07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 16 || मिथिला के राजा धृति द्वारा ब्रह्मचारी के रूप में पधारे हुए प्रद्युम्न का पूजन, उन दोनों का शुभ संवाद; प्रद्युम्न का राजा को प्रत्‍यक्ष दर्शन दे, उनसे पूजित हो शिविर में जाना

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 16 || मिथिला के राजा धृति द्वारा ब्रह्मचारी के रूप में पधारे हुए प्रद्युम्न का पूजन, उन दोनों का शुभ संवाद; प्रद्युम्न का राजा को प्रत्‍यक्ष दर्शन दे, उनसे पूजित हो शिविर में जाना

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन! वहाँ से विजय दुन्‍दुभि बजवाते हुए यदुनन्‍दन प्रद्युम्न तुम्‍हारे सुख सम्‍पन्‍न मिथिला देश में आये। कलश-शाभित अत्‍यन्‍त ऊँचे स्‍वर्णमय सौधशिखरों से युक्‍त मिथिलापुरी को दूर से देखकर प्रद्युम्न ने उद्धव से पूछा।

प्रद्युम्न बोले- मन्त्रिवर ! इस समय वह किसकी राजधानी मेरी दृष्टि में आ रही है, जो बहुसंख्‍यक महलों से भोगवती पुरी की भाँति शोभा पाती है ? ।

उद्धव ने कहा- मानद ! यह राजा जनक की पुरी मिथिला है। इस समय यहाँ मिथलानरेश महाभागवत विद्वान धृति रहते है। वे समस्‍त धर्मात्‍माओं में श्रेष्‍ठ हैं।

श्रीकृष्‍ण उनके इष्‍टदेव हैं और वे स्‍वयं भी श्री‍हरि को बहुत प्रिय हैं। उनके पुत्र का नाम बहुलाश्‍व है, जो बचपन से ही भगवान ही भक्ति करने वाला है। उसे दर्शन देने के लिये साक्षात भगवान श्रीकृष्‍ण यहाँ पधारेंगे। राजकुमार बहुलाश्‍व तथा ब्राह्मण श्रुतदेव को द्वारका में भगवान श्री कृष्ण बहुत याद किया करते हैं। प्रभो ! इन्‍हें देवेन्‍द्र भी नहीं जीत सकते, फिर मनुष्‍यों की तो बात ही क्‍या; क्‍योंकि धृति ने अपनी परा भक्‍ति से श्रीकृष्‍ण को वश में कर लिया है।

श्री नारद जी कहते हैं- राजन! यह सुनकर भगवान श्रीकृष्‍णकुमार प्रद्युम्न उद्धवजी को अपना शिष्‍य बनाकर उनके साथ राजा धृति का दर्शन करने के परीक्षा करने के लिये ही मि‍थिलापुरी को देखा। वहाँ के सभी वीर कवच और शस्‍त्र धारण करके माला ओर तिलक से सुशोभित थे। वे सब-के-सब माला द्वारा श्री कृष्ण नामक जप करते थे। मिथिला के लोगों के द्वार-द्वार पर श्री हरि के नाम लिखे थे और श्रीकृष्‍ण के सुन्‍दर-सुन्‍दर चित्र अंकित थे। वहाँ घरों की प्रत्‍येक दीवार पर गदा, पद्म, दसों अवतार के चित्र और शंक, चक्र अंकित थे। घर-घर के आंगन में तुलसी के मन्दिर दिखायी देते थे ।इस तरह मिथला के महलों को देखते हुए उन्‍होंने वहाँ के लोगों पर भी दृष्टिपात किया, जो सब-के-सब माला तिलकधारी भगवदभक्‍त थे। उन्‍होंने केसर अथवा कुमकुम के बारह-बारह तिलक लगा रखे थे।

वहाँ के ब्राह्मण गोपीचन्‍द की मुद्राओं से चर्चित, शान्‍तस्‍वरूप तथा ऊर्ध्‍वपुण्‍डाधारी थे। उनके अंगों पर हरिमन्दिर के चित्र अंकित थे। कितने ही लोगों ने मस्‍तक पर धनुष और बाण के चित्र तथा हृदय में नन्‍दक नामक खड्ग, मुसल और हल के चिन्‍ह धारण कर रखे थे ।

राजन् ! तदनन्‍तर प्रद्युम्न ने देखा- वहाँ की गली-गली में कुछ मुनष्‍य भागवत सुन रहे हैं। दूसरे लोग हरिवंश और महाभारत नामक इतिहास श्रवण कर रहे हैं। कुछ लोग सनत्‍कुमार संहिता, पराशर संहिता, गर्ग संहिता, पौलस्‍त्‍य संहिता और धर्म संहिता आदि का पाठ कर रहे हैं। ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्‍णुपुराण, शिवपुराण, लिंगपुराण, गरुड़पुराण, नारदीयपुराण, भगवतपुराण, अग्निपुराण, वामनपुराण, नारदीयपुराण, भागवतपुराण, अग्निपुराण, स्‍कन्‍दपुराण, भविष्‍णपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, वामनपुराण, मार्कण्‍डेयपुराण, वाराहपुराण, मत्‍स्‍यपुण, कूर्म पुराण तथा ब्रह्मण्‍डपुराण- इन सब पुराणों को गली-गली में, घर-घर में वहाँ के सब लोग सुनते थे। कुछ लोग श्रीरामचरणामृत से पूर्ण वाल्मीकि के महाकाव्‍य रामायण का पाठ करते थे। कुछ लोग स्‍मृतियों के और कुछ ब्राह्मण वेदत्रयी के स्‍वाध्‍याय में लगे थे। कुछ लोग मंगलधाम वैष्‍णव यज्ञ का अनुष्‍ठान करते थे। कितने ही मनुष्‍य राधाकृष्‍ण, कृष्‍ण-कृष्‍ण आदि नामों का बारंबार कीर्तन करते थे। कुछा लोग हरिकीर्तन में तत्‍पर रहकर नाचते और गाते थे। वहाँ के प्रत्‍येक मन्दिर में मृदंग ताल, झाँझ और वीणा आदि मनोहर वाद्यों के साथ लोगों द्वारा किया जाने वाला हरिकीर्तन सुनायी पड़ता था। राजन्‍ ! मिथिला के घर-घर में वहाँ के निवासी प्रेमलक्षणा नवधा‍भक्‍ति करते थे।

इस प्रकार नगरी का दर्शन करके भगवान प्रद्युम्न हरि ने राजद्वार पर पहुँचकर शीघ्र ही मैथिलेश की सभा में वेदव्यास, शुकमुनि, याज्ञवल्‍क्‍य,  वशिष्ठ,  गौतम, मैं और बृहस्‍पति बैठे थे। दूसरे भी धर्म के वक्‍ता तथा हरिनिष्‍ठ मुनि वहाँ मूर्तिमानवेद की भाँति इधर-उधर बैठे दिखायी देते थे। नरेश्‍वर मैथिलेन्‍द्र धृति वहाँ भक्तिभाव नतमस्‍तक होकर बलदेवजी की चरणपादुका की विधिवत पूजा कर रहे थे। वे श्रीकृष्‍ण और बलदेव के मुक्तिदायक नामों का जप भी करते जाते थे। शिष्‍य सहित ब्रह्मचारी को आया देख राजा ने उठकर नमस्‍कार किया। उनकी पाद्य आदि उपचारों से विधिवत पूजा करके मैथिलेश्‍वर राजा धृति दोनों हाथ जोड़कर उनके आगे खडे़ हो गये ।

जनक ने कहा- भगवान ! आपके पदार्पण से आज मेरा जन्‍म सफल हो गया, मेरा राजभवन शुद्ध एवं परमोज्‍ज्‍वल हो गया, देवता, ऋषि और पितर सब संतुष्‍ट हो गये। भगवान ! आप जैसे निर्भ्रान्‍त और समदर्शी साधु भूतल पर दीनजनों का कल्‍याण करने के लिये ही विचरते हैं ।

ब्रह्मचारी बोले- राजसिंह ! आप धन्‍य हैं, आपकी यह मिथलापुरी धन्‍य है तथा विष्‍णु–भक्ति से भरपूर आपकी सारी प्रजा भी धन्‍य है।

जनक ने कहा- प्रभो ! न तो यह नगरी मेरी है, न प्रजा मेरी है और न गृह तथा धन-धान्‍य मेरे हैं। स्‍त्री, पुत्र और पौत्रादि मेरे पास जो कुछ है, वह सब भगवान श्री कृष्ण स्‍वयं असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों के अधिपति होकर गोलोक धाम में विराजते है। वे पुरुषोत्तम एक होकर भी स्‍वयं ही वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध इन चार व्‍यूहों के रूप में भूतल पर प्रकट हुए हैं। महामुने ब्राह्मन् ! शरीर, मन, वाणी, बुद्धि अथवा समस्‍त इन्द्रियों द्वारा मैंने जो भी पुण्‍यकर्म किया है, वह सब भगवान श्रीकृष्‍ण को समर्पित है।

ब्रह्मचारी ने कहा- महाभाग, विष्‍णुभक्‍त शिरोमणे, विदेहराज ! तुम्‍हारी भक्ति से संतुष्‍ट हो भगवान श्रीकृष्‍ण तुम्‍हें सायुज्‍य मोक्ष प्रदान करेंगे ।

जनक बोले- ब्रह्मन ! मैं आप- जैसे श्रीकृष्‍णभक्‍त महात्‍माओं का दास हूँ। मैंने अपने मन में किसी हेतु अथवा कामना को स्‍थान नहीं दिया है अत: मैं एकत्‍व या सायुज्‍यरूपा मुक्ति नहीं पाना चाहता ।

ब्रह्मचारी ने कहा- राजन ! तुम हेतु रहित होकर अहैतु की भक्ति करते हो, अत: निर्गुण भक्ति-भाव होकर कारण तुम प्रेम के लक्षणों से सम्‍पन्न हो। साक्षात भगवान प्रद्युम्न दिग्विजय के लिये निकले हैं। वे आपके घर पर क्‍यों नहीं आये- इस बात को लेकर मेरे मन में महान संदेह हो गया है।

जनक बोले- भगवान प्रद्युम्न साक्षात अन्‍तर्यामी स्‍वयं श्रीहरि है। वे सदा, सर्वज्ञ और सर्वव्‍यापी हैं। फिर बताइये तो सही, क्‍या वे यहाँ नहीं है ? ।

ब्रह्मचारी ने कहा- यदि ज्ञानदृष्टि से भी तुम श्रीकृष्‍ण कुमार प्रद्युम्न को यहाँ निरन्‍तर स्थित मानते हो तो दिव्‍य दृष्टि वाले प्रह्लाद की भाँति तुम उनका यहाँ प्रत्‍यक्ष दर्शन कराओ ।

श्रीनारदजी कहते हैं- बहुलाश्‍व ! यह सुनकर महाभागवत राजा धृति ने अपने मुख पर अश्रुधारा बहाते हुए गद्गद वाणी में कहा ।

जनक बोले- यदि मेरे द्वारा भगवान श्रीहरि की इस भूतल पर अहैतु की भक्ति की गयी है तो श्रीहरि के पुत्र प्रद्युम्न मरे सामने प्रकट हो जायँ। यदि मुझ पर उनकी कृपा हो ओर यदि सर्वत्र मेरी श्रीकृष्‍णबुद्धि हो तो मेरा यह मनोरथ पूर्ण हो जाय ।

श्रीनारदजी कहते हैं- बहुलाश्‍व ! उनके इतना कहते ही श्रीकृष्‍णकुमार प्रद्युम्न तत्‍काल ब्रह्मचारी का रूप छोड़कर सबके देखते-देखते अपने साक्षात स्‍वरूप से प्रकट हो गये। हरिभक्तिनिष्‍ठ शिष्‍य उद्धव भी गद्गद हो गये। मेघों के समान श्‍याम कांति, प्रफुल्‍ल कमलदल के समान विशाल नेत्र, लंबी-लंबी भुजाएं, जगत के लोगों का मन हर लेने वाला रूप सबके सामने प्रकट हो गया। उनके श्री अंगों पर पीताम्‍बर शोभा दे घुँघराली अलकावलियों से अलंकृत था। शिशिर-ऋतु के बालरवि के समान कान्तिमान किरीट, दिव्‍य कुण्‍डल, करधनी और बाजूबंद आदि से उका दिव्‍य विग्रह उद्भासित हो रहा था। श्रीकृष्‍णकुमार प्रद्युम्न को इस प्रकार देखकर राजा धृति ने उनको हाथ जोड़कर साष्‍टांग प्रणाम किया ।

जनक बोले- भूमन ! मेरा सौभाग्‍य महान एवं अत्‍यंत धन्‍य है। अहो ! आज आपने मुझे अपने स्‍वरूप का साक्षात दर्शन कराया। आज मेरी महिमा कयाधू कुमार प्रहलाद के समान बढ़ गयी। आज मैं अपने कुल सहित कृतार्थ हो गया ।

श्रीप्रद्युम्न ने कहा- नृपश्रेष्‍ठ ! तुम धन्‍य हो, मेरे प्रभाव को जानने वाले भक्‍त हो। मैं इस समय तुम्‍हारे भक्तिभाव की परीक्षा के लिये ही यहाँ आया था। मैथिलेश्‍वर ! आज ही तुम्‍हें मेरा सारुप्‍य प्राप्‍त हो जाय और इस लोक में तुम्‍हारे बल, आयु और कीर्ति का अत्‍यन्‍त विस्‍तार हो ।

नारदजी कहते हैं- राजन ! तुम्‍हारे पिता धृति से पूजित हो भक्तवत्‍सल भगवान प्रद्युम्न वहाँ आये हुए संतों के सामने ही अपने शिविर की ओर चले गये ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्‍वजित खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘जनक का उपाख्‍यान’ नामक सोलहवां अध्‍याय पूरा हुआ ।

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