06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 02 || मथुरा पर जरासंध व कालयवन का आक्रमण; भगवान का युद्ध छोड़कर एक गुफा में जाना
मैथिल ! रोष से भरे हुए नरेश की दृष्टि पड़ते ही कालयवन अपने ही देह से उत्पन्न आग की ज्वाला से उसी क्षण जलकर भस्म हो गया। यवन के भस्मीभूत हो जाने पर साक्षात परिपूर्णतम दर्शन कराया। करोड़ों सूर्यों के समान जाज्वल्यमान किरीट, कानों में कुण्डल, बांहों में अंगद और पैरों में नूपुर उदीप्त हो रहे थे। उनके वक्ष:स्थल में श्रीवत्स का चिन्ह सुशोभित था। वे चार भुजाओं से सम्पन्न थे। उनके नेत्र प्रफुल्ल कमल के समान विशाल थे और ग्रीवा में वनमाला लटक रही थी। वे अपने लावण्य से करोड़ों कामदेवों की लज्जित कर रहे थे। उनकी कान्ति काले मेघ के समान श्याम थी। उन्हें देखकर राजा हर्ष से उल्लसित हो उठकर खड़े हो गये और हाथ जोड़कर उन्हें परिपूर्णता भगवान जानकर भक्तिभाव से प्रणाम किया।
मुचुकुन्द ने कहा– जो वसुदेव पुत्र और सच्चिदानन्द स्वरूप होते हुए भी श्रीनन्दगोप के कुमार हैं उन सच्चिदानन्द स्वरूप गोविन्द को बारंबार नमस्कार हैं। जिनकी नाभि से ब्रह्माण्ड कमल की उत्पति हुई है, जो कमल की माला से अलंकृत हैं, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान विशाल हैं तथा चरण भी अपनी शोभा से कमलों को तिरस्कृत करते हैं, उन भगवान को बारंबार नमस्कार है। शुद्ध-बुद्ध परब्रह्मा परमात्मा करने वाले गोविन्द को बारंबार नमस्कार है। जिनकी सहस्त्रोंचरण, नेत्र, मस्तक, उरु और भुजा धारण करने वाले हैं, जिनके सहस्त्रों नाम हैं तथा जो सहस्त्रा कोटि युगों को धारण करने वाले हैं, उन सनातन पुरुष भगवान श्रीकृष्ण को नमस्कार है। हरे ! इस भूतल पर मरे समान कोई पात की नहीं है और आपके समान पापहारी भी दूसरा कोई नहीं है– यह जानकर जगन्नाथ देव ! आपकी जैसी इच्छा हो, वैसी ही कृपा मेरे ऊपर कीजिये*¹।
श्रीनारदजी कहते हैं– राजन् ! मुचुकुन्द के इस प्रकार स्तुति करने पर साक्षात परमानन्द स्वरूप श्रीहरि ने इन्हें निर्गुण भक्त जानकर गम्भीर वाणी में कहा। श्रीभगवान बोले- राजन् ! तुम धन्य हो तथा निरपेक्ष दिव्य भक्तिभाव से भरी तुम्हारी विमल बुद्धि भी धन्य है। तुम आज ही मेरे धाम बदरिकाश्रम को चले जाओ। महाराज ! ब्राह्मण शरीर से प्रेमलक्षणा भक्ति करके तुम प्रकृति से परे मरे दिव्य धाम में पहुँच जाओगे, जहाँ से फिर यहां लौटना नहीं होता है। नारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार श्रीहरि की आज्ञा पाकर, पुन: उनकी स्तुति, वन्दना और परिक्रमा करके, नतमस्तक एवं श्रीकृष्ण प्रेम से विह्वल हुए मुचुकुन्द उस गुहादुर्ग से बाहर निकले। द्वापर में छोटी आकृति वाले मनुष्य कई ताड़ उँचे राजा मुचुकुन्द को देखकर मार्ग में भयभीत हो इधर-इधर भागने लगते थे। ‘मत डरो !’ इस प्रकार अभयदान देते हुए मुचुकुन्द उत्तर दिशा को चले गये। इस तरह उन बुद्धिमान मुचुकुन्द को वरदान देकर भगवान पुन: म्लेच्छों से घिरी हुई मथुरा में आये और म्लेच्छा सेना का संहार करके बलपूर्वक उसका धन छीन लिया।
तदनन्तर राजा जरासंध ने पुन: युद्ध करने का विचार किया मन में लेकर मुहूर्त बताने वाले मगध ब्राह्मणों को बुलवाया और कहा- ‘यदि मैं वासुदेव को जीतकर लौटूंगा तो तुम्हारे अधीन तुम्हारे अधीन रहकर सदा तुम लोगों की पूजा करुंगा। तब तक हे ब्राह्मणों ! तुम लोग मेरे कारागार में ठहरो। यदि मैं पराजित हुआ तो तुम सबको मार डालूँगा, इसमें संशय नहीं है’
ब्राह्मणों से यों कहकर महाबली राजा राजा जरासंध तेईस अक्षौहिणी सेना साथ लेकर शीघ्र मथुरा में आया। मगध ब्राह्मणों की बात सत्य करने के लिये भगवान ने अपनी टेक छोड़ दी और मनुष्य की सी चेष्टा को अपनाकर अपने नगर से भयभीत की भांति परमदेव बलराम और श्रीकृष्ण पैदल ही बडे़ जोर से भागे। उन्हें भागते देख मगधराज अट्टहास करने लगा। वह ब्राह्मणों के वचनों का अनुस्मरण करके रथसेना के साथ उनका पीछा करने लगा। वे दोनों भाई श्रीहरि दक्षिण दिशा की ओर जाते ही छिपे जान जरासंध ने लकड़ी जलाकर वहां जंगल में आग लगा दी। प्रवर्षणगिरि के समस्त वन के भस्मीभूत हो जाने पर उस जलते हुए पर्वत के ग्यारह योजन ऊँचे शिखर से कूदकर वे दोनों देवेश्वर शत्रुओं से अलक्षित रहकर द्वारका में जा पहुँचे। महाबली वीर मगधराज उन दोनों को दग्ध हुआ जान अपनी विजय के नगारे बजवाता हुआ मगधदेश को लौट गया।। नरेश्वर ! उसने बड़ी भक्ति से ब्राह्मणों का पूजन किया और कहा- ‘ब्राह्मण जिसका सहायक है, उसकी पराजय कैसे हो सकती है।'
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘द्वारकावास कथन’ नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ।
कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च ।
नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नम:॥
नम: पंकजनाभाय नम: पंकजमालिने। नम: पंकजनेत्राय नमस्ते पंकजाङघ्रये।।
नम: कृष्णाय शुद्धाय ब्रह्मणे परमात्मने। प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नम:।।
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्त्रमूर्तये सहस्त्रपादाक्षिरोरुबाहवे। सहस्त्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्त्रकोटीयुगधारिणे नम:।।
हरे मत्सम: पातकी नास्ति भूमौ तथा त्वत्समोनास्ति पापापहारी। इति त्वं च मत्वा जगन्नाथ देव यथेच्छा भवेत्ते तथा मां कुरु त्वम्।।
(गर्ग0 द्वारका0 2। 26-30)
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