07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 18 || गया, गोमती, सरयू एवं गंगा के तटवर्ती प्रदेश, काशी, प्रयाग एवं विन्ध्यदेश में यादव-सेना की यात्रा; श्रीकृष्ण के अठारह महारथी पुत्रों का हस्तलाघव तथा विवाह ;मथुरा, शूरसेन जनपदों एवं नन्द–गोकुल में प्रद्युम्न आदि का समादर
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 18 || गया, गोमती, सरयू एवं गंगा के तटवर्ती प्रदेश, काशी, प्रयाग एवं विन्ध्यदेश में यादव-सेना की यात्रा; श्रीकृष्ण के अठारह महारथी पुत्रों का हस्तलाघव तथा विवाह ;मथुरा, शूरसेन जनपदों एवं नन्द–गोकुल में प्रद्युम्न आदि का समादर
श्रीनारदजी कहते है- राजन्! तदनन्तर श्री कृष्ण कुमार प्रद्युम्न सैनिकों सहित गया में जाकर फल्गुनदी में स्नान किया। फिर अन्य देशों को जीतने के लिये वहाँ से आगे को प्रस्थान किया। जरासंध को पराजित हुआ सुनकर उस समय अन्य राजा आतंकवश भयार्त हो प्रद्युम्न की शरण में आये और उन सबने उन्हें भेंट दी ।
गोमती तथा पुण्यसलिला सरयू के तट पर होते हुए प्रद्युम्नजी गंगा के किनारे काशीपुरी में आये। वहाँ पार्ष्णिग्रह काशिराज शिकार खेलने के लिये गये थे, जो वहीं पकड़ लिये गये। काशिराज ने भी यह सुनकर कि प्रद्युम्न की सेना विशाल है, उन्हें भेंट अर्पित की ।
राजन् ! तत्पश्चात बलवान प्रद्युम्न अपने सैनिकों के साथ कोसल जनपद में गये और अयोध्या के निकट नन्दिग्राम में उन्होंने अपनी सेना की छावनी डाल दी।
कोसलराज नग्न जितने, जो तत्त्वज्ञानी थे, बहुत से घोड़े, हाथी, रथ और महान् धन देकर शम्बरारि प्रद्युम्न का पूजन किया। उत्तर दिशा के स्वामी दीपतम, नेपाल के राजा गज तथा विशाला नगरी के स्वामी बर्हिण इन सबने उन्हें भेंट दी। नैमिषारण्य के स्वामी बडे़ भगवद् भक्त ओर श्रीकृष्ण के प्रभाव को जानने वाले थे। उन्होंने हाथ जोड़कर प्रद्युम्न को बलि अर्पित की। इसके बाद श्रीकृष्णकुमार प्रयाग गये और वहाँ पापनाशिनी त्रिवेणी में स्नान करके उन्होंने महान दान किया; क्योंकि वे तीर्थराज के प्रभाव को जानते थे। बीस हजार हाथी, दस लाख घोड़े, चार लाख रथ, सोने की माला तथा सुनहरे वस्त्रों से विभूषित दस अरब गौएं दस भार स्वर्ण, एक लाख मोती, दो लाख वस्त्र तथा दो लाख कश्मीरी शाल एवं नये कम्बल हरिप्रिय तीर्थराज में प्रद्युम्न ने ब्राह्मणों को दिये ।
मिथिलेश्वर ! कारुष देश का राजा पौण्ड्रक भगवान श्री कृष्ण का शत्रु था, तथापि उसने भी शंकित होन के कारण श्रीकृष्णकुमार का पूजन किया। पंचाल और कान्यकुब्ज देश में प्रद्युम्न के आगमन की बात सुनकर वहाँ के समस्त नरेश भयभीत हो गये। सबने अपने-अपने दुर्ग के दरवाजे बंद कर लिये। सब लोग यादवराज से भयातुर हो दुर्ग का आश्रय लेकर रहने ले। कितने ही लोग भाग चले। विन्ध्यदेश के अधिपति महाबली राजा दीर्घबाहु उत्तम संधि करने के लिये शम्बरारि प्रद्युम्न की सेना में आये ।
दीर्घबाहु बोले- आप सब यादवेन्द्र दिग्विजय के लिये आये हैं; अत: मेरा मनोरथ पूर्ण कीजिये। इससे मेरे चित्त में संतोष होगा। जल से भरे हुए कांच के बर्तन को बाण से बेधा जाय किंतु एक बूँद भी पानी न गिरे और बाण उसमें खड़ा रहे, बर्तन फूटे नहीं, ऐसी जिसके हाथ में स्फूर्ति हो, वह अपने इस हस्तलाघव का परिचय दे। जो मेरी इस प्रतिज्ञा को पूर्ण करेंगे, उन्हें मैं अपनी कन्याएं ब्याह दूँगा। आप समस्त यादवेन्द्रगण धनुर्वेद में कुशल हैं। मैंने भी नारदजी के मुख से पहले सुना था कि यादव लोग बडे़ बलवान हैं ।
नारदजी कहते हैं- राजन् ! राजा दीर्घबाहु की बात सुनकर सब लोग विस्मित हो गये। उनमें से धनुर्धरों में श्रेष्ठ प्रद्युम्नजी ने भरी सभा में बिन्दुदेश के नरेश को आश्वासन देते हुए कहा- ‘तथास्तु ‘प्रद्युम्नजी ने पृथ्वी पर दो जगह बड़ा-सा बांस गाड़ दिया और उन दोनों के बीच में एक रस्सी तान दी। फिर उस रस्सी में में समस्त सत्पुरुषों के देखते-देखते जल से भरा एक कांच का घड़ा लटका दिया। फिर उन श्रीकृष्णकुमार ने धनुष उठाया और उसे भलीभाँति देखकर उसकी डोरी पर बाण का संधान किया। वह बाण छूटा और कांच के घडे़ मे धँसा हुआ वह बाण बादल में प्रविष्ट सूर्य की किरण के समान सुशोभित होता था। वह एक अद्भुत सा दृश्य था। त्रिकुश के फल की भाँति उस पात्र के न तो टुकड़े हुए, न वह अपने स्थान से विचलित हुआ; न उसमें कम्पन हुआ और न उससे एक बूंद पानी ही गिरा। विदेहराज ! भगवान प्रद्युम्न ने फिर दूसरे बाण का संधान किया। वह भी पहले बाण का स्थान छोड़कर उस घडे़ में उसी की भाँति स्थित हो गया।
तदनन्तर साम्ब ने भी धनुष लेकर पांच बाण छोड़ वे भी कांच-पात्र का भेदन करके उसमें आधे निकले हुए स्थित हो गये। तदनन्तर सात्यकि ने भी धनुष लेकर एक ही बाण मारा, किंतु सबके देखते-देखते वह कांच का पात्र चूर-चूर हो गया। यह देख समस्त यादव तथा दूसरे-दूसरे सैनिक जोर-जोर से हँसने लगे और बोल- ‘बस-बस, तुम्हीं इस भूतल पर कार्तवीर्य अर्जुन के समान महान बाणधारी हो; तुम्हारे सामने अर्जुन, भरत तथा श्रीरामचन्द्रजी भी मात हैं। अथवा तुम त्रिपुरहन्ता रुद्र हो।
द्रोण, भीष्म, कर्ण तथा परशुरामजी भी तुम से हार मान लेंगे ।तदनन्तर दूसरा पात्र लटकाकर धनुर्धारियों में श्रेष्ठ अनिरुद्ध ने उसके नीचे जाकर उसे गौरव से देखकर हल के हाथ से बाण मारा।
वह बाण भी उस पात्र का भेदन करके आधा निकला हुआ उसमें स्थित हो गया। उस पात्र से पांच हाथ ऊपर आकाश में एक पत्थर लटकाकर दीप्तिमान ने धनुष उठाया और उस पर एक बाण का संधान किया। वह बाण भी पात्र भी पात्र के भी निचले भाग को भेदकर अनिरुद्ध वाले बाण को आगे छोड़ता हुआ ऊपर वाले पत्थर से जा टकाराया और फिर वेग से उस पात्र में ही आकर स्थित हो गया। तथापि बाणवेग के काण उस पात्र से एक बूँद भी पानी नीचे नहीं गिरा। बाण जब तक गया-आया, तब तक भी जब पानी की एम बूँद नहीं गिरी, तब यह चमत्कार देखकर सब वीर उन्हें बार-बार साधुवाद देन लगे।
तत्पश्चात भानु ने पात्र को अच्छी तरह देखा-भाला फिर सबके देखते-देखते नेत्र बंद करके धनुष लेकर दूर से बाण चलाया।
उस बाण ने भी उस समय पात्र का भेदन करके उसे अधोमुख कर दिया और फिर तत्काल ही उसका मुख ऊपर की ओर करके वह उसमें आधा निकला हुआ स्थित हो गया तब भी बाण के वेग से एक बूँद भी जल नहीं गिरा और पात्र भी नहीं फूट सका। यह अद्भुत सी बात हुई। इस प्रकार श्री कृष्ण के जो अठारह महारथी पुत्र थे, उन सबने पात्र का भेदन किया, किंतु जल का स्त्राव नहीं हुआ ।
यह हस्तलाघव देखकर बिन्दु देश के राजा दीर्घबाहु बडे़ विस्मित हुए। उन्होंने उनके हाथ में अपनी अठारह सुलोचना कन्याएं प्रदान कीं। उनके विवाहकाल मे शंक, भेरी और आनक आदि बाज बजे, गन्धर्वों ने गीत गाये तथा अप्सराओं ने नृत्य किया। देवताओं ने उन सबके ऊपर जयध्वनि के साथ फूल बरसाये और स्वर्गवासियों ने उन सबकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। राजा दीर्घबाहु ने साठ हजार, हाथी, एक अरब घोड़े, दस लाख रथ, एक लाख दासियों तथा चार लाख शिबिकाएं दहेज में दीं। यदुकुल तिलक प्रद्युम्न ने वह सारा दहेज द्वारकापुरी को भेज दिया ।
तत्पश्चात् दीर्घबाहु की अनुमति ले प्रद्युम्न निषध देश को गये। मैथिल ! निषध के राजा का नाम वीरसेन था। उन्होंने भी महात्मा प्रद्युम्न को भेंट दी। इसी प्रकार भद्रदेश के अधपति बृहत्सेन ने, जो श्री कृष्ण को इष्ट देव माननेवाले तथा श्रीहरि के प्रिय भक्त थे, सैनिकों सहित माथुर, शूरसेन तथा मधु नामक जनपदों में गये। वहाँ स्वागत पूर्वक पूजित हो, वे पुन: मथुरा में आये। तदनन्तर वनों सहित मथुरा की परिक्रमा करके वे व्रज में गये।
राजन्! वहाँ उन्होंने गोप-गोपी, यशोदा, व्रजेश्वर नन्दराज, वृषभानु तथा उपनन्दों को नमस्कार करके बड़ी शोभा पायी। नन्दराज को बारंबार भेंट-उपहार अर्पित करके, उन सबके द्वारा सम्मानित हो वे कई दिनों तक नन्द-गोकुल में टिके रहे ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘मथुरा तथा शूरसेन जनपदों पर विजय’ नामक अठारहवां अध्याय पूरा हुआ ।
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