06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 04 || श्रीकृष्‍ण को रुक्मिणी का संदेश; ब्राह्मण सहित श्रीकृष्‍ण कुण्डिनपुर में आगमन

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 04 || श्रीकृष्‍ण को रुक्मिणी का संदेश; ब्राह्मण सहित श्रीकृष्‍ण कुण्डिनपुर में आगमन, कन्या और वर के अपने-अपने घरों में मंगलाचार, शिशुपाल के साथ आई हुई बारात को विदर्भराज का ठहरने के लिए स्थान देना।

श्रीनारदजी कहते हैं:- मिथिलेश्‍वर, अब श्रीकृष्‍ण देव के विवाह का वृतान्‍त सुनो, जो सब पापों को हर लेने वाला, पुण्‍यजनक तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चतुर्वर्गमय फल प्रदान करने वाला है। 

विदर्भ देश में भीष्‍मक नाम से प्रसिद्ध एक प्रतापी राजा राज्‍य करते थे, जो कुण्डिनपुर के स्‍वामी, श्रीसम्‍पन्‍न तथा सम्‍पूर्ण धर्मवेताओं में सबसे श्रेष्‍ठ थे। 
उनके रुक्मिणी नामक एक पुत्री हुई, जो लक्ष्‍मीजी का अंश थी; वह इतनी अधिक सुन्‍दरी थी कि उसके सामने करोड़ों चन्‍द्रमा फीके लगे, वह सदुणरूपी आभूषणों से विभूषित थी। 
पहले की बात है, एक दिन मेरे मुँह से श्रीहरि के अलौकिक गुणों का वर्णन सुनकर वह राजकुमारी परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्‍ण को अपने अनुरूप पति मानने लगी।
इसी तरह मेरे मुख से रुक्मिणी के रूप और गुणों का प्रीतिवर्धक वर्णन सुनकर श्रीहरि ने उसे अपनी योग्‍य पत्‍नी समझा और उसके साथ विवाह करने का मन ही मन संकल्‍प किया। 
श्रीकृष्‍ण के भाव को जानने वाले सर्वधर्मज्ञ राजा भीष्‍मक ने भी अपनी उस कन्‍या को उन्‍हीं के हाथ में देने का निश्‍चय किया था; किंतु़ युवराज रुक्‍मी ने यत्‍नपूर्वक पिता को रोका और श्रीकृष्‍ण के शत्रु महावीर शिशुपाल को रुक्मिणी के योग्‍य वर माना।

मिथिलेश्‍वर, इससे भीष्‍मकुमारी रुक्मिणी के चित में बड़ा खेद हुआ और उसने एक ब्राह्मण को अपना दूत बनाकर महात्‍मा श्रीकृष्‍ण के पास भेजा। 
ब्राह्मण देवता जब दिव्‍य द्वारकापुरी में पहुंचे, तब श्रीकृष्‍ण ने उनकी आवभगत की, उन्‍होंने वहीं भोजन किया और श्रीकृष्‍ण के मन्दिर में ही आसन लगाकर विश्राम किया। 
फिर महात्‍मा श्रीकृष्‍ण ने उनसे सारा कुशल- समाचार पूछा, उनकी आज्ञा पाकर ब्राह्मण ने उन्‍हें सब बातें बतायीं। 

वे रुक्मिणी का पत्र सुनाते हुए बोले:- “स्‍व‍स्ति श्री ५ नित्‍यानन्‍द–महासागर श्रीमद्दिव्‍यगुण परिपूर्ण वसुदेवनन्‍दन श्रीकृष्‍ण, जोग लिखी कुण्डिनपुर से रुक्मिणी का कोटिश: प्रणाम स्‍वीकृत हो। 
यहाँ कुशल है, वहाँ भी कुशल चाहिये, आगे आपका पत्र आया और श्रीनारदजी की वाणी से भी यह ज्ञात हुआ कि आप प्रकृति से परे परमेश्‍वर हैं। 
यद्यपि होने के नाते आप सब कुछ जानते हैं, तथापि मैं गुप्‍त बात आपको बता रही हूँ। 
महामते, आप मुझे वीर का भाग (अपना अंश) जानें और स्‍वीकार करें। 
यदि चेदिराज शिशुपाल ने मेरा हाथ पकड़ लिया तो यह समझना चाहिये कि सिंह के लिये नियत बलिका भाग कोई मृग (कुत्ता, बिल्‍ली आदि ) उठा ले गया। 
यदि आप ऐसा सोचते हों कि ‘तुम तो कुण्डिनपुर के दुर्गम निवास करती हों तुम्‍हें किस प्रकार ब्‍याहाकर लाऊँगा, तो इसके विषय में भी सुन लीजिये।
हरे, यहाँ की कुल प्रथा के अनुसार विवाह के एक दिन पूर्व राजकुमारी कुलदेवी के मन्दिर को जाती है, अत: मैं जहाँ कुलदेवी का मन्दिर है, वहाँ पर आऊँगी, प्रभो वहीं आप मुझे अपने साथ ले लें।"

श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन् ! ब्राह्मण के मुख से रुक्मिणी के उस अभिप्राय को सुनकर सबको मान देने वाले भगवान श्रीकृष्‍ण ने अपने सारथि दारुक को बुलाकर कहा- ‘मेरा रथ शीघ्र ही जोतकर तैयार करो।‘ 
पिछली रात में वैकुण्‍ठ से प्राप्‍त हुए उस रथ को जो किंगणी-जाल से युक्‍त और सुवर्ण एवं रत्‍नों से जटित था, शैब्‍य, सुग्रीव, मेघपुष्‍प और बलाहक नामक के श्रेष्‍ठ अश्‍वों से जोतकर दारुक ने सुसज्जित किया। 
घोड़ों चंचल तथा चारु चामरों से विभूषित थे, उनसे युक्‍त, सहस्‍त्रों सूर्यों के समान तेजस्‍वी उस दिव्‍य विशाल रथ पर लक्ष्‍मीपति श्रीकृष्‍ण ने पहले तो अपने हाथ से उस ब्राह्मण देवता को बैठाया और स्‍वयं सारथि पीठ पर अपने श्रीचरण-कमल रखकर वे रथ पर आरुढ़ हुए। राजन् , इस प्रकार भगवान श्रीकृष्‍ण विदर्भ देश को चले।
श्रीकृष्‍ण अकेले ही समस्‍त राजमण्‍डल के बीच राजकन्‍या को हर लाने गये हैं, इस समाचार से बलरामजी को युद्ध की आशंका हुई, अत: वे भाई की सहायता करने के लिये समर्थ बल वाहन से युक्‍त सम्‍पूर्ण यादव-सेना को लेकर विपक्षी राजाओं को जीतने के लिये पीछे से शीघ्रतापूर्वक गये। 

प्रात:काल होते-होते ब्राह्मण और रथ के साथ भगवान श्रीकृष्‍ण कुण्डिनपुर के उपवन में जा पहँचे, वहाँ एक इमली के वृक्ष के नीचे घोड़े की झूल बिछाकर वे बैठ गये। 
उस स्‍थान से कुछ दूरी पर उतम कुण्डिनपुर दिखायी देता था, वह नगर बहुत बड़े दुर्ग से घिरा हुआ सात योजन गोलाकर भूमि पर बसा था।
वहाँ जल से भरी हुई तीन परिखाऍं थीं, जो दुर्लंघय और दुर्गम थीं, उनकी चौडा़ई सौ धनुष थी। वे परिखाएं चौमासे की नदी के समान जल से भरी हुई थीं, जिनके सुनहरे शिखर पर सोने के कलश उद्धासित होते थे। 
ध्‍वज के ऊपर चमकती हुई पताकाएं फहरा रही थीं, कबूतर और मोर आदि पक्षी जहां-तहां उड़ रहे थे।

शिशुपाल को अपनी कन्‍या देने के लिये उद्यत हो राजा भीष्‍मक रत्‍नमण्‍डप में वैवाहिक सामग्री का संचय कराया। 
राजन् ! नारियों द्वारा गाये जाने वाले गीत और मंगलाचार से युक्‍तज सुन्‍दर भवन में रुक्मिणी उसी प्रकार शोभा पा रही थी, जैसे सिद्धियों से भूमि की शोभा होती है। 
अथर्ववेद के विद्वानों ने रुक्मिणी को भलीभांति नहलाकर रत्‍नमय आभूषण तथा वस्‍त्र धारण करवाये और वेदमन्‍त्रों द्वारा शान्तिकर्म करके वधू की रक्षा की। 
महामनस्‍वी राजा भीष्‍मक ने ब्राह्मणों को लाख भार सोना, दो लाख भार मोती, सहस्‍त्र भार वस्‍त्र और गायें दान में दीं। 

उसी प्रकार दमघोषपुत्र शिशुपाल के लिये भी ब्राह्मणों ने पहले परमशान्ति का विधान करके रक्षाबन्‍धन करवाया।
ब्राह्मणों द्वारा जब शिशुपाल का मांगलिक स्‍नान कर्म सम्‍पन्‍न हो गया, तब उसे पीले रंग का रेशमी जामा पहनाकर सुशोभित किया गया।
सिर पर मुकुट और मुकुट के ऊपर फूलों का सुन्‍दर सेहरा सजाया गया, हार, कंगन, भुजबंद और चूडामणि से विभूषित हुए शिशुपाल की मांगलिक गाजों-बाजों के साथ गन्‍ध और अक्षत द्वारा विशिष्‍ट पूजा की गयी, आचारलाजों से शिशुपाल को सुन्‍दर वर बारात लिये दमघोष निकले।
मिथिलेश्‍वर, जरासंध, शाल्‍व बुद्धिमान दन्‍तवक, विदूरथ और पौण्‍डक पीछे और अगल-बगल से उसके रक्षक होकर चले।
महाबली दमघोष विशाल सेना साथ लेकर उच्‍च स्‍वर से नंगारे बजवाने हुए कुण्डिनपुर को गये। 
सामने से यदुदेव श्रीकृष्‍ण का कन्‍या अपहरण विषयक उद्योग सुनकर दूसरे हजारों राजा शिशुपाल के सहायक बनकर आये। 

भीष्‍मक ने आगे जाकर राजा दमघोष का विधिपूर्वक पूजन किया, कश्‍मीरी कम्‍बलों तथा समुद्र से उत्‍पन्‍न दिव्‍य अरुणवर्ण के रत्‍नों से सबको मण्डित किया। सब के कण्‍ठों में मोतियों की मालाएं पहनायीं, स्‍वागत किया। 
उस राज्‍य में राजाओं के शिविरों में वारांगनाओं के नृत्‍य हो रहे थे, मृदंग बजाये जा रहे थे।
उस समय विदर्भ के महाराज ने समागत राजाओं सहित वर के लिये अलग-अलग वास स्‍थान प्रदान किया।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘कुण्डिनपुर की यात्रा’ नामक चौथा अध्‍याय पूरा हुआ।

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