06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 13 || प्रभास, सरस्‍वती, बोधप्पिल और गोमती सिन्‍धु संगम का माहात्‍म्‍य


06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 13 || प्रभास, सरस्‍वती, बोधप्पिल और गोमती सिन्‍धु संगम का माहात्‍म्‍य

श्रीनारदजी कहते हैं- महामते ! विदेहराज ! प्रभासतीर्थ का भी माहात्‍म्‍य सुनो, जो सर्वपापापहारी, पुण्‍यदायक तथा तेज की वृद्धि करने वाला है। राजन् ! सिंह राशि में बृहस्‍पति के रहते गोदावरी में, कुम्‍भगत बृहस्‍पति होने पर हरक्षेत्र (हरद्वार) में, सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में और चन्‍द्रग्रहण के अवसर पर काशी में स्‍नान और दान करके मनुष्‍य जिस पुण्‍य को पाता है,उससे सौगुना पुण्‍य प्रभासक्षेत्र में प्रतिदिन स्‍नान करने से प्राप्‍त होता रहता है। दक्ष के शाप से राजयक्ष्‍मा नामक रोग हो जाने पर नक्षत्रों के स्‍वामी चन्‍द्रमा जहाँ स्‍नान करके तत्‍काल शाप-दोष से मुक्‍त हो गये और पुन: उनकी कलाओं का उदय हुआ, वही ’प्रभासतीर्थ’ है। 

राजन्! उस तीर्थ में परम पुण्‍यमयी पश्चिमवाहिनी सरस्‍वती प्रवाहित होती हैं। उनके जल में स्‍नान करके पापी मनुष्‍य भी साक्षात ब्रह्ममय हो जाता है। नरेश्‍वर ! सरस्वती के तट पर ‘बोधप्पिल’ नाम से प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ भगवान श्रीकृष्‍ण ने उद्धव को परम कल्‍याणमय भागवत-धर्म का उपदेश दिया था। राजन् ! उस बोधप्पिल की विधिवत पूजा करके सिर नवाकर जो उसका स्‍पर्श करता है और ब्रह्मसम्मित भागवत पुराण को सुनता है- मन को संयम में रखते हुए मौनभाव से भागवत का आधा श्‍लोक या चौथाई श्‍लोक भी सुन लेता है- उसके हाथ में भगवान विष्‍णु का परम पद आ जाता है, अर्थात उसके लिये परम पद की प्राप्ति निश्‍चि‍त हो जाती है। जो प्रभास में भाद्रपद मास की पूर्णिमा ति‍थि को सोने के सिंहासन युक्‍त श्रीमदभागवत पुराण का दान करता है, वह परमगति को प्राप्‍त होता है। जिन्‍होने कहीं या कभी श्रीमदभागवत पुराण नहीं सुना, उन भूमिवासी मनुष्‍यों का जन्‍म व्‍यर्थ चला गया। जिन्‍होंने भागवत पुराण नहीं सुना, जिनके द्वारा पुराण-पुरुष परमात्‍मा की आराधना नहीं की गयी तथा जिन लोगों ने भूमिदेवों ब्राह्मणों के मुखरूपी अग्‍न‍ि में उत्‍तम भोजन की आहुति नहीं दी, उन मनुष्‍यों का जन्‍म व्‍यर्थ चला गया*¹।

द्वारका में गोमती और समुद्र का संगम सब तीर्थों का राजा है, जिसमें स्‍नान करके मनुष्‍य निर्मल वैकुण्‍ठधाम को प्राप्‍त होता है। गंगासागर संगमतीर्थ में स्‍नान करने से सौ अश्‍वमेध यज्ञों का पुण्‍यफल प्राप्‍त होता है। उससे भी सहस्‍त्रगुना पुण्‍य गोमती सागर संगम में स्‍नान करने से सुलभ होता है। इसी विषय में पुराणवेता पुरुष इस पुरातन इतिहास का कथन किया करते हैं, जिसके श्रवणमात्र से मनुष्‍य पापताप से मुक्‍त हो जाता है।

पूर्वकाल में हस्तिनापुर में राजमार्गपति नामक एक श्रेष्‍ठ वैश्‍य निवास करता था। वह महान गौरवशाली तथा कुबेर के समान निधिपति था। आगे चलकर वह वैश्‍य वेश्‍याओं के प्रसंग में रहने लगा। वह विटों (धूर्तों और लम्‍पटों) की गोष्‍ठी में बड़ा चतुर समझा जाता था। जुआ खेलाने मे उसकी बड़ी आसक्ति थी। वह लोभ, मोह और मद से उन्‍मत रहता था। वह महादुष्‍ट वेरूय सदा झूठ बोलता और कुकर्म में लगा रहता था। उसने ब्राह्मणों, पितरों और देवताओं के निमित कभी धन का दान नहीं किया। वह यदि कहीं दूर से भगवान की कथा- वार्ता होती देख लेता तो कतराकर जल्‍दी ही और दूर निकला जात था। उसने मां-बाप की कभी सेवा नहीं की और अपने पुत्रों को भी धन नहीं दिया। वह ऐसा दुर्बुद्धि और खल था कि धनाढ्य होने पर भी अपनी पत्‍नी को त्‍यागकर उससे अलग रहने लगा। वेश्‍याओं के संग में रहने से उसका आधा धन नष्‍ट हो गया; आधा चोर चुरा ले गये और जो कुछ थोड़ा-सा पृथ्‍वी में गड़ा हुआ था, वह स्‍वत: वहीं विलीन हो गया; क्‍योंकि पुण्‍य से लक्ष्‍मी बढ़ती है और पाप से निश्‍चय ही नष्‍ट हो जाती है। 

इस प्रकार वेश्‍याओं में में आसक्‍त हुआ वह महादुष्‍ट वैश्‍य निर्धन हो गया और उसी रमणीय नगर हस्तिनापुर में चोरी का काम करने लगा। उन दिनों वहाँ राजा शांतनु राज्‍य करते थे। उन्‍होंने चोरी के कर्म में लगे हुए उस वैश्‍य को रस्सियों से बांधकर अपने देश से बाहर निकलवा दिया। वन में रहकर वह जीवों की हिंसा करने लगा। उन्‍हीं दिनों वहाँ बहुत वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। तब दुर्भिक्ष से पीड़ित हुआ वह वैश्‍य पश्चिम दिशा की ओर चला गया। वहाँ वन में किसी सिंह ने अपने पंजे से उसको मार डाला। उसी समय यमदूत आये और उसे पाशों में बांधकर नीचे मुख करके लटकाये तथा कोड़ों से पीटते हुए यमलोक के मार्ग पर ले चले। तदनन्‍तर कोई महान गृध्र उसकी बांह का मांस लेकर आकाश मे उड़ गया ओर अपनी चोंच से तुरंत ही उसको खाने लगा। अन्‍य पक्षी जिन्‍हें मांस नहीं‍ मिला था, वे सब आतुर हो उसी में से अपने लिये भी मांस ग्रहण करने लगे। इस प्रकार चील आदि पक्षियों का वहाँ महान् कोलाहाल होने लगा; तथापि उस गृध्र ने अपने मुख से उस मांस को नहीं छोड़ा। वह उड़ते-उड़ते पश्चिम दिशा की ओर चला गया। वहाँ उसी के समान शक्तिशाली एक दूसरे गृध्र ने उसके मुख पर अपनी तीखी चोंच से प्रहार किया। तब उसके मुँह से वह मांस गोमती सागर-संगम में गिर गया। उस तीर्थ में उसके मांस के डूबते ही यह महापात की वैश्‍य यमदूतों के पाशों को स्‍वयं तोड़कर चार भुजाओं से युक्‍त देवता हो गया और उन दूतों के देखते-देखते दिव्‍य विमान पर आरुढ़ हो सम्‍पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ वह श्रीहरि के परमधाम में चला गया। 

जो मनुष्‍य गोमती-समुद्र-संगम के इस माहात्‍म्‍य को सुनता है, वह सब पापों से मुक्‍त हो भगवान विष्‍णु के लोक में जाता है। 

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्‍व संवाद में 'प्रभास, सरस्वती, बोधपिप्पल तथा गोमती-सिन्धु-संगम का माहात्म्य' नामक तेरहवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।

*¹ पुराणं न श्रुतं यैस्‍तु श्रीमद्भागवतं क्‍वचित्। तेषां वृथा जन्‍म गतं नराणां भूमिवासिनाम् ।।
यैर्न श्रुतं भागवतं पुराणं नाराधितो यै: पुरुष: पुराण:। हुतं मुखे नैव धरामराणां तेषां वृथा जन्‍म गतं नराणाम् ।।
(गर्ग0 द्वारका0 13। 10-11)

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