06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 16 || सिद्धाश्रम की महिमा के प्रसंग में श्रीराधा और गोपांगनाओं के साथ श्रीकृष्ण और उनकी सोलह हजार रानियों का समागम
06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 16 || सिद्धाश्रम की महिमा के प्रसंग में श्रीराधा और गोपांगनाओं के साथ श्रीकृष्ण और उनकी सोलह हजार रानियों का समागम
नारदजी कहते हैं- महामते विदेहराज ! अब सिद्धाश्रम का माहात्म्य सुनो, जिसका स्मरण करने मात्र से समस्त पाप छूट जाते हैं। जिसके स्पर्शमात्र से साक्षात श्रीहरि से कभी वियोग नहीं होता, उसी तीर्थ को पुराणवेता पुरुष ‘सद्धाश्रम’ कहते हैं। जिसके दर्शन से सालोक्य, स्पर्श से सामीप्य, जिसमें स्नान करने से सारुप्य और जहाँ निवास करन से सायुज्य मोक्ष की प्राप्ति है, उसे ही ‘सिद्धाश्रम’ जानो।
एक समय चद्ररानना सखी के मुख से सिद्धाश्रम तीर्थ का महात्मय सुनकर श्रीकृष्ण के वियोग से व्याकुल हुई श्रीराधा ने उसमें नहाने का विचार किया। वैशाख मास में सूर्य ग्रहण के पर्व पर सिद्धाश्रम तीर्थ की यात्रा के लिये कदल-वन से उठकर श्रीराधा ने गोपांगनाओं के सौ यूथ और समस्त गोपगणों के साथ वहाँ जाने का मन-ही-मन निश्चय किया। श्रीदामा के शाप के कारण होने वाले श्रीकृष्ण वियोग के सौ वर्ष बीत चुके थे। श्रीराधिका शिविका में आरुढ़ हुई। उन पर छत्र-चंवर डुलाये जाने लगे। इस प्रकार वे सती श्रीराधा आनर्त देश के महातीर्थ सिद्धाश्रम को गयीं।
नरेश्वर ! वहीं साक्षात भगवान श्रीकृष्ण अपनी सोलह हजार रानियों के साथ यादवगणों से घिरे हुए तीर्थयात्रा के लिये आये। करोड़ों बलिष्ठ गोपाल हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिये श्रीराधिका की आज्ञा के अनुसार सिद्धाश्रम की चारों ओर से रक्षा कर रहे थे। गोपियों के सौ यूथ भी बडे़ शक्तिशाली थे। वे तथा अन्य गोपांगनाएं हाथों में बेंत की छड़ी लिये सिद्धाश्रम में विधिपूर्वक स्नान करती हुई श्रीराधा की सेवा में तत्पर थीं। द्वारकावासी स्नान की इच्छा से वहाँ आकर खडे़ थे। शस्त्र और वेत्र धारण करने वाले गोपों ने उन्हें मार-मारकर दूर हटा दिया। इसी समय भगवान श्रीकृष्ण की रानियों ने सिद्धाश्रम में प्रवेश किया।
उन रानियों भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- ‘देवकीनन्दन ! आप सर्वज्ञ हैं, अत: हमें बताइये, यह कौन स्त्री स्नान कर रही है, जिसका गौरव मानकर समस्त यादव-पुंगव यहाँ भयभीत से खडे़ हैं। अहो ! यह किसकी प्रिया है, इसका क्या नाम है और यह कहाँ की रहने वाली हैं
श्रीभगवान बोले- ये साक्षात वृषभानु की पुत्री कीर्तिनन्दिनी श्रीराधा हैं, जो सम्पूर्ण वज्र की अधीश्वरी, गोपीगणों के साथ सिद्धाश्रम में स्नान करने के लिये आयी हैं। इन्हीं के गौरव से ये यादव त्रस्त होकर खडे़ हैं। इन्हीं का यह अद्भुत वैभव है।
श्रीकृष्ण की यह बात सुनकार अपने अनुपम रूप और यौवन पर गर्व करने वाली भामिनी सत्यभामा अपनी सौतों के बीच धीरे-धीरे बोलीं- ‘क्या राधा ही रूपवती हैं, मैं रूपवती नहीं हूँ ? पूर्वकाल में बहुत से लोगों ने मेरी याचना की थी। मैं अपने रूप और औदार्य-गुण से सदा ही पूजित रही हूँ। सखियो ! मेरे रूप के ही कारण शतधन्वा की मृत्यु हुई, अक्रूर और कृतवर्मा को यदुपुरी पलायन करना पड़ा। जो स्यमन्तकमणि प्रतिदिन अपने आप आठ भार सुवर्ण की सृष्टि करती है, जिसके रहने से दुर्भिक्ष, महामारी आदि कष्ट स्वत: भाग जाते हैं तथा जिसकी पूजा के स्थान में सर्व, आधि-व्याधि, अमंगल और मायावी लोग नहीं रह पाते, मेरे पिता ने वही स्यमन्तकमणि मेरे दहेज में दी थी। उस मणि से मेरे घर में भी सम्पूर्ण अद्भुत वैभव प्रकट हो गया है। मैं अपने महान प्रेम से श्रीकृष्ण को वश में रखती हूँ, उनके साथ गरुड़ पर बैठकर यात्रा करती हूँ। प्राग्ज्योतिष पुर में भौमासुर के साथ जो महान युद्ध हुआ था, उसे मैंने अपनी आंखों से देखा है। मेरी ही कृपा से तुम सब प्राग्ज्योतिषपुर वे द्वारकापुरी में आयीं और सब-की-सब श्रीकृष्ण की पत्नी हुई, इसमें संशय नहीं है। मेरी ही बात का आदर करके इन श्रीकृष्ण ने इन्द्र को छत्र दिया।
मेरा ही प्रिय करने ही इच्छा से इन्होंने देवमाता अदिति को उनके दोनों कुण्डल अर्पित किये। ऐरावत के वंश में उत्पन्न बडे-बडे़ गजराज, जो भौमासुर की सम्पत्ति थे, मेरी ही इच्छा से महात्मा श्रीकृष्ण द्वारा द्वारका में लाये गये। मेरे ही कारण श्रीहरि देवराज इन्द्र से भी महान वैर ठान लिया। मेरे द्वार पर वृक्षराज पारिजात सदा सुशोभित होता है। मैंने अपने पातिव्रत धर्म से ही श्रीकृष्ण को वश में कर रखा है। मैंने समस्त सामग्रियों के साथ नारदजी के हाथ श्रीकृष्ण का दान कर दिया था। मेरे समान गौरव और वैभव किसी भी स्त्री को नहीं प्राप्त हो सकता। रूप और उदारता भी मेरे तुल्य किसी भी स्त्री में नहीं है। फिर राधा की तो बात ही क्या है ? जिनके रूप पर चेदिराज शिशुपाल आदि ने रणभूमि में श्रीकृष्ण के साथ युद्ध छेड़ दिया था, उन रुक्मिणी का रूप-सौन्दर्य क्या किसी से कम है ? सुन्दर भौंहों वाली बहिन रुक्मिणी ! तुम क्यों कर रूपवती नहीं हो ? सखियें ! राधा एक गोप की कन्या है और तुम सब राजकुमारियां; सभी धन्य और मान्य हो तथा मानवती स्त्रियों में श्रेष्ठ हो’।
मिथिलेश्वर ! सत्यभामा के इस प्रकार कहने पर रुक्मिणी आदि सभी श्रेष्ठ रानियां मानवती हो गयी। उन सबको अपने कुल, कौशल, शील, धन, रूप और यौवन पर गर्व था। वे आठों पटरानियां सबको मान देने वाले श्रीकृष्ण से बोलीं ।
रानियां बोलीं- प्रभो ! आपके मुंह से पहले हमने राधा के रूप की बड़ी बढाई सुनी है, जिनके प्रति तुम सदा अनुरक्त रहते हो और वे भी सदा तुम्हारे अनुराग के रग में रंगी रहती है। आज हम उन्हीं तुम्हारी व्रजवासिनी प्रियतमा राधा को देखना चाहती हैं, जो सदा तुम्हारे वियोग से खिन्न रहती हैं और यहाँ स्नान के लिये आयी हुई हैं।
नारदजी कहते हैं- राजन् ! तब ‘तथास्तु’ कहकर पटरानियों से घिरे हुए श्रीकृष्ण सोलह हजार रानियों के साथ दर्शन करने के लिये गये। सोने के रमणीय शिविरमें- जो ध्वजा पताकाओं से सुशोभित था और सदा जिस सुन्दर शिविर में चन्द्रमण्डल की शोभा को तिरस्कृत करने वाला चंदोवा तना था; मोतियों की झालरों से युक्त परदा लगा था और जहाँ स्वच्छ वस्त्रों का सुन्दर बिछौना बिछा था; मालती के मकरन्द एवं इत्र आदि की सुगन्ध जहाँ सब ओर छा रही थी और उसी के कारण भ्रमरावलियां जहाँ मधुर गुंजन कर रही थीं– पटरानी श्रीराधा, जिनका चित श्रीकृष्ण ने चुरा लिया था, विराजमान थीं और सिखियां हंस के समान श्वेत एवं दिव्य व्यंजन डुलाकर उनकी सेवा करती थीं। कोई सखी उनके ऊपर छत्र ताने हुई थीं, कुछ सखियां झूले की डोर पकड़कर झुला रही थीं, कुछ इधर-उधर आती जाती दिखायी देती थीं। श्रीराधा के कोने में बालरवि के समान कान्तिमान कुण्डल झलमला रहे थे। विद्युत के समान उद्दीप्त माला धारण करने के कारण उनकी मनोहरता और भी बढ़ गयी थी। उनके श्रीअंगों से कोटि चन्द्रमाओं के समान प्रकाश फैल रहा था। वे तन्वंगी तथा कोमलांगी थीं। वे अपने पैरों की सुन्दर अंगुलियों के अग्रभाग से पुष्पाच्छादित मनोहर भूमि पर अत्यन्त कोमल चरणारविन्द धीरे-धीरे रख रही थीं।
महाराज ! उन श्रीराधा को दूर से ही देखकर श्रीकृष्ण की वे सहस्त्र रानियां उनके रूप से अत्यन्त मोहित होकर मूर्च्छित हो गयीं। उनके तेज से इनकी कान्ति उसी तरह विलुप्त हो गयी, जैसे सूर्योदय होने पर तारिकाएं। इन्हें जो रूप का अभिमान था वह जाता रहा ये सब रानियां परस्पर इस प्रकार कहने लगीं- अहो ! ऐसा अद्भुत रूप तो तीनो लोकों में कहीं भी नहीं है। हमने इनके अद्वितीय मनोहर रूप को जैसा सुना था, वैसा ही देखा। ‘इस प्रकार आपस में बात करती हुई वे रानियां श्रीकृष्ण को आगे करके श्रीराधिका के पास जा पहुँचीं। गोपांगनाओं तथा राजकुमारियों के नेत्र आपस में मिलें।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में द्वारका खण्ड के अन्तर्गत सिद्धाश्रम की महिमा के प्रसंग में श्रीराधा और गोपांगनाओं के साथ श्रीकृष्ण और उनकी सोलह हजार रानियों का समागम’ नामक सोलहवां अध्याय पूरा हुआ।
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