06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 11 || गज और ग्राह बने हुए मन्त्रियों का युद्ध और भगवान विष्‍णु के द्वारा उनका उद्धार

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 11 || गज और ग्राह बने हुए मन्त्रियों का युद्ध और भगवान विष्‍णु के द्वारा उनका उद्धार

नारदजी कहते हैं- राजन! कुबेर के दोनों मन्‍त्री ब्राह्मण के शाप से मोहित होकर अत्‍यन्‍त दीन-दुखी हो गये। उस यज्ञ में साक्षात भगवान विष्णु पधारे थे। वे अपनी शरण में आये हुए उन दोनों मन्त्रियों से बोले। 

श्रीभगवान ने कहा- मेरी अर्चना से युक्‍त इस यज्ञ में तुम दोनों को दु:ख उठाना पड़ा है। ब्राह्मणों की कही हुई बात को टाल देने या अन्‍यथा करने की शक्ति मुझ में नहीं है। तुम दोनों ग्राह और हाथी हो जाओ। जब कभी तुम दोनों में युद्ध छिड़ जायगा, तब मेरी कृपा से तुम दोनों अपने पूर्ववर्ती स्‍वरूप को प्राप्‍त हो जाओगे । 

नारदजी कहते हैं- राजन ! भगवान विष्णु के यों कहने पर राजाधिराज कुबेर के वे दोनों मन्‍त्री ग्राह और हाथी हो गये, परंतु उन्‍हें अपने पूर्वजन्‍म की बातों का स्‍मरण बना रहा। घण्‍टानाद ग्राह हो गया और सैकड़ों वर्षों तक गोमती में रहा। वह बड़ा विकराल, अत्‍यन्‍त भयंकर तथा सदा रौद्ररूप धारण किये रहता था। पार्श्‍वमौलि रैवतक पर्वत के जंगल में चार दॉतों वाला हाथी हुआ। उसके शरीर का रंग काजल के समान काला था। उसके पृष्‍ठ भाग की ऊचांई सौ धनुष बराबर थी। वंजुल, कुरब, कुन्‍द, बदर बेंत, बांस, केला, भोजपत्र का पेड़, कचनार, बिजैसार, अर्जुन, मन्‍दार, बकायन, अशोक, बरगद, आम, चम्‍पा, चन्‍दन, कटहल, गूलर, पीपल, खजूर, बिजौरा नींबू, चिरौंजी, आमड़ा, आम्र तथा क्रमुक के वृक्षों से परिमण्डित रैवतक के विशाल वन में वह महागजराज विचरा करता था । 

एक समय वैशाख मास में वह गजराज पर्वतीय कन्‍दरा से निकलकर अपने गुणों के साथ चिग्‍घाड़ता हुआ गोमती-गंगा में स्‍नान के लिये आया। बहुत देर तक जल में स्‍नान करके इधर-उधर सूँड़ घुमाते हुए उस गजराज ने अपनी सूँड़ के जल से हाथियों के सभी छोटे-छोटे बच्‍चों को नहलाया। वह महाबलिष्‍ठ महान ग्राह भी दैव की प्रेरणा से उसी जल में विद्यमान था। उसने दैव की प्रेरणा से रोष से भरकर उस गजराज का एक पैर पकड़ लिया। 

वह बलोन्मत्त गजराज को अपने घर में खींच ले गया। फिर हाथी भी उसे खींचकर जल के बाहर ले आया। तत्पश्चात् उसने पुन: हाथी को खींचा। हथिनियां और उसके बच्‍चे उस गजराज को संकट से उबारने मे असमर्थ थे। इस प्रकार युद्ध करते और परस्‍पर एक-दूसरे को खींचते हुए उन दोनों के पचपन वर्ष व्‍यतीत हो गये। सत्‍पुरुषों के नेत्रों के समक्ष यह घटना घटित हो रही थी।

इस प्रकार कष्‍ट में पड़कर कालपाश के वशीभूत हो पूर्व जन्‍म की बातों को स्‍मरण करने वाला वह महान गजराज प्रेमलक्षणा-भक्ति से श्रीहरि के चरणों का आश्रय ले उन्‍हीं का चिन्‍तन करने लगा।

गजेन्‍द्र बोला- हे श्रीकृष्‍ण ! हे कृष्‍ण (अर्जुन) के सखा तथा हे श्‍याम शरीर धारण करने वाले देवेश्‍वर विष्‍णुदेव ! आप श्रीकृष्‍ण को मेरा प्रणाम प्राप्‍त हो। हे पूर्ण प्रभो ! हे परम पावन पुण्‍यकीर्ति ! हे परमेश्‍वर ! पाप के पाश से मेरी रक्षा करो, रक्षा करो*¹।

नारदजी कहते हैं- राजन ! इस प्रकार ग्रहा ने जिसका पैर पकड़ लिया था, उस हाथी को अपना स्‍मरण करता जान, दीनवत्‍सल श्रीहरि गरुड पर आरुढ़ हो बडे़ वेग से दौड़े आये। उन्‍होंने स्‍व ही गरुड़ से उतरकर दौड़ते हुए उस ग्राह पर चक्र चलाया। चक्र के वहाँ पहुँचने के पहले ही ग्राह का वह अद्भुत मस्‍तक उसके धड़ से कटकर अलग हो गया, जैसे दीनता के प्राप्‍त होते ही धन चला जाता है। इसके बाद वह चक्र गोमती के कुण्‍ड में महान शब्‍द करता हुआ गिरा। उसने वहाँ के समस्‍त प्रस्‍तर-समूहों को चक्र से चिह्नित कर दिया। उसकी नेमि की रगड़ से वहाँ कल्‍याणकारी ‘चक्रतीर्थ’ प्रकट हो गया। राजन् ! उस चक्रतीर्थ के दर्शन से ब्रह्महत्‍या छूट जाती है। मस्‍तक कट जाने से ग्राह ने अपना पूर्व रूप धारण कर लिया और श्रीकृष्‍ण के अनुग्रह से उस हाथी का दिव्‍य रूप हो गया। 

फिर श्रीहरि की परिक्रमा, नमस्‍कार और स्‍तुति करके हाथ जोडे़ हुए वे दोनों कुबेर-मन्‍त्री पुन: अपने स्‍थान को चले गये। देवता लोग फूल बरसाते हुए जय-जयकार करने लगे। भगवान प्रकृति से परे विद्यमान अपने साक्षात धाम में चले गये। जो नरश्रेष्‍ठ चक्रतीर्थ की इस कथा को सुनता है, वह चक्रतीर्थ में स्‍नान करने का फल पाता है- इसमें संशय नहीं है। जो एकाग्रचित्त हो गज और ग्राह की इस पुण्‍यमयी कथा को सुनता है, उसके बुरे स्‍वप्‍न नष्‍ट हो जाते हैं तथा निश्‍चय ही उसे अच्‍छे स्‍वप्‍न दिखायी देते हैं ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्‍व संवाद में चक्रतीर्थ की उत्‍पत्ति के प्रसंग में ‘गज और ग्राह का शाप से उद्धार’ नामक ग्‍यारहवां अध्‍याय पूरा हुआ।


श्रीकृष्ण कृष्णसख कृष्णवपुर्दधान कृष्णाय ते प्रणतिरस्तु सुरेश विष्णो ।
पूर्णप्रभो परमपावन पुण्यकीर्ते मां पाहि पाहि परमेश्वर पापपाशात् ।। 
(गर्ग संहिता द्वारका खंड 11 | 17)

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