01. गोलोक खण्ड || अध्याय 13 || पूतना का उद्धार
वह पूतना का दूध पीकर जम्हाई ले रहा था। उसे उस अवस्था में देखकर यशोदा तथा रोहिणी के साथ जाकर स्त्रियों ने उठा लिया और छाती से लगाकर वे सब-की-सब विस्मय में पड़ गयीं। बच्चे को ले जाकर गोपियों ने सब ओर से विधिपूर्वक उसकी रक्षा की। यमुनाजी की पवित्र मिट्टी लगाकर उसके ऊपर यमुना-जल का छींटा दिया, फिर उसके ऊपर गाय की पूँछ घुमायी। गोमूत्र और गोरजमिश्रित जल से उसको नहलाया और निम्नांकित रूप से कवच का पाठ किया।
श्री गोपियाँ बोलीं- मेरे लाल ! श्री कृष्ण तेरे सिर की रक्षा करें और भगवान वैकुण्ठ कण्ठ की। श्वेतद्वीप के स्वामी दोनों कानों की, यज्ञरूपधारी श्रीहरि नासिका की, भगवान नृसिंह दोनों नेत्रों की, दशरथ नन्दन श्रीराम जिह्वाकी और नर-नारायण ऋषि तेरे अधरों की रक्षा करें। साक्षात श्रीहरि के कलावतार सनक-सनन्दन आदि चारों महर्षि तेरे दोनों कपोलों की रक्षा करें। भगवान श्वेतवाराह तेरे भालदेश की तथा नारद दोनों भ्रूलताओं की रक्षा करें। भगवान कपिल तेरी ठोढ़ी को और दत्तात्रेय तेरे वक्ष:स्थल को सुरक्षित रखें। भगवान ऋषभ तेरे दोनों कन्धों की और मत्स्य भगवान तेरे दोनों हाथों की रक्षा करें।
पृथुल-पराक्रमी राजा पृथु सदा तेरे बाहुदण्डों को सुरक्षित रखें। भगवान कच्छप उदर की और धंवंतरी तेरी नाभि की रक्षा करें। मोहिनी रूपधारी भगवान तेरे गुह्यदेश को और वामन तेरी कटि को हानि से बचायें। परशुरामजी तेरे पृष्ठभाग की और बादरायण व्यास जी तेरी दोनों जाँघों की रक्षा करें। बलभद्र दोनों घुटनों की और बुद्धदेव तेरी पिंडलियों के रक्षा करें। धर्म पालक भगवान कल्कि गुल्फों सहित तेरे दोनों पैरों को सकुशल रखें। यह सबकी रक्षा करने वाला परम दिव्य ‘श्रीकृष्ण-कवच’ है। इसका उपदेश भगवान विष्णु ने अपने नाभि कमल में विद्यमान ब्रह्माजी को दिया था। ब्रह्माजी ने शम्भु को, शम्भु ने दुर्वासा को और दुर्वासा ने नन्द मन्दिर में आकर श्री यशोदा जी को इसका उपदेश दिया था।
इस कवच के द्वारा गोपियों सहित श्री यशोदा ने नन्दनन्दन की रक्षा करके उन्हें अपना स्तन पिलाया और ब्राह्मणों को प्रचुर धन दिया*¹। उसी समय नन्द आदि गोप मथुरा पुरी से गोकुल में लौट आये। पूतना के भयानक शरीर के देखकर वे सबके सब भय से व्याकुल हो गये। गोपों ने कुठारों से उसके शरीर को काट काटकर यमुनाजी के किनारे कई चिताएँ बनायीं और उसका दाह संस्कार किया। पूतना का शरीर परम पवित्र हो गया था। जलाने पर उससे जो धुआँ निकला, उसमें इलाइची-लवंग, चन्दन, तगर और अगर की सुगन्ध भरी हुई थी। अहो ! जिन पतित-पावन ने पूतना को मोक्ष गति प्रदान की, उन श्रीकृष्ण को छोड़कर हम यहाँ किसकी शरण में जायँ।
बहुलाश्व ने पूछा- देवर्षे ! यह बालघातिनी राक्षसी पूतना पूर्व जन्म में कौन थी ? इसके स्तन में विष लगा हुआ था तथा उसके भीतर का भाव भी दूषित ही था; तथापि इसे उत्तम मोक्ष की प्राप्ति कैसे हुई।
श्री नारद जी बोले- पूर्व काल में राजा बलि के यज्ञ में भगवान वामन के परम उत्तम रूप को देखकर बलि कन्या रत्न माला ने उनके प्रति पुत्रोचित स्नेह किया था। उसने मन ही मन यह संकल्प किया था कि ‘यदि मेरे भी ऐसा ही बालक उत्पन्न हो और उस पवित्र मुस्कान वाले शिशु को मैं अपना स्तन पिला सकूँ तो उससे मेरा चित्त प्रसन्न हो जायेगा।’ बलि भगवान के परम भक्त हैं, अत: उनकी पुत्री को वामन-भगवान ने यह वर दिया कि ‘तेरे मन में जो मनोरथ है, वह पूर्ण हो।’ वही रत्नमाला द्वापर के अंत में पूतना नाम से विख्यात राक्षसी हुई। भगवान श्रीकृष्ण के स्पर्श से उसका उत्तम मनोरथ सफल हो गया। मिथिलानरेश ! जो मनुष्य परात्पर भगवान श्री कृष्ण के इस पूतनोद्धार सम्बन्धी प्रसंग को सुनता है, उसको भगवान की प्रेमपूर्ण भक्ति प्राप्त हो जाती है; फिर उसे धर्म, अर्थ और कामरूप त्रिवर्ग की उपलब्धि हो जाय, इसके लिये तो कहना ही क्या है।
इस प्रकार श्री गर्ग संहिता में गोलोक खण्ड के अंतर्गत नारद-बहुलाश्व संवाद में ‘पूतना-मोक्ष’ नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ।
*¹ श्रीगोप्यच ऊचु:-
श्रीकृष्ण्स्ते शिर: पातु वैकुण्ठ: कण्ठमेव हि। श्वेतद्वीपपति: कर्णौ नासिकां यज्ञरूपधृक् ।। नृसिंहो नेत्रयुग्मं च जिह्वां दशरथात्मज:। अधराववतात्ते तु नरनारायणावृषी ।।
कपोलौ पान्तुर ते साक्षात् सनकाद्या: कला हरे:। भालं ते श्वेतवाराहो नारदो भ्रूलतेऽवतु ।।
चिबुकं कपिल: पातु दत्तात्रेय उरोऽवतु। स्करन्धौ द्वावृषभ: पातु करौ मत्स्य : प्रपातु ते ।।
दोर्दण्डं सततं रक्षेत् पृथु: पृथुलविक्रम:। उदरं कमठ: पातु नाभिं धन्वन्तरिच्श्र ते ।।
मोहिनी गुह्यदेशं च कटिं ते वामनोऽवतु। पृष्ठं परशुरामश्च तवोरू बादरायण: ।।
बलो जानुद्वयं पातु जंघे बुद्ध: प्रपातु ते। पादौ पातु सगुल्फौ व कल्किर्धर्मपति: प्रभु ।। सर्वंरक्षाकरं दिव्यं श्रीकृष्णकवचं परम्। इदं भगवता दत्तं ब्रह्मणे नाभिपंकजे ।।
ब्रह्मणा शम्भवे दत्तं शम्भुर्दुर्वाससे ददौ। दुर्वासा: श्रीयशोमत्यै प्रादाच्छ्रीनन्दमन्दिरे ।। अनेन रक्षां कृत्वास्य गोपीभि: श्रीयशोमती। पाययित्वा स्तनं दानं विप्रेभ्य: प्रददौ महत् ।।(गर्ग0, गोलोक0 13। 15-24)
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