06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 05 || श्रुक्मिणी की चिन्‍ता; ब्राह्मण द्वारा श्रीहरि के शुभागमन का समाचार पाकर प्रसन्‍नता

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 05 || श्रुक्मिणी की चिन्‍ता; ब्राह्मण द्वारा श्रीहरि के शुभागमन का समाचार पाकर प्रसन्‍नता; भीष्‍म द्वारा बलराम और श्रीकृष्‍ण का सत्‍कार; पुरवासियों की कामना; रुक्मिणी की कुलदेवी के पूजन के लिये यात्रा, देवी से प्रार्थना तथा सौभाग्‍यवती स्त्रियों से आशीर्वाद प्राप्ति

श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन् , श्रीकृष्‍णचन्‍द्र के चरणारविन्‍द का चिन्‍तन करती हुई कमललोचना भीष्‍मकुमारी रुक्मिणी उनके बिना जीवन को व्‍यर्थ मानने लगी।
वह निरन्‍तर घनश्‍याम का ही ध्‍यान करती थी, इसी अवस्‍था में वह मन-ही-मन कहने लगी:- 

रुकमणी बोली - अहो, मेरे विवाह मुहूर्त आने मे अब एक ही रात बाकी रह गयी है, किंतु मेरे प्रियतम श्री कृष्‍णचन्‍द्र नहीं आये, मैं नहीं जानती कि इसमें क्‍या कारण है?
जो ब्राह्मण देवता उनके पास गये थे, वे भी अब तक लौटकर नहीं आये, हे विधाता इसमें क्‍या हेतु है? 
ये यदुकुल तिलक देवेश्‍वर श्रीकृष्‍ण निश्‍चय ही मुझमें कोई दोष देखकर मेरे पाणिग्रहण करने के निमित अधिक उद्योगशील होकर नहीं आ रहे हैं, हाय विधाता, अब मैं क्‍या करू? 
हाय, मुझ अभागिनी के लिये विधाता अनुकूल नहीं हैं, चन्‍द्रशेखर भगवान शिव तथा गणेशजी भी प्रतिकूल हो गये हैं, भगवती गौरी ने भी मुझ से मुँह फेर लिया है और गौ तथा ब्राह्मण भी मेरे अनुकूल नहीं हैं।

श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन् ! इस तरह चिन्‍ता में पड़ी हुई वह भीष्‍मक- राजकुमारी महल की अट्टलिकाओं में चक्‍कर लगाती हुई ऊँचे शिखर से श्रीकृष्‍णचन्‍द्र की बाट देखने लगी। 
इतने में ही रुक्मिणी का बायँ अंग फड़क उठे, मानो वही उनकी शंका का उत्तर या समाधान था।
काल को जानने वाली सर्वमंगला श्रीभष्‍मनन्दिनी उस अंग स्‍फुरण से बहुत प्रसन्‍न हुई।

उसी समय श्रीकृष्‍ण का भेजा हुआ ब्राह्मण तत्‍काल वहाँ आ पहुँचा, श्रीकृष्‍ण का आगमन सम्‍बन्‍धी सारा वृतान्‍त उसने धीरे से रुक्मिणी को बता दिया। 
इससे श्रीभीष्‍मक राजकुमारी को बड़ा हर्ष हुआ और वह ब्राह्मण देवता के चरणों में प्रणत होकर बोली:- ‘विप्रवर, मैं तुम्‍हारे वंश से कभी दूर नहीं जाऊॅंगी (अर्थात तुम्‍हारी कुल परम्‍परा में धन सम्‍पत्ति का कभी अभाव नहीं होगा), यह मरेा प्रतिज्ञापूर्ण वचन है। 

विदर्भराज भीष्‍मक ने जब सुना कि मेरी कन्‍या का विवाह देखने के लिये उत्‍सुक हो बलराम और श्रीकृष्‍ण- दोनों भाई पधारे हैं, तब वे ब्राह्मणों के साथ उन्‍हें लिवा लाने के लिये निकले; क्‍योंकि उन्‍हें उनके प्रभाव का पूर्ण परिज्ञान था। 
मंगल-पात्रों में गन्‍ध और अक्षत भरकर वस्‍त्र तथा रत्‍न राशि रखकर मांगलिक गाजे-बाजे के साथ वे आये। 
मधुपर्को के कोटिश: परमेश्‍वर बन्‍धुओं का विधिपूर्वक पूजन किया, पूजन करके वक मन-ही-मन यह सेचकर अत्‍यन्‍त खिन्‍न हो गये कि 'अहो, मैंने इन्‍हीं को अपनी कन्‍या क्‍यों नही दी?' 
उनको सेना सहित आनन्‍द वन में ठहराया और उन्‍हें प्रणाम करके वे अपने महल में लौट आये।

तीनो लोकों के लावण्‍य की निधि परमेश्‍वर श्रीवसुदेनन्‍दन का आगमन सुनकर कुण्डिनपुर के निवासी वहाँ आये और अपने नेत्रपुटों से उनके मुखारविन्‍द की मकरन्‍द सुधा का पान करने लगे।
वे पुरवासी परस्‍पर इस प्रकार बात करने लगे:- ‘बन्‍धुओं, रुक्मिणी तो इन भगवान श्रीकृष्‍ण की ही पत्‍नी होने योग्‍य है, दूसरे किसी की नहीं।'
उन नगर निवासियों ने श्रीकृष्‍ण और रुक्मिणी का विवाह हो , इसके लिये विधाता से प्रार्थना करते हुए अपने सारे पुण्‍य समर्पित थे। 
उन्‍होंने पुन: आपस में इस प्रकार कहा:- ‘यदि यहाँ इनका विवाह हो जाये तो ये कभी-कभी स्‍वयं श्‍वसुर के घर अवश्‍य आया करेंगे और कृतकृत्‍य हो जायँगे, लोक में इनके दर्शन से वंचित होकर दीर्घकाल तक जीने से क्‍या लाभ’। 

नरेश्‍वर, जब लोग इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय भीष्‍मक-राजकुमारी रुक्मिणी गिरिराजनन्दिनी उमा का पूजन करने के लिये अपनी सम्‍पूर्ण सखियों के साथ अन्‍त:पुर से बाहर निकली। 
श्रीकृष्‍ण ने उसके हृदय को हर लिया था, उस समय भेरी, मृदंग और दुन्‍दुभि की जोर-जोर से ध्‍वनि होने लगी।
अच्‍छे गायक गीत गाने लगे, वन्‍दीजन और मागध यशोगान करने लगे और वीरांगनाओं का मनोहर नृत्‍य होने लगा, इन सब के साथ जय-जयकार का मंगलघोष उच्‍चस्‍वरूप से गूँजने लगा।

लक्ष्‍मीस्‍वरुपा रुक्मिणी कोटि चन्‍द्रमण्‍डल की कान्ति धारण कर रही थी।
बालरवि के समान दीप्तिमान कुण्‍डल उसके कानों की शोभा बढ़ा रहे थे और पार्श्‍व वर्तिनी परिचारिकाओं का समुदाय श्‍वेत छत्र लगाये व्‍यंजन और चमकीले चामर डुलाते हुए उसकी सेवा में संलग्‍न था। 
म्‍यान से, खीचकर लाखों श्‍वेत रंग की नंगी तलवारें हाथ में लिये पैदल वीर योद्धा इधर-उधर से उसकी रक्षा कर रहे थे।
इनसे थोड़ी ही दूर पर घुड़सवार, रथी और हाथी सवार योद्धा भी अस्‍त्र उठाये राजकुमारी की रक्षा में लगे थे। 

देवी के मन्दिर में पहँचकर आंगन में शान्‍त और शुद्धभाव से खड़ी हो राजकुमारी ने अपने कमलोपम हाथ और पैर धोये। 
फिर मौनभाव से देवी के समीप जाकर इसने दोनो हाथ जोड़, भवभीति रिणी भवानी की सेवा में इस प्रकार प्रार्थना की:- ‘दुर्गे, गणेश-कार्तिकेय आदि संतानें सहित शोभा पाने वाली शुभकारिणी भवानी, मैं तुम्‍हें सदा प्रणाम करती हूँ और यह वर मॉंगती हूँ कि प्रकृति परे विराजमान साक्षात परमेश्‍वर भगवान श्रकृष्‍ण मेरे पति हों’। 

उस समय सखियां कहने लगीं:- ‘शुभे, इस तरह श्रीकृष्‍ण का नाम न लो, चेदिराज शिशुपाल के उद्देश्‍य से वर मॉंगो।‘
इस तरह बोलती हुई सखियों के बीच खड़ी भीष्‍मक नन्दिनी पुन: भवानी के भवन में पूर्वोक्‍त प्रार्थना को ही दुहराने लगी।
‘अम्‍ब, यह बालिका है, कुछ जानती नहीं; अत: आप इसकी बात पर ध्‍यान न दें।’ 
यों कहती हुई सखियों के बीच में स्थित हो रुक्मिणी ने गन्‍ध, अक्षत, धूप, आभूषण , पुष्‍पहार, पुष्‍प, दीपमाला, पुआ आदि भोग, वस्‍त्र गन्‍ने तथा ताम्‍बूल आदि अर्पण करके बड़ी भक्ति से भवानी की सेवा-पूजा की। 
तदनन्‍दतर देवी को प्रणाम करके, बहुत से आभूषण आदि द्वारा सौभग्‍यवती स्त्रियों का पूजन करके राजकुमारी ने उन सबको प्रणाम किया।

उन सम्‍पूर्ण सौभाग्‍यवती स्त्रियों ने रुक्मिणी को वर दिये और परम मंगलमय आशीर्वाद प्रदान किये, ‘राजकुमारी तुम्‍हारा रूप-सौन्‍दर्य सदा महारानी शतरुपा के समान अक्षय बना रहे, शील-स्‍वभाव गिरिराजनन्दिनी उमा के समान शोभित हो, तुम में पति सेवा का भाव अरुन्‍धती के समान हो। 
भीष्‍मकनन्दिनि, सौभाग्‍य दक्षिणा के समान और उत्तम वैभव शची के तुल्‍य हो, तुम्‍हारी वाणी सरस्‍वती के सदृश्‍य और पतिभक्ति संतों की हरिभक्ति के समान हो’।

*इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्‍ड के अंतर्गत पाँचवा अध्यास समाप्त*

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