07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 22 || अर्जुन सहित प्रद्युम्न का कालयवन-पुत्र चण्‍ड को जीतकर भारतवर्ष के बाहर पूर्वोत्तर दिशा की ओर प्रस्‍थान

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 22 || अर्जुन सहित प्रद्युम्न का कालयवन-पुत्र चण्‍ड को जीतकर भारतवर्ष के बाहर पूर्वोत्तर दिशा की ओर प्रस्‍थान

नारदजी कहते हैं- राजन् ! भाइयों तथा अन्‍यान्‍य कुरुवंशियों के साथ दुर्योधन को शान्‍त करके यदुकुल तिलक बलराम और श्रीकृष्‍ण पाण्‍डवों से मिलने के लिये इन्‍द्रप्रस्‍थ को गये। तब अजातशत्रु राजा युधिष्‍ठि‍र अपने भाइयों तथा स्‍वजनों के साथ श्रीकृष्‍ण की अगवानी के लिये इन्‍द्रप्रस्‍थ से बाहर आये। उनके साथ इन्‍द्रप्रस्‍थ के अन्‍यान्‍य निवासी भी शंखध्‍वनि, दुन्‍दुभिनाद, वेदमन्‍त्रों का घोष तथा वेणुवादनपूर्वक पुष्‍प वर्षा करते हुए आये। बलराम और श्रीकृष्‍ण को राजा युधिष्ठिर दोनों भुजाओं से खींचकर हृदय से लगा लिया और परमानन्‍द का अनुभव किया। वे योगी की भाँति आनन्‍द में डूब गये। प्रद्युम्न आदि श्रीकृष्‍ण कुमारों ने भी श्री युधिष्ठिर को प्रणाम किया। युधिष्ठिर ने उन सबको दोनों हाथों से पकड़कर आशीर्वाद दिया। श्रीहरि ने स्‍वयं कुशल समाचार पूछा तथा नकुल और सहदेव ने उनके चरणों में वन्‍दना की ।
श्रीकृष्‍ण और बलराम साक्षात परिपूर्णतम श्रीहरि हैं, असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों के पालक हैं। भगवद्भक्‍त युधिष्ठिर ने उन दोनों भाइयों का पूर्णतर समादर किया। उन्‍होंने यदुकुल के मुख्‍य वीर प्रद्युम्न आदि को सैनिकों सहित दिग्विजय के लिये विधिपूर्वक भेजा और सारी पृथ्‍वी को जीतने के लिये आज्ञा दी। फिर वे दोनों भक्‍तवत्‍सल सर्वेश्‍वर बन्‍धु भाइयों सहित धर्मराज युधिष्ठिर से मिलकर द्वारका को चले गये। राजन्‍ ! गौरे और श्‍याम वर्ण वाले दोनों भाई, बलराम और श्रीकृष्‍ण सबके मन को हर लेने वाले हैं। नरेश्‍वर ! इस प्रकार मैंने तुमसे श्रीकृष्‍ण का चरित्र कहा। यह मनुष्‍यों को चारों पदार्थ देने वाला हैं। अब तुम और क्‍या सुनना चाहते हो ? ।

बहुलाश्‍व ने पूछा- मुने ! बलराम सहित पुरुषोतम श्रीकृष्‍ण जब कुशस्‍थली को चले गये, तब साक्षात भगवान् प्रद्युम्न हरि ने क्‍या किया ? उनका अद्भुत चरित्र श्रवण करने योग्‍य तथा मनोहर है। जो जीवन्‍मुक्‍त ज्ञानी भक्‍त हैं, उनके लिये भी भगवच्‍चरित्र सदा श्रवणीय है, फिर जिज्ञासु भक्‍तों के लिये तो कहना ही क्‍या। भगवान का चरित्र अर्थार्थी भक्‍तों को सदा अर्थ देने वाला और आर्त्त भक्तों की पीड़ा को शान्‍त करने वाला है। इतना ही नहीं, स्‍थावर आदि चार प्रकार के जो जीव समुदाय हैं, उन सबके पापों का वह नाश करने वाला है। दिग्विजय के इच्‍छुक श्रीहरि कुमार प्रद्युम्न किस प्रकार सम्‍पूर्ण दिशाओं पर विजय प्राप्‍त करके पुन: सेना सहित द्वारका में लौटे, यह सारा वृतान्‍त आप मुझे ठीक-ठीक बतलाइये। देवर्षें ! आप ब्रह्माजी के पुत्र और साक्षात सर्वदर्शी भगवान हैं, भगवान श्रीकृष्‍ण के मन हैं; अत: पहले श्रीहरि के मनस्‍वरूप आपको मेरा प्रणाम है।

नारद जी ने कहा- राजन्! तुमने बहुत अच्‍छी बात पूछी। तुम भगवत्‍प्रभाव के ज्ञाता होने के कारण धन्‍य हो। इस भूतल पर श्रीकृष्‍ण चरित्र को सुनने के पात्र तुम्‍हीं हो। नरेश्‍वर ! श्रीकृष्‍ण के चले जाने पर अजातशत्रु राजा युधिष्ठिर ने शत्रुओं से ही प्रद्युम्न की रक्षा करने के लिये स्‍नेहवश उनके साथ शीघ्र ही अपने भाई अर्जुन को भी जाने की आज्ञा दे दी; क्‍योंकि उनके मन में बाही शत्रुओं से प्रद्युम्न आदि पर भय आने की आशंका हो गयी थी।
मिथिलेश्‍वर ! तदनन्‍तर अर्जुन के साथ यदुश्रेष्‍ठ प्रद्युम्न विशाल सेना को अपने साथ लिये तत्‍काल त्रिगर्त जनपद में जा पहुँचे। त्रिगर्त के राजा धनुर्धर सुशर्मा ने शंकित होकर महामना प्रद्युम्न को भेंट दी। फिर मत्‍स्‍य देश के राजा विराट से पूजित होकर, यादवेश्‍वर प्रद्युम्न ने सरस्‍वती नदी में स्‍नान करके कुरुक्षेत्र तीर्थ का दर्शन किया। फिर पृथूदक, बिन्‍दु-सरोवर त्रितकूप और सुदर्शन आदि तीर्थों में होते हुए, सरस्‍वती में स्‍नान करके, वहाँ अनेक प्रकार के दान दे वे आगे बढ़ गये। कौशाम्‍बी¹ नगरी में पहुँचने पर सारस्‍वत प्रदेश के राजा कुशाम्‍ब ने प्रद्युम्न को भेंट नही दी क्‍योंकि वे दुर्योधन के वशीभूत होने के कारण उसी के पिछलग्‍गू थे। तब प्रद्युम्न की आज्ञा पाकर चारुदेष्‍ण, सुदेष्‍ण पराक्रमी चारुदेह, सुचारु, चारुगुप्‍त, भद्रचारु, चारुचन्‍द्र, विचारु और दसवें चारु- इन दसों रुक्मिणी पुत्रों ने सिंधी घोड़ों पर सवार हो, सबके देखते-देखते कौशाम्‍बी नगरी को चारों ओर से घेर लिया। उनके बाणों से राजधानी के महलों के शिखर, ध्‍वज, कलश और तोलिका आदि चूर-चूर होकर उसी प्रकार गिरने लगे, जैसे वानरों के प्रहार से लंका की अट्टालिकाएं टूट-टूटकर गिरने लगीं थीं।
रुक्मिणी कुमारों ने जब इस प्रकार बाणों द्वारा अन्‍धकार फैला दिया, तब राजा कुशाम्‍ब हाथ में बहुत-सी भेंट सामग्री लिये नगर से बाहर निकले। उन्‍होंने हाथ जोड़कर शम्‍बरारि को नमस्‍कार किया और बहुत-सी सामग्री देकर भयार्त एवं भयविह्वल राजा ने नगरी की रक्षा की। उसी समय सौवीरराज सुदेव, आभीरराज विचित्र, सिन्‍धुपति सुमेरु, लाक्षेश्‍वर धर्मपति और गन्‍धर्वराज विडौजा इन सबने भी, जो दुर्योधन के वशवर्ती थे, भय के कारण बलि अर्पित करे अत्‍यन्‍त विनीत होकर कृष्‍णकुमार प्रद्युम्न को प्रणाम किया। तदनन्‍तर अपनी सेना से घिरे हुए महाबाहु प्रद्युम्न वीर कल्कि के समान अर्बुद और म्‍लेच्‍छ देशों पर विजयपन के लिये प्रस्‍तुत हुए ।
कालयवन का महाबली पुत्र यवनेन्‍द्र चण्‍ड प्रद्युम्न का आगमन सुनकर अत्‍यन्‍त क्रोध से भर गया। ‘आज मैं अपने पिता की हत्‍या करने वाले शत्रु के पुत्र का वध करके बाप का बदला चुका लूँगा’ मन-ही-मन ऐसा विचार करके दस करोड़ म्‍लेच्‍छों की सेना लिये, मद की धारा बहने और गर्जने वाले ऊँचे गजराज पर आरुढ़ हो, आंखें लाल करके, वह महात्‍मा प्रद्युम्न के सामने निकला। चण्‍ड की प्रेरणा से तीखे बाणों की वर्षा करने वाली उस विशाल सेना को आयी दख प्रद्युम्न अपने सैनिकों से बोले ।

नारदजी कहते हैं- राजन ! जब प्रद्युम्न पास ही इस प्रकार कह रहे थे, तब गाण्डीवधारी कपिध्‍वज अर्जुन ने बारंबार धनुष की टंकार करते हुए अकेले ही शत्रु की सेना में प्रवेश किया। रणदुर्मद गाण्‍डीवधारी ने गाण्‍डीव धनुष से छूटे हुए विशिखों द्वारा सामने खडे़ हए वीरों, रथों, हाथियों और घोड़ों के दो-दो टुकडे़ कर डाले। हाथों में शक्ति, खड्ग तथा ऋषि (दुधारा खांडा) लिये कितने ही शत्रु-सैनिक भुजाएं कट जाने के कारण पृथ्‍वी पर गिर पडे़ कितने ही कवचधारी वीरों के पैर कट गये और नख विदीर्ण हो गये। जिनके हौदे छिन्‍न-भिन्‍न हो गये और शरीर घायल हो गये थे ऐसे हाथी युद्धभूमि में इधर-उधर भागने लगे। वे अपनी सूँडों से हाथियों को भी गिराते हुए भाग चले।
अर्जुन के बाणों से दो-दो टूक हुए हाथियों और घोड़ों से भरा हुआ वह समरांगण हँसुओं से काटे गये कुम्‍हड़ों के टुकड़ों से व्‍याप्‍त हुए खेत-सा जान पड़ता था। फिर तो म्‍लेच्‍छ सैनिक अपने-अपने हथियार फेंक, समरांगण छोड़कर जोर-जोर से भागने लगे- ठीक उसी तरह जैसे सूर्य की किरणों से विदीर्ण हुए कुहासों के समुदाय नष्‍ट हो जाते हैं ।

मैथिलेन्‍द्र ! हाथी पर बैठे हुए म्‍लेच्‍छराज चण्‍ड ने एक शक्ति घुमाकर अर्जुन के ऊपर की और सिंह के समान गर्जना की। राजेन्‍द्र ! बलवान श्रीकृष्ण सखा अर्जुन ने विद्युल्‍लता के समान अपने ऊपर आती हुई उस शक्ति के गाण्‍डीव-मुक्‍त बाणों द्वारा खेल-खेल में ही सौ टुकडे़ कर डाले। महाम्‍लेच्‍छ चण्‍ड रोष से भरकर जब तक धनुष उठाये, तब तक गाण्‍डीवधारी ने लीलापूर्वक एक बाण मारकर उसके उस धनुष को काट दिया।
तब प्रचण्‍ड पराक्रमी चण्‍ड ने दूसरा धनुष हाथ में लेकर प्रलयकाल के महासागर की बड़ी-बड़ी भँवरों के टकराने की भाँति गम्‍भीर नाद करने वाले अर्जुन की प्रत्‍यंचा को उसी तरह काट दिया, जैसे गरुड़ किसी सर्पिणी के टुकडे़-टुकडे़ कर डाले। तब अर्जुन ने ढाल के साथ चमकती हुई अपनी तलवार ले ली और उससे चण्‍ड के गजराज की कुम्‍भस्‍थली पर इस प्रकार प्रहार किया, मानो इन्‍द्र ने पर्वत पर वज्र मार दिया हो। अग्निदेव के दिये हुए उस खड्ग से उस हाथी का कुम्‍भस्‍थल फट गया। उसने चिग्‍घाड़ करते हुए धरती पर घुटने टेक दिये। फिर वह अत्‍यन्‍त मूर्च्छित हो गया। तब चण्‍ड ने भी तलवार लेकर पाण्‍डुनन्‍दन अर्जुन पर प्रहार किया; परंतु कुरुकुल-तिलक अर्जुन ने उसके खड्ग को ढाल पर रोककर उसके ऊपर अपनी तलवार से वार किया। इससे चण्‍ड का शिरस्‍त्राण सहित मस्‍तक धड़ से अलग हो गया। तदनन्‍तर अर्जुन ने अपने धनुष पर प्रत्‍यंचा चढ़ायी और चण्‍ड के मस्‍तक को बाण पर रखकर उसे धनुष पर खींचकर चलाया और प्रद्युम्न की सेना में उसे फेंक दिया ।उस समय जय-जयकार के साथ दुन्‍दुभि बजने लगी और देवता लोग अर्जुन के ऊपर फूलों की वर्षा करने लगे।

फिर श्रीकृष्‍ण कुमार प्रद्युम्न ने उसी क्षण विजयध्‍वज से विभूषित अपनी सेना का अर्जुन को सेनापति बन दिया। उस समय यादव-सेना के मुख्‍य वीरों ने हाथ में श्‍वेत चँवर आदि लेकर कपिध्‍वज अर्जुन के ऊपर हवा ही। फिर तो वेगशाली अर्बुदाधीश ने प्रद्युम्न की शरण ली। उसने डरते हुए हाथ जोड़कर नमस्‍कार किया और भेंट अर्पित की। मोरंग के राजा मन्‍दहास ने भयभीत हो महात्‍मा प्रद्युम्न को दस लाख घोड़े देकर नमस्‍कार किया। इस प्रकार भरत खण्‍ड पर विजय पाकर यदुकुल-तिलक श्रीकृष्‍ण कुमार ने हिमालय को दक्षिण दिशा करके पूर्वोतर दिशा की ओर प्रस्‍थान किया ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्‍वजित खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘बहुदिग्विजय नामक बाईसवां अध्‍याय पूरा हुआ ।



¹इति‍हास प्रसिद्ध कौशाम्‍बी नगरी तो इलाहाबाद जिले के ‘कोसम’ नाम से प्रसिद्ध ग्राम के आस-पास रही है। यह बात खुदाई आदि से भी सिद्ध हो चुकी है। यहाँ जिस ‘कौशाम्‍बी’ की चर्चा है, वह दूसरी ही है, राजा कुशाम्‍ब के नाम पर बसी हुई राजधानी को ‘कौशाम्‍बी’ कहा गया है।

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