रु शम्बरासुर का वध करके वे दिव्य भर्या रति के साथ द्वारका में आये। उनका वह कर्म बड़ा ही विचित्र एवं अद्भुत था।
राजन् ! महारथी श्रीकृष्ण पुत्र प्रद्यम्न रुक्मी की बेटी को भोजकट नगर के स्वयंवर स्थल से हर लाये और द्वारका में उसके साथ उनका विवाह हुआ। प्रद्युम्न से अनिरुद्ध नामक पुत्र का जन्म हुआ, जिसमें दस हजार हाथियों का बल था। वे ब्रह्माजी के अवतार समझे जाते थे। उनकी कान्ति शरत्काल के प्रफुल्ल नील कमल के समान श्याम थी।
इस प्रकार मैंने परिपूर्णतम भगवान के चतुर्व्यूहावतार का तथा उनके विवाह-सम्बन्धी परम मंगलमय विचित्र चरित्र का तुमसे वर्णन किया है, जो समस्त पापों को हर लेने वाला, पुण्यदायक तथा आयु की वृद्धि का उत्तम साधन है। राजन् ! अब तुम पुन: क्या सुनना चाहते हो ?।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में श्रीकृष्ण की समस्त रानियों के विवाह का वर्णन’ नामक आठवां अध्याय पूरा हुआ।
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