07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 20 || कौरवों की सेना का युद्धभूमि में आना; दोनों ओर के सैनिकों का तुमुल युद्ध और प्रद्युम्न के द्वारा दुर्योधन की पराजय
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 20 || कौरवों की सेना का युद्धभूमि में आना; दोनों ओर के सैनिकों का तुमुल युद्ध और प्रद्युम्न के द्वारा दुर्योधन की पराजय
नारदजी कहते हैं- राजन ! उसी समय जिनकी क्रोधाग्नि भड़क उठी थी, वे समस्त कौरव भी अपनी-अपनी सेनाओं के साथ पृद्युमन का सामना करने के लिये निकले। रत्नजटित कम्बल (कुलीन या झूल) से अलंकृत और सोने की सांकलों से सुशोभित साठ हजार हाथी विजयध्वज फहराते हुए निकले। प्रलय-पयोधि के महान आवर्तों के टकराने के समान गगन भेदिनी ध्वनि करने वाली साठ हजार दुन्दुभियों का गम्भीर घोष फैलाने वाले वे गजराज क्रमश: आगे बढ़ने लगे। लोहे के कवच बांधे तथा शिरस्त्राण धारण किये दो लाख महामल्ल भी युद्ध के लिये निकले। उनके साथ बहुत-से हाथी और सांड भी थे। तदनन्तर सोने के कंगन, बाजूबंद, किरीट और सुन्दर कुण्डल पहने, स्वर्णमय कवच धारण किये दो लाख गजारोही योद्धा निकले।तत्पश्चात पीने कवच और टेढी पगड़ी से सुशोभित दो लाख वीर योद्धा, जो अनेक संग्रामों मे विजयकीर्ति पा चुके थे, युद्ध के लिये निकले। वे भी हाथियों पर ही बैठे थे। कोई लाल रंग के वस्त्र पहने और लाल रंग के ही आभूषणों से विभूषित थे। वे लाल रंग की ही झूल से सज्जित ऊँचे गजराजों पर चढ़कर युद्ध के लिये निकले थे। कुछ हरे वस्त्रों से सुसज्जित थे। कुछ लोग श्वेत वस्त्र धारण किये हुए और कछ गुलाबी कपड़ों से सजे हुए युद्ध के लिये आये थे। करोड़ों राजनयकुमार देवविमानों के समान रथों पर बैठकर आये थे। जो अत्यन्त ऊँचे और सिंहध्वज से सुशोभित थे। उन रथों पर पताकाएं फहरा रही थीं। अंग-वंग तथा सिन्धु देशों में उत्पन्न हुए चंचल घोड़ों पर, जो मन के समान वेगशाली तथा सोने के आभूषणों से विभूषित थे, सवार हो बहुत से क्षत्रिय-योद्धा शस्त्र लिये नगर से बाहर निकले।
राजन ! लोहे के कवचों से अलंकृत तथा विद्याधरों के समान युद्धकुशल बहुसंख्यक वीर चारों ओर से झुंड-के-झुंड निकलने लगे। भेरी, मृदंग, पटह और आनक आदि युद्ध के बाजे बजने लगे। सूत, मागध और वंदीजन कौरवों का यश गा रहे थे। धृृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन अपनी विशाल सेना के बीच बहुत बडे़ रथ पर बैठा शोभा पा रहा था।
वह रथ चन्द्र मण्डल के समान उज्ज्वल तथा चार योजन के घेरे वाले छत्र से अलंकृत हो, अत्यन्त मनोहर प्रतीत होता थे। वह छत्र उसे राजाओं की ओर से भेंट के रूप में प्राप्त हुआ था। हीरे के बने हुए दण्ड वाले बहुत से व्यंजन चंवर डुलाने वालें के हाथों में सुशोभित हो उस रथ की शोभा बढा़ते थे। उसमें श्वेत रंग के घोड़े जुते हुए थे और उसके ऊपर सिंहध्वज फहरा रहा था। दुर्योधन के अतिरिक्त अन्य धृतराष्ट्र–पुत्र भी अलग-अलग रथ पर बैठे थे। उनके रथों पर भी चार-चार योजन के घेरे वाले छत्र, जिनमें मोती की झालरें लटक रही थीं, शोभा दे रहे थे।
भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, बाहलिक, कर्ण, शल्य, बुद्धिमान सोमदत्त, अश्वत्थामा, धौम्य, धनुर्धर वीर लक्ष्मण, शकुनि, दुष्शासन, संजय, भूरिश्रवा तथा यज्ञकेतु के साथ सुन्दर रथ पर बैठकर आता हुआ राजा दुर्योंधन मरुद्गणों के साथ इन्द्र की भाँति शोभा पा रहा था। राजन! उसी समय इन्द्रप्रस्थ से पाण्डवों की भेजी हुई दो ‘पृतना’ सेना कौरवों की सहायता के लिये आयी। कौरवों की सोलह अक्षौहिणी सेनाओं के चलते से पृथ्वी हिलने लगी, दिशाओं में कोलाहल व्याप्त हो गया और उड़ती हुई धूल से आकाश में अन्धकर छा गया। घोड़े, हाथी तथा रथों की रेणु से व्याप्त आकाश में सूर्य एक तारे के समान प्रतीत होता था। भूतल पर अन्धकार फैल गया। समस्त देवता शंकित हो गये।
यत्र-तत्र हाथियों की टक्कर से वृक्ष टूट-टूटकर गिरने लगे। घुड़सवार वीरों के अश्वचालन से भूखण्ड मण्डल खुद गया। कौरव और वृष्णिवंशियों की सेनाएं परस्पर जूझने लगीं। जैसे प्रलयकाल में सातों समुद्र अपनी तरंगों से टकराने लगते है उसी प्रकार उभय पक्ष की सेनाएं तीखे शस्त्रों से परस्पर प्रहार करने लगीं। जैसे बाज पक्षी मांस के लिये आपस में जूझते हैं, उसी प्रकार उस युद्ध भूमि में घोडे़ से, हाथी हाथियों से, रथी रथियों से और पैदल पैदलों से भिड़ गये। महावत महावतों से, सारथि सारथियों से तथा राजा राजाओं से रोषपूर्वक इस प्रकार युद्ध कर रहे हों। तलवार, भाले, शक्ति, बर्छें, पटि्टश, मुद्गर, गदा, मुसल, चक्र तोमर, भिन्दिपाल, शतघ्री, भुशुण्डी तथा कुठार आदि चमकीले अस्त्र–शस्त्रों एवं बाण-समूहों द्वारा रोषावेश से भरे हुए योद्धा एक-दूसरे के मस्तक काटने लगे।
रणभूमि में बाणों द्वारा अन्धकर फैल जाने पर धनुर्धरों में श्रेष्ठ पृद्युमन बारंबार धनुष की आकार करते हुए भीष्म के साथ, दीप्तिमान कृपाचार्य के साथ, भानु द्रोणाचर्य के साथ, साम्ब बाह्लीक के साथ, मधुकर्ण के मैथिल ! श्रीकृष्ण के पुत्र चित्रभानु बुद्धिमान सोमदत्त के साथ वृक अश्वत्थामा के साथ, श्रीहरि के पुत्र श्रुतदेव समरांगण में दुश्शासन के साथ तथा सुनन्दन संजय के साथ युद्ध करने लगे।
राजन् ! गद विदुर के साथ, कृतवर्मा भूरिश्रवा के साथ तथा अक्रूर यज्ञकेतु के साथ संग्राम-भूमि में लड़ने लगे।
इस प्रकार दोनों सेनाओं में परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध छिड़ गया। श्रीकृष्ण कुमार प्रद्युम्न ने दुर्योधन की विशाल सेना को अपने बाण-समूहों द्वारा उसी प्रकार मथ डाला, जैसे वाराह-अवतारधारी भगवान ने प्रलयकाल के महासागर को अपनी दाढ़ से विक्षुब्ध कर दिया था। बाण से विदीर्ण मस्तक वाले हाथियों के मुक्ताफल आकाश से गिरते समय ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो अपने बाणों से उस महासमर मे सारथि, रथी एवं रथों को उसी तरह मार गिराया, जैसे वायु अपने वेग से बड़े-बडे़ वृक्षों को धराशायी कर देती है।
उस समय दुर्योधन बार-बार अपने धनुष को टंकारता हुआ वहाँ आ पहुँचा। उसने उस युद्ध में दस बाणों को प्रद्युम्न पर छोड़ा, किंतु यादवेश्वर भगवान प्रद्युम्न ने उन बाणों को अपने ऊपर पहुँचने के पहले ही काट गिराया। तब दुर्योधन ने पुन: प्रद्युम्न के कवच को अपना निशाना बनाकर सोने के पंखवाले दस सायक चलाये। वे सायक प्रद्युम्न के कवच को विदीर्ण करके उनके शरीर में समा गये। तत्पश्चात सहस्त्र बाण समूहों द्वारा प्रहार करके धृतराष्ट्र के बलवान पुत्र महावीर दुर्योधन ने प्रद्युम्न के रथ के सहस्त्र घोड़ों को मार डाला। फिर सौ बाणों से प्रत्यंचा सहित उनके उत्तम धनुष को भी खण्डित कर दिया।
प्रद्युम्न उस रथ को त्यागकर दूसरे रथ पर जा बैठे। इसके बाद उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के दिये हुए धनुष को हाथ में लेकर उस पर विधिपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ायी और एक बाण का संधान करके उसे अपने कान तक खींचा फिर बाहुदण्ड के वेग उस बाण को दुर्योंधन के रथ को ले उड़ा और दो घड़ी तक उसे आकाश से घुमाता रहा। तत्पश्चात जैसे छोटा बालक कमण्डलु को फेंक देता है, उसी प्रकार उस बाण ने दुर्योधन के रथ को आकाश से नीचे गिरा दिया।
नीचे गिरने से वह रथ तत्काल चूर-चूर हो गया। उसके सभी घोडे़ सारथि सहित मृत्यु के ग्रास बन गये। महाबली धृतराष्ट्र पुत्र तत्काल दूसरे रथ पर जा बैठा। उसने दस सायकों द्वारा युद्धभूमि में प्रद्युम्न को घायल कर दिया। उन सायकों से आहत होने पर भी श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न फल की माला से मारे गये हाथी की भाँति तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने श्री कृष्ण के दिये हए को दण्ड पर एक बाण रखा और उसे चला दिया।
वह बाण रथ सहित दुर्धोधन को लेकर ज्यों ही महाकाश में पहुँचा, त्यों ही प्रद्युम्न का छोड़ा हुआ दूसरा बाण भी शीघ्र उसे लेकर और भी आगे बढ़ गया। तब तक तीसरा बाण भी वहाँ पहुँचा। उसने अश्व तथा सारथि सहित उस रथ को लेकर राजमन्दिर के आंगन में आकाश से धृतराष्ट्र के समीप इस प्रकार ला पटका, मानो वायु ने कमलकोष को उडा़कर नीचे डाल दिया हो। उस रथ को वहाँ गिराकर वह बाण रणभूमि में प्रद्युम्न के पास लौट आया। नीचे गिरते ही वह रथ अंगार की भाँति बिखर गया। दुर्योधन मुख से रक्त वमन करता हुआ मूर्च्छित हो गया।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘यादव कौरव युद्ध का वर्णन’ नामक बीसवां अध्याय पूरा हुआ।
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