06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 09 || द्वारकापुरी के पृथ्वी पर आने का कारण; राजा आनर्त की तपस्या और उन पर भगवान श्रीकृष्ण की कृपा
06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 09 || द्वारकापुरी के पृथ्वी पर आने का कारण; राजा आनर्त की तपस्या और उन पर भगवान श्रीकृष्ण की कृपा
बहुलाश्व बोले- मुने ! तीनों लोकों में विख्यात द्वारकापुरी धन्य है, जहाँ साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्ण निवास करते हैं। आपके मुख से सुना है कि द्वारकापुरी साक्षात श्रीकृष्ण के अंग से प्रकट हुई; प्रभो ! ब्रह्मन् ! किस काल में वह पुरी यहाँ आयी, यह मुझे बातइये ।
श्रीनारदजी ने कहा- राजन् ! तुम्हें साधुवाद है। तुमने बहुत अच्छा किया, जो द्वारका के यहाँ आगमन का कारण पूछा, जिसे सुनकर लोकघाती पातकी भी शुद्ध हो जाता है।
मनु के पुत्र शर्याति नामक एक राजा हुए जो चक्रवर्ती सम्राट थे। उन्होंने दस हजार वर्षों तक इस भूतल पर धर्मपूर्वक राज्य किया। उनके तीन पुत्र हुए, जो समस्त धर्म पुरुषों में श्रेष्ठ थे। उनके नाम थे- उतानबर्हि, अनार्त और भूरिषेण।
राजा शर्याति ने उतानबर्हि को पूर्व दिशा, भूरिषेण को दक्षिण दिशा और आनर्त को सारी पश्चिम दिशा का राज्य दिया। फिर वे पुत्रों सेबोले- ‘यह सारी पृथ्वी मेरी है। मैंने धर्म पूर्वक इसका पालन किया है तथा बलिष्ठ होकर बलपूर्वक इसका अर्जन किया है अतः तुम लोग इसका धर्म पूर्वक पालन करो।' पिता की यह सुन बात सुनकर मझले पुत्र ज्ञानी आनर्त ने मानो हंसते हुए यह ज्ञानमय वचन कहा।
आनर्त बोले- राजन् ! यह सारी पृथ्वी आपकी नहीं है। न आपने कभी इसका पालन किया है और न आपके बल से इसका अर्जन हुआ है राजन् ! बलिष्ठ तो भगवान श्रीकृष्णदेव ही हैं, अत: यह पृथ्वी श्रीकृष्णदेव की है। उन्होंने इसका पालन किया और उन्हीं के तेज से इस सम्पूर्ण वसुंधरा का अर्जन हुआ है। भगवान श्रीहरि के समान बलिष्ठ दूसरा कोई नहीं है। वे ही भगवान अपने द्वारा प्रकट किये गये इस जगत की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं और वे ही भगवान कलना करने वालों के स्वामी ’काल’ हैं। जो सम्पूर्ण भूतों के भीतर प्रवेश करे सबका आश्रय है, वह विश्वसंज्ञक अधियज्ञ साक्षात परिपूर्णतम श्रीहरि ही हैं, जिनके भय से हवा चली गई है जिनके भय सूर्य तपते हैं, जिनके भय से पर्जन्यदेव वर्षा करते हैं और जिनके भय से मृत्यु घूमती रहती है। राजन ! उन साक्षात परिपूर्णतम परमेश्वर श्री कृष्ण का संपूर्ण हृदय से कहंकार शून्य होकर भजन कीजिए।
नारदजी कहते हैं- मिथिलेश्वर ! राजा से शयार्ति ज्ञान को प्राप्त होकर भी पुत्र के व्यंग बाण से आहत हो रोष से फडकते हुए अंधेरों द्वारा अपने मध्यम पुत्र आनर्त से बोले।
शयर्ती ने कहा- ओ खोटी बुद्धि वाले बालक दूर हट जाओ ग्रुरू की भाँति उपदेश कैसे कर रहे हो? जहां तक मेरा राज्य है वहां तक की भूमि पर तुम निवास मत करो। तुमने जिन सर्वसहायक श्री कृष्ण की आराधना की है। वह भगवान भी क्या तुम्हारे लिए कोई नई पृथ्वी दे देंगे।
नारदजी कहते हैं- मिथिलेश्वर ! उनके यों कहने पर दूसरों को मान देने वाले आनर्त ने राजा से कहा- ‘जहाँ तक पृथ्वी पर आपका राज्य है, वहाँ तक मेरा निवास नहीं होगा ?।
पिता राजा शर्याति द्वारा निकाले गये आनर्त उनसे विदा ले समुद्र के तट पर चले गये और समुद्र की वेला में पहुँचकर दस हजार वर्षों तपस्या करते रहे आनर्त की प्रेमलक्षणा- भक्ति से प्रसन्न हो भगवान श्रीहरि ने उन्हें अपने स्वरूप का दर्शन कराया और वर मांगने के लिये कहा। आनर्त दोनों हाथ जोड़कर शीघ्रतापूर्वक उठे और रोमांचयुक्त तथा प्रेम से विह्वल हो उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण चरणारविन्दों में प्रणाम किया ।
आनर्त बोले- सबके हृदय में वास करने वाले आप वासुदेव को नमस्कार है। आकर्षण-शक्ति के अधिष्ठाता देवता आप संकर्षण को नमस्कार है। कामावतार प्रद्युम्न और ब्रह्मावतार अनिरुद्ध को भी नमस्कार है। भगवन् ! आप साधु-संतों के प्रतिपालक हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। देव ! मेरे पिता ने मुझे राज्य से बाहर निकाल दिया है, अत: मैं आपकी शरण में आया हूँ। मुझे दूसरी कोई भूमि दीजिये, जहाँ मेरा निवास हो सके। ध्रुव भी जिनके कृपा प्रसाद से सर्वोत्तम पद को प्राप्त हुए, प्रणतजनों का क्लेश दूर करने वाले उन भगवान को मेरा नमस्कार है*¹।
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! आनर्त को आनत एवं दीन जानकर दीनवत्सल भगवान प्रसन्न हो मेघ के समान गम्भीर वाणी में श्रीमुख से कहा।
श्रीभगवान बोले- नरेश्वर ! इस लोक में दूसरी कोई पृथ्वी तो है नहीं, फिर मैं क्या करुँ ? परंतप ! तुम्हारी भक्ति से मैं संतुष्ट हूँ, अत: अपनी बात सत्य करने के लिये तुम्हें अपने दिव्यलोक वैकुण्ठधाम का सौ योजन लंबा-चौड़ा भूखण्ड लाकर देता हूँ। वह अत्यन्त निर्मल तथा शुभद है।
श्रीनारदजी कहते हैं- विदेहराज ! आनर्त-नरेश से यों कहकर भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण ने वैकुण्ठ से सौ योजन विशाल भूखण्ड उखाड़ मँगाया रऔ भयंकर शब्द करने वाले समुद्र में सुदर्शन चक्र की नींव बनाकर उसी के ऊपर भूखण्ड को स्थापित किया। राजा आनर्त ने एक लाख वर्षों तक पुत्र-पौत्रों से सम्पन्न हो वहाँ राज्य किया। उस राज्य में वैकुण्ठ का वैभव भरा हुआ था। तब उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। आतर्न के प्रसाद से ही ‘आनर्त’ नामक देश प्रकट हुआ। पूर्वकाल में श्रीशैल नामक पर्वत का एक पुत्र था। आनर्त ने उसे अपने हाथों से उखाड़कर आनर्त देश में स्थापित किया। ‘रैवतक’ नाम से विख्यात हुआ। राजा रेवत कुशस्थलीपुरी का निर्माण कराके वहाँ दीर्घकाल तक राज्य करने के पश्चात अपनी कन्या रेवती को साथ ले ब्रह्मलोक में गये, यह सब कथा मेरे द्वारा बलदेव-विवाह के प्रसंग में कही जा चुकी है। इसी कारण पुण्यमयी द्वारकापुरी को देवताओं ने ‘मोक्ष का द्वार’ माना है।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में 'द्वारकापुरी के पृथ्वी पर आने का कारण’ नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।।9।।
*¹ आनर्त उवाच- नमस्ते वासुदेवाय नम: संकर्षणाय च। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नम: ।। ध्रुवोऽपि यत्प्रसादेन ययौ सर्वोत्तमं पदम्। तस्मै नमो भगवते प्रणतक्लेशहारिणे ।।गर्ग0 द्वारका0 9। 22, 24
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