06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 12 || महामुनि त्रित के शाप से कक्षीवान का शंक रूप होकर सरोवर में रहना और श्रीकृष्ण के द्वारा उसका उद्धार होना; शंखोद्धार-तीर्थ की महिमा
06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 12 || महामुनि त्रित के शाप से कक्षीवान का शंक रूप होकर सरोवर में रहना और श्रीकृष्ण के द्वारा उसका उद्धार होना; शंखोद्धार-तीर्थ की महिमा
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! द्वारका में जो ‘शंखोद्धार’ नामक तीर्थ है, वह सब तीर्थों में प्रधान है। जो मनुष्य उस तीर्थ में स्नान करके सुवर्ण का दान देता है, वह सम्पूर्ण उपद्रवों से रहित विष्णुलोक में जाता है।
एक समय श्रीकृष्ण भक्त शान्तचित महामुनि त्रित तीर्थयात्रा के प्रसंग से आनर्त देश में आये। वहाँ एक सुन्दर सरोवर देखकर मुनि ने उसमें स्नान करके श्रीहरि की पूजा की। उस पूजा में सुन्दर लक्षणों से युक्त जो महाशंक वे बजाया करते थे, उसे उन्हीं के शिष्य कक्षीवान ने अत्यन्त लोभ के कारण चुरा लिया। पूजा का शंख चुराया गया देखा मुनिवर त्रित कुपित होकर बोले- ‘जो मेरा शंख ले गये है, वह अवश्य ही शंख हो जाये।’ कक्षीवान् तत्काल शाप से पीड़ित हो शंख हो गया और गुरु के चरणों में गिरकर बोला- ‘भगवान ! मेरी रक्षा कीजिये। त्रितमुनि शीघ्र ही शान्त हो गये और बोले- ‘दुर्बुद्धे ! यह तुमने क्या किया ? चोरी के दोष से जा पाप हुआ है, उसका फल भोग। मेरी बात झूठी नहीं हो सकती। तू यहाँ श्रीकृष्ण के चरण-कमलों का चिन्तन करता रहा; वे ही तेरा उद्धार करेंगे।
राजन् ! यों कहकर जब महामुनि त्रिदेव वहाँ से चले गये, तब शंकरूपधारी कक्षीवान उस सरोवर में कूद पड़ा और ’कृष्ण ! कृष्ण ! !’ पुकारता हुआ सौ वर्षों तक वहीं रहा।
तदनन्तर भक्तवत्सल परिपूर्णतम साक्षात भगवान श्रीकृष्ण उस सरोवर के तट पर आये और उसे अभय दान देते हुए बोले- ‘डरो मत। ‘मेघ-गर्जना के समान चीख उठा- ‘देवदेव ! जगत्पते ! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। ‘तब सर्व सामर्थ्यशाली कृपापराण भगवान ने नागराज के शरीर की भाँति अपने हष्ट–पुष्ट भुजा के द्वारा उस भक्त शंख का उसी प्रकार जल से उद्धार किया था। कक्षीवान उसी क्षण शंक का रूप छोड़कर दिव्यरूपधारी हो गया और हाथ जोड़ श्रीहरि को नमस्कार करके उनकी स्तुति करने लगा।
कक्षीवान ने कहा- वासुदेव ! आपको नमस्कार है। गोविन्द ! पुरुषोत्तम ! दीनवत्सल ! दीनानाथ ! द्वारकानाथ ! परमेश्वर ! आपको मेरा बारंबार प्रणाम है। आपने ही ध्रुव को ध्रुवपद प्रदान किया, प्रह्लाद की पीड़ा हर ली, गजराज का उद्धार किया तथा राजाबलि की भेंट स्वीकार की; आपको बारंबार नमस्कार है। द्रौपदी का चीर बढ़ाकर उसकी लाज बचाने वाले आप श्रीहरि को नमस्कार है। विष, अग्नि और वनवास से पाण्डवों की रक्षा करने वाले पाण्डव सहायक आपको नमस्कार है। यदुकुल के रक्षक तथा इन्द्र के कोप से व्रज के गोपों की रक्षा करने वाले आपको नमस्कार है। गुरु को, माता देवकी को और ब्राह्मण को उनके मरे हुए पुत्रों को लाकर देने वाले श्रीकृष्ण ! आपको बारंबार नमस्कार है। जरासंध की कैद में पडे़ हुए नरेशों को वहाँ से छुटकारा दिलाने वाले, राजा नृग का उद्धार करने वाले तथा सुदामा की दीनता हर लेने वाले आप साक्षात परमेश्वर को नमस्कार है। आप वासुदेव श्रीकृष्ण को नमस्कार है। संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध को भी नमस्कार है। इस प्रकार चतुर्व्यूहनुपधारी आप परमेश्वर को मेरा प्रणाम है। देवदेव ! आप ही मेरी माता, आप ही पिता, आप ही बन्धु आप ही सखा, आप ही विद्या, आप ही धन और आप ही मेरे सब कुछ हैं *¹।
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार श्रीहरि की स्तुति करके प्रेमपूरित कक्षीवान एक श्रेष्ठ विमान पर आरुढ़ हो यादवों के देखते–देखते, सैकड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी होकर, दसों दिशाओं को उद्भासित करता हुआ समस्त उपद्रवों से सहित विष्णुधाम में चला गया। मैथिलेश्वर ! श्रीहरि ने जिस सरोवर के तट पर शंख का उद्धार किया था, वह उस घटना के कारण ही गया। जो श्रेष्ठ मानव शंखोद्धार की इस कथा को सुनता है, वह शंखोद्धार तीर्थ में स्नान करने का फल पा जाता है- इसमे संशय नहीं है।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘शंखोद्धार तीर्थ का माहात्म्य’ नामक बारहवां अध्याय पूरा हुआ ।
*¹ वासुदेव नमस्तेऽस्तु गोविन्द पुरुषोत्तम। दीनवत्सल दीनेश द्वारकेश परेश्वर ।। ध्रुवे ध्रुवपदं दात्रे प्रहलादस्यार्तिहारिणे। गजस्योद्धारिणे तुभ्यं बलर्बलिविदे नम: ।। द्रौपदीचीरसंत्राणकारिणे हरये नम:। गराग्निवनवासेभ्य: पाण्डवानां सहायिने ।। यादवत्राणकर्त्रे च शक्रादाभीररक्षिणे। गुरुमातृद्विजानां च पुत्रदात्रे नमो नम: ।। जरासंधनिरोधार्तनृपाणां मोक्षकारिणे। नृगस्योद्धारिणे साक्षात् सुदाम्नो दैन्यहारिणे ।। वासुदेवाय कृष्णाय नम: संकर्षणाय च। प्रद्युम्नायानिरूद्धाय चतुर्व्यूहाय ते नम: ।। त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्व सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ।।गर्ग0 द्वारका0 12। 13-19
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