07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 19 || यादव-सेना का विस्‍तार; कौरवों के पास उद्धव का दूत के रूप में जाकर प्रद्युम्न का संदेश सुनाना; कौरवों के कटु उत्तर से रुष्‍ट यादवों की हस्तिनापुर पर चढ़ाई

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 19 || यादव-सेना का विस्‍तार; कौरवों के पास उद्धव का दूत के रूप में जाकर प्रद्युम्न का संदेश सुनाना; कौरवों के कटु उत्तर से रुष्‍ट यादवों की हस्तिनापुर पर चढ़ाई


श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! इसके बाद महाबाहु प्रद्युम्न अपनी सेनाओं के साथ उच्‍च स्‍वरूप से दुन्‍दुभिनाद करते हुए बडे़ वेग से कुरुदेश में गये। बीस योजन लंबी भूमि पर उनकी सेना के शिविर लगे थे। उस छावनी का विस्‍तार भी दस योजन लंबी सड़क थी वहाँ धनाढ्य वैश्‍यों ने सहस्‍त्रों दुकानें लगा रखी थी। रत्‍नों के पारखी वस्‍त्रों के व्‍यवसायी, कांच की वस्‍तुओं के निर्माता, वायक (कपड़े बुनने और सीने वाले), रंगरेज, कुम्‍हार, कंदकार (मिश्री आदि बनाने वाले हलवाई), तुलकार (कपास में से रुई निकालने वाले), पटकार (वस्‍त्र निर्माता), टंकार (तार आदि टांकने का काम करने वाले) अथवा ‘टंक’ (नामक औजार बनाने वाले), चित्रकार, पत्रकार, (कागज बनाने वाले), नाई, पटुवे, शस्‍त्रकार, पर्णकार (दोने बनाने वाले), शिल्‍पी, लाक्षाकार (लखारे), माली, रजक, (धोबी), तेली, तमोली, पत्‍थारो पर खुदाई करने या चित्र बनाने वाले, भड़भूज, कांचभेदी, स्‍थूल-सूक्ष्‍म मोती आदि का रत्‍नों का भेदन करने वाले– ये सभी कारीगर वहाँ की सड़क पर दृष्टिगोचर होते थे। 

कहीं भानुमती का खेल दिखाने वाले बाजीगर थे, कहीं इन्‍द्रजाल फैलाने वाले जादूगर। कहीं नट नृत्‍य करते थे तो कहीं दो भालुओं का युद्ध होता था। कहीं डमरु बजा-बजाकर वानरों के खेल दिखाये जाते थे, कहीं बारह प्रकार के आभूषणों से विभूतिष वारांगनाओं के नृत्‍य का कार्यक्रम चल रहा था। वे वर-वधुएँ अपने दिव्‍य सोलह श्रृंगार से अप्‍सराओं का भी मन हर लेती थीं। यद्यपि कौरवों के लिये यादवों की सेना अपने भाई-बन्‍धुओं की ही सेना थी, तथापि हस्तिनापुर में उसका बड़ा आंतक फैल गया।

वहाँ के लोग बडे़ वेग से इधर-उधर खिसकने लगे- वे घबराकर कहीं अन्‍यत्र चले जाने की चेष्‍टा में लग गये। सब लोग अपने घरों में अरगला (बिलाई, सांकल एवं ताले) लगाकर भागने लगे। घर-घर में और जन-जन में बड़ा भारी कोलाहल होने लगा- सर्वत्र हलचल मच गयी। शौर्य, पराक्रम और बल से सम्‍पन्‍न कौरव चक्रवर्ती राजा थे। वे समुद्र तक की पृथ्वी के अधिपति थे, तथापि यादवों की विशाल सेना देखकर वे भी अत्‍यन्‍त शंकित हो गये ।प्रद्युम्न ने बुद्धिमानों में श्रेष्‍ठ उद्धव को दूत बनाकर भेजा। वे कौरवेन्‍द्र–नगर हस्तिनापुर में जाकर धृतराष्‍ट्र से मिेले। महाराज धृतराष्‍ट्र के राजमहल का आंगन मद की धारा बहाने वाले तथा कस्‍तुरी और कुमकुम से विभूषित गण्‍डस्‍थलों से सुशोभित हा‍थियों की सिन्‍दूर-र‍ंचित सूँड पर बैठने और उनके कानों से प्रताडित होने वाले भ्रमरों से मण्डित था।

हस्तिनापुर के स्‍वामी राजाधिराज धृतराष्ट्र की सेवा में भीष्म, कर्ण, द्रोण, शल्‍य, कृपाचार्य, भूरिश्रवा, बाहलीक, धौम्‍य, शकुनि, संजय, दुश्‍शासन, विदुर, लक्ष्‍मण, दुर्योंधन, अश्‍वथामा, सोमदत्त, तथा श्रीयज्ञकेतु उपस्थित थे। वे सब-के-सब सोने के सिंहासन पर श्‍वेत छत्र और चंवर से सुशोभित होकर बैठे थे। उसी समय वहाँ पहुँचकर उद्धव ने प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनसे कहा ।

उद्धव बोले- राजेन्‍द्र–शिरोमणे ! प्रद्युम्न ने आपके पास मेरे द्वारा जो संदेश कहलाया है, उसे सुनिये ‘महाबली यादवराज उग्रसेन को जीतकर राजसूय यज्ञ करेंगे। उन्‍हीं के भेज हुए रुक्मिणीनन्‍दन प्रद्युम्न सेना के साथ जम्‍बूद्वीप के अत्‍यन्‍त उद्भट वीर नरेशों को जीतने के लिये निकले हैं। वे चेदिराज शिशुपाल, शाल्‍व, जरासंध तथा दन्‍तवक्र आदि भूपालों पर विजय पाकर यहाँ तक आ पहुँचे हैं। आप उन्‍हें भेंट दीजिये।

यादव और कौरव एक दूसरे के भाई–बन्‍धु हैं। इन बन्‍धुओं में एकता बनी रहे, इसके लिये आपको भेंट और उपहार सामग्री देनी ही चाहिये। ऐसा करने से कौरवों-वृष्णि वंशियों में कलह नहीं होगा। यदि आप भेंट नहीं देंगे तो युद्ध अनिवार्य हो जायेगा। यह उनकी कही हुई बात है, जिसे मैंने आपके सम्‍मुख प्रस्‍तुत किया। महाराज ! यदि मुझसे कोई धृष्‍टता हुई तो उसे क्षमा कीजिये, दूत सर्वथा निर्दोष होता है। अब आप जो उत्तर दें, उसे मैं वहाँ जाकर सुना दूँगा ।

नारदजी कहते हैं- राजन्! उद्धव का वह कथन सुनकर समस्‍त कौरव क्रोध से तमतमा उठे। वे अपने शौर्य और पराक्रम के मद से उन्‍मत्त थे। उनके होठ फड़कने लगे और वे बोले ।

कौरवों ने कहा- अहो ! काल की गति दुर्लङघ्‍य है, यह जगत विचित्र है, दुर्बल सियार भी वन में सिंह के ऊपर धावा बोलने लगे हैं, जिन्‍हें हमारे सम्‍बन्‍ध से ही प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त हुई है, जिनको हम लोगों ने ही राज्‍य सिंहासन दिया है, वे ही यादव अपने दाताओं के प्रतिकूल उसी प्रकार सिर उठा रहे हैं, जैसे सांप दूध पिलाने वाले दाताओं को ही काट लेते हैं।

समस्‍त वृष्णिवंशी सदा के डरपोक हैं, वे युद्ध का अवसर आते ही व्‍याकुल चित्त हो जाते हें तथापि वे निर्लज्‍ज आज हम लोगों पर हुकूमत मत करने चले हैं। उग्रसेन में बल ही कितना है! वह अल्‍पवीर्य होकर भी, जम्‍बूद्वीप मे निवास करने वाले समस्‍त राजाओं को जीतकर, उनसे भेंट लेकर राजसूय यज्ञ करेगा- यह कितने आश्‍चर्य की बात है ! जहाँ भीष्‍म, कर्ण, द्रोण, दुर्योधन आदि महापराक्रमी वीर बैठे हैं, वहाँ उस दुर्बुद्धि प्रद्युम्न ने तुमको मन्‍त्री बनाकर भेजा है ! अत: हमारा यह कहना है कि यदि तुम लोगों की जीवित रहने की इच्‍छा हो तो अपनी द्वारकापुरी को लौट जाओ। यदि नहीं जाओगे, तो तुम सब लोगों को आज हम यमलोक भेज देंगे ।

नारदजी कहते है- राजन् ! श्री कृष्ण विरोधी कौरवों को इस प्रकार भाषण सुनकर द्धव ने प्रद्युम्न के पास जा, सब कुछ सुनाया। कौरवों की बात सुनकर धनुर्धरों में श्रेष्‍ठ प्रद्युम्न के होठ रोष के मारे फड़कने लगे। वे शार्गधनुष हाथ में लेकर बोले ।

प्रद्युम्न ने कहा- राजन्! कौरव यद्यपि हमारे बन्‍धु हैं, तथापि ये मद से उन्‍मत्त हो गये हैं। इसलिये उनको अपने तीखे बाणों से उसी प्रकार नष्‍ट कर डालूंगा, जैसे योगी कठोर नियमों द्वारा अपने दैहिक रोगों को नष्‍ट कर डालता है। यादवों के सैन्‍य-समूहों में जो कोई भी वीर कौरवों से भेंट दिलवाने का प्रयास नहीं करेगा, वह अपने माता-पिता का औरस पुत्र नहीं माना जायेगा ।

नारदजी कहते हैं राजन् ! उसी क्षण भोज, वृष्णि और अन्‍धक आदि समसत यादव कुपित हो अपनी सेनाओं के साथ हस्तिनापुर जा चढे़ ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्‍वजित खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘कौरवों के लिए दूत प्रेषण’ नामक उन्‍नीसवां अध्‍याय पूरा हुआ ।

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