06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 18 || सिद्धाश्रम में व्रजांगनाओं तथा सोलह सहस्त्र रानियों के साथ श्यामसुन्दर की रासक्रीड़ा का वर्णन तथा श्रीराधा के मुख से वृन्दावन के रास की उत्कृष्टता का प्रतिपादन
06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 18 || सिद्धाश्रम में व्रजांगनाओं तथा सोलह सहस्त्र रानियों के साथ श्यामसुन्दर की रासक्रीड़ा का वर्णन तथा श्रीराधा के मुख से वृन्दावन के रास की उत्कृष्टता का प्रतिपादन
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! श्रीराधा और गोपीगणों आदि राजकुमारियों ने रासक्रीड़ा देखने के लिये उत्सुक हो श्रीहरि से कहा।
पटरानियां बोलीं- श्यामसुन्दर ! तुममें प्रेम लक्षणाभक्ति रखने वाली गोपसुन्दरियां धन्य हैं, जो रास-रंग में सम्मिलित हुई थीं। इन सबके तप का क्या वर्णन हो सकता है। माधव ! प्रभो ! यदि तुम हमारी प्रार्थना स्वीकार करो तो, वृन्दावन में तुमने जिस चाहती हैं। तुम यहीं हो, श्रीराधा यहीं विराज रही हैं, सम्पूर्ण गोपसुन्दरियां एवं व्रजांगनाओं भी यहीं रास का आयोजन सर्वथा उचित होगा। जगन्नाथ ! तुम हमारे इस मनोरथ को पूर्ण करो। मनोहर ! प्राणवल्लभ ! हमने दूसरा कोई मनोरथ नहीं प्रकट किया है, केवल रासक्रीड़ा का दर्शन कराओं। रानियों का यह बात सुनकर भगवान हँसने लगे। उन्होंने प्रेमपूरित होकर उन सबको अपने वचनों द्वारा मोहित-सी करते हुए कहा।
श्रीभगवान बोले- अंगनाओं ! रासेश्वरी श्रीराधा के मन में भी रासक्रीड़ा की इच्छा हो ता यहाँ रास हो सकता है। अत: तुम्हीं सब जाकर उनसे पूछो। श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर रुक्मिणी आदि राजकुमारियों ने श्रीराधा के पास जाकर हँसते हुए मुख से अत्यन्त प्रेमपूर्वक कहा।
श्रीरानियां बोलीं- चन्द्रवदने ! व्रजसुन्दरियों की स्वामि ! प्रियतमे ! सखि ! शीलरुपिणि ! रास में कीर्तिरानी के कुल की कीर्ति बढ़ाने वाली शुभांगि ! हम सब तुम्हारी सखियां तुमसे एक बात पूछने आयी हैं। रास में रस प्रदान करने वाले रासेश्वर यहीं हैं तथा रास अधीश्वर तुम भी यहीं हो और अन्य समस्त गोपसुन्दरियां भी यहीं है। इसी प्रकार हम सब भी यहाँ हैं; अत: सब प्रकार से रस का आस्वादन करने के लिये तुम यहाँ रास का आयोजन करो। प्रियतम ! ऐसा हो तो यह हमारे लिये अत्यन्त प्रिय होगा।
श्रीराधा ने कहा- सत्पुरुषों पर कृपा करने वाले परम रासेश्वर श्यामसुन्दर के मन में यदि रासक्रीड़ा की अभिलाषा हो तो यहाँ रास हो सकता है। अत: मेरी प्रियतम सखियों ! तुम सब परम सेवा-शुश्रूषा और पराभक्ति से उनकी पूजा करके उन्हें वश में करो।
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! श्रीराधा की बात सुनकर रानियों ने श्रीकृष्ण की कही हुई बात बतायी। तब फिर वैशाख मास की पूर्णिमा को उस शुभ एवं पुण्यतीर्थ सिद्धाश्रम में जब रात्रि का प्रथम प्रहर प्राप्त हुआ और चन्द्रमा की चांदनी सब ओर फैल गयी, तब रासक्रीड़ा का आरम्भ हुआ। रासेश्वरी के रास का आनन्द प्राप्त करने के लिये रासेश्वरी श्रीराधा तैयार हो गयी और उसी तरह सुशोभित हुए, जैसे रतिकशेखर श्यामसुन्दर रासस्थली में उसी तरह सुशोभित हुए, जैसे रति के साथ रतिपति मदन। जितनी सम्पूर्ण गोपसुन्दर और जितनी राजकन्याएं वहाँ उपस्थित थीं, उतने ही रूप धारण करके दो-दो सुन्दरियों के बीच में एक-एक श्रीकृष्ण शोभा पाने लगे। ताल, वेणु और मृदंगों की ध्वनि के साथ मधुर कण्ठवाली सखियों के गीत और उनके नूपूर-कांची आदि आभूषणों की मधुर झनकार का मिला हुआ महान शब्द वहाँ सब ओर गूँज उठा। राजन् ! करोड़ों कामदेवों के लावण्य को लज्ज्ति करने वाले, वनमालाधारी, कुण्डल मण्डित एवं किरीट, वलय और भुजबंदों से अलंकृत पीताम्बरधारी श्यामसुन्दर रासेश्वर रास में स्वयं रासेश्वरी के साथ गीत गाने लगे। विदेहराज ! जैसे तारागणों घिरों हुआ चन्द्रमा शोभा पाता है, उसी प्रकार रासेश्वरी श्रीकृष्ण उन सुन्दरियों के साथ सुशिाभित हो रहे थे ! इस प्रकार वह महनन्दमयी सम्पूर्ण शुभ निशा रासमण्डल में एक क्षण के समान व्यतीत हो गयी। श्रीरास मण्डल की शोभा देख रुक्मिणी आदि समस्त पटरानियां मरमानन्द को प्राप्त हुई। उन सबका मनोरथ आदि रानियों ने प्रेमपरवश होकर साक्षात होकर साक्षात परिपूर्णतम पुरुषोतम श्रीकृष्ण से कहा।
रानियाँ बोलीं- प्रभो ! मनोहर रास-रंग में आपकी रूप-माधुरी देखकर हमारा मन उसी प्रकार आत्मानन्दन में निमग्न हो गया, जैसे ज्ञानी मुनि ब्रह्मानन्दन में डूब जाते हैं। ऐसा रास दूसरा न हुआ होगा न होगा। माधव ! यहाँ गोपांगनाओं के सौ यूथ विद्यमान हैं। सखियों सहित हम सोलह हजार आपकी पत्नियों भी इसमें सम्मिलित रही हैं। करोड़ों सखियों के साथ आठों पटरानियों भी यहाँ उपस्थित हैं। माधवेश्वर ! ऐसा रास तो वृन्दावन में नहीं हुआ।
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार अभिमान प्रकट करने वाली रानियों की बात सुनकर श्यामसुन्दर श्रीहरि हँसने लगे और बोले– ‘यहाँ का रास सर्वोत्कृष्ट है या वृन्दावन का, यह तुम श्रीराधा से ही पूछो’। तब सत्यभामा आदि सब रानियों ने मनोहारिणी श्रीराधा से इसके विषय में पूछा। श्रीराधा मन-ही-मन कुछ हँसती हुई यह उत्तम बात बोलीं ।
श्रीराधा ने कहा- सखियों ! बहुत-सी सुन्दरियों से भरा हुआ यहाँ का रास भी बहुत अच्छा रहा है; परंतु पहले-पहल वृन्दावन में जो रास हुआ था, उसके समान यह कदापि नहीं था। उसके समान यह कदापि नहीं था। यहाँ दिव्य वृक्षों और लताओं से व्याप्त, प्रेम के भार से झुकी हुई लता वल्लरियों से विलसित और मधुमत मधुपों से सुशोभित वृन्दावन कहाँ है? पुष्प-समूहों की बहाती हुई फूलों के छाप से अलंकृत श्यामपटक की भाँति शोभा पाने वाली हंसों और पद्मवनों से व्याप्त यमुना नदी यहाँ कहाँ उपलब्ध है ? फूलों के भार से झुकी हुई माधवी लताएं यहाँ दिखायी देती हैं ? प्रेमपरवश पक्षी कहाँ मधुर स्वरों में गान कर रहे हैं ? चंचल भ्रमर-पुंजों से युक्त कुंजों और दिव्य-मन्दिरों से मण्डित निकुंज यहाँ कहाँ सुलभ हैं ? कमलों के पराग को लेकर शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु यहाँ कहाँ बह रही है ! ऊँचे-ऊँचे मनेाहर शिखरों से सुशोभित, सर्वत्र फल-फूलों से सम्पन्न तथा सुन्दर कन्दराओं से अलंकृत महाकाय गजराज की भाँति शोभा पाने वाले गिरिराज गोर्वधन यहाँ कहाँ दृष्टि गोचर होता है ?
जहाँ वायु ने कोमल बालू का संचय कर रखा है, यमुना के उस रमणी पुलिन पर वंशी और बेंत की छड़ी रखा है, यमुना के उस रमणीय पुलिन पर वंशी धारण किये, मल्ल अथवा नटवर के वेष में विराजित श्यामसुन्दर की झांकी यहाँ कहाँ मिल रही है ? इस स्थान पर श्रीकृष्ण के लिये वनमाला से विभूषित श्रृंगार कहाँ उपलब्ध है ? श्यामसुन्दर की काली, घुँघराली और सुगन्धयुक्त अलकावलियों का दर्शन यहाँ कहाँ होता है ? श्रीकृष्ण के स्निग्ध कपोलों से मनोहर मुख पर दोनों ओर कुण्डलों का हिलाना-डुलना कहाँ दीखता है ? उनके मुख पर पत्र-रचना कहाँ की गयी है ? कहाँ सुगन्ध के लोभ से भ्रमरावलियां टूटी पड़ती हैं ? कहाँ वह प्रेमपूर्ण निरीक्षण, स्वर्श और हर्षोलास यहाँ सुलभ हुआ ? कामदेव के तीखे बाणों को तिरस्कृत करने वाले नेत्रकोणों से निहारने पर जो कटाक्षपात जनित प्रकट होता है, वह यहाँ कहाँ प्राप्त हुआ है ? दोनों हाथों से एक-दूसरों को पकड़कर खीचना, हाथ से हाथ छुड़ाना, निकुंज में छिपना, सामने होने पर भी दिखायी न देना आदि लीलाएं यहाँ कहाँ दिखायी देती है ? यहाँ चीर उठा लेना अथवा वंशी और बेंत को चुरा लेना कहाँ खींचकर हृदय से लगाना, बार-बार एक दूसरे को पकड़ना, श्यामसुन्दर की बांहो पर चन्दन का लेप लगाना आदि बातें यहाँ कहाँ सम्भव हुई है ? जहां-जहाँ की जो लीला है, वहीं-वहीं वह शोभा पाती है। जहाँ वृन्दावन नहीं है, वहाँ मेरे मन को सुख नहीं मिल सकता।
नारदजी कहते हैं- श्रीराधा की यह बात सुनकर सारी पटरानियों ने अपने रास-सम्बन्धी अभिमान को त्याग दिया। वे हर्षित और विस्मित हो गयीं। इस प्रकार राधिकावल्लभ श्रीकृष्ण सिद्धाश्रम रासक्रीड़ा सम्पन्न करके, समस्त गोपियों को साथ ले, श्रीराधा और अपनी रानियों–सहित द्वारका में प्रविष्ट हुए। उन्होंने श्रीराधा के लिये बहुत-से सुन्दर मन्दिर बनवाये। उन समस्त व्रजांगनाओं के रहने के लिये भी सुखपूर्वक व्यवस्था की।
नरेश्वर ! इस प्रकार मैंने सिद्धाश्रम की कथा तुम्हें सुनायी है, जो समस्त पापों को हर लेने वाली, पुण्यमयी तथा सबको मोक्ष देने वाली है।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में सिद्धाश्रम माहात्म्य के प्रसंग में ‘रासोत्सव’ नामक अठारहवां अध्याय पूरा हुआ।
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