07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 13 || शाल्‍व आदि देशों तथा द्विविद वानर पर प्रद्युम्न की विजय

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 13 || शाल्‍व आदि देशों तथा द्विविद वानर पर प्रद्युम्न की विजय; लंका से विभि‍षण का आना और उनहें भेंट समर्पित करना

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! कृतमाला और ताम्रपर्णी नदियों में स्‍नान करके श्रीयादवेश्‍वर प्रद्युम्न अपने यादव सैनिकों के साथ राजपुर को गया। राजपुर का स्‍वामी राजा शाल्‍व था। वह मेरे मुँह से यादवों का आगमन सुनकर शीघ्र ही वानरराज द्विविद के पास गया। वीर, द्विविद मित्र की सहायता करने के लिये उद्यत हो यादवों के प्रति मन में अत्‍यनत क्रोध लेकर प्रद्युम्न की सेना का सामना करने के लिये गया। वह अपने पैरों की धमक से पृथ्वी को हिला देता था। द्विविद ने अपने नखों और दांतों द्वारा पताका और ध्‍वजपट्टों को चीर डाला। वे ध्‍वज कश्‍मीरी शालों से आवृत, मुद्राकिंत स्‍वर्णभूषित थे। उसने रथों को ऊपर उछाल दिया, हाथि‍यों पर वेगपूर्वक चढ़कर घोड़ों को भगाया और वह वानरोचित किलकारियों के साथ भौंहे नचाकर सबको भयभीत करने लगा। इस प्रकार कोलाहल मच जाने पर धनुर्धरों में श्रेष्‍ठ प्रद्युम्न बारंबार धनुष की टंकार करते हुए रथ पर आरुढ़ हो उसके पास आ गये।

मदमत द्विविद उस रथ के आसपास उछलने लगा और अपनी पूँछ से घोड़ा सहित रथ, ध्‍वज और छत्र को कम्पित करने लगा। प्रद्युम्न ने अपने धनुष की कोटि से उसका गला पकड़कर खींचा। तब अत्‍यनत कुपित हुए उस वानर ने उनके ऊपर मुक्‍के से प्रहार किया। तदननतर प्रद्युम्न ने विधिपूर्वक धनुष पर प्रत्‍यंचा चढ़ायी और कान तक खींचकर छोड़ गये एक बाण से द्विविद को बींध दिया।

राजेन्द्र ! उस बाण ने आकाश में आधे पहर तक द्विविद को घुमाकर सौ योजन दूर लंका में गिरा दिया। वहाँ दो घड़ी तक राक्षसों के साथ उसका युद्ध हुआ और उसने राक्षसों को मार गिराया। राजन ! इधर यदुकुल-तिलक प्रद्युम्न ने दुनदुभिनाद करते हुए विजय प्राप्‍त करके शाल्‍व से भेंट ली और दक्षिण-मथुरा का दर्शन करके वे त्रिकूट पर्वत पर जा चढ़ा। उधर वानरराज द्विविद त्रिकूट से मैनाक के शिखर पर गया, मैनाक से सिंहल जाकर वह पुन: भारतवर्ष में आया। धीरे-धीरे वानरेनद्र द्विविद हिमालय पर गया और हिमालय के शिखर से प्राग्‍ज्‍योतिषपुर को जा पहुँचा।

यादवेश्‍वर प्रद्युम्न मल्‍लारदेश के अधिपति रामकृष्‍ण पर विजय पाकर महाक्षेत्र सेतुबनध तीर्थ में गये। महावीर श्रीकृष्‍णकुमार प्रद्युम्न शतयोजन विस्‍तृत ठहर गये। वहाँ साम्ब आदि भाइयों और अक्रूर आदि अपने यादवों को बुलाकर योगेश्‍वर प्रद्युम्न ने सभा में उद्धव से कहा ।

प्रद्युम्न बोले- भोजकुलतिलक मन्त्रिवर उद्धवजी ! परम तेजस्‍वी लोकापति विभीषण इस द्वीप का राजा तथा राक्षस-समूहों का सरदार है। यदि वह शीघ्र भेंट न दे तो बताइये, यहाँ हमें क्‍या करना चाहिये ? 

उद्धव जी ने कहा– प्रभो ! आप देवाधिदेव पुरुषोत्तमोत्तम हैं। आप ही परमात्‍मा श्रीकृष्‍णचन्‍द्र हैं, तथापि आप साधारण लोगों की भाँति मुझ से पूछते हैं। बड़े-बड़े़ योगीश्‍वर भी आपकी माया का पार नहीं पाते। भूमन ! ब्रह्मा आदि देवता भी सदा पराजित होकर जिनके उत्तम अनुशासन का भार सदा अपने मस्‍तक पर ढ़ोते हैं, वही साक्षात पुरुषोत्तम आप हैं। मैं तो आपका दासानुदास हूँ, फिर मैं आपको क्‍या सलाह दूँगा ? ।

श्रीनारदजी कहते है- मैथिलेश्‍वर ! युद्ध के यों कहने पर श्रीहरिस्‍वरूप भगवान प्रद्युम्न ने एक ताड़पत्र लेकर उस पर अपना संदेश लिखा- ‘राक्षसराज ! तुम भोजराज उग्रसेन के लिये भेंट दो; यदि बलाभिमानवश तुम मेरी बात नहीं सुनोगे तो मैं धनुष से छोड़े गये बाणों द्वारा समुद्र पर सेतु बांधकर सैन्‍य समूह के साथ लंका पर चढ़ाई करुँगा। यह लिखकर प्रचण्‍ड-पराक्रमी प्रद्युम्न ने कोदण्‍ड हाथ में लिया और अपने पत्र को बाण में लगाकर उस बाण को कान तक खींचा और छोड़ दिया। उस धनुष की प्रत्‍यंचा को खींचने से बिजली की गड़गड़ाहट के समान टंकारध्‍वनि प्रकट हुई। उस नाद से पातालों तथा सातों लोको सहित सारा ब्रह्माण्‍ड गूँज उठा। प्रद्युम्न के धनुष से छूटा हुआ बाण सम्‍पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ विद्युत के समान गिरते ही सब राक्षस चकित से होकर उठकर खडे़ हो गये। उन दुष्‍टों ने बड़े वेग से अपने कवच और शस्‍त्र ग्रहण कर लिये।

महाबली राक्षसराज विभीषण बाण से पत्र को खींचकर पढ़ गये। सभी में वह पत्र पढ़कर उन्‍हें बढा़ विस्‍मय हुआ। उसी समय उस राजसभा में शुक्राचार्य आ पहुँचे। विभीषण ने पाद्य आदि उपचारों द्वारा उनका पूजन किया और हाथ जोड़ प्रणाम कर‍के कहा ।

विभीषण बोले- भगवान ! य‍ह किसका बाण है ? भूतल पर भोजराज कौन हैं और उनका बल क्‍या है ; क्‍योंकि आप साक्षात दिव्‍यदृष्टि वाले हैं ।

श्रीशुक्र ने कहा- राक्षसराज ! इस विषय में पुराणवेत्ता विद्वान इस प्राचीन इतिहास का वर्णन किया करते हैं, जिसके सुनने मात्र से पापों का नाश हो जाता है। पूर्वकाल में ब्रह्मा जी के पुत्र सनक आदि चार मुनि तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए भगवान विष्णु के दिव्‍यलोक में गये। वे नंगे बालक के रूप में थे। उन्‍हें शिशु जानकर जय और विजय नामक द्वारपालों ने, जो अन्‍तपुर में पहरेदार थे, बेंत की छड़ी से रोक दिया। वे श्रीहरि के दर्शन की लालसा लेकर आये थे।

रोके जाने पर उन्‍हें क्रोध हुआ और उन्‍होंने उन दोनों द्वारपालों को शाप देते हुए कहा- ‘तुम दोनों दुष्‍ट हो; इसलिये असुर हो जाओ। तीन जन्‍मों के पश्‍चात शुद्ध होओगे। ‘इस प्रकार शाप प्राप्‍त करके वे दोनों अपने भवन से गिरे और भूमण्‍डल में आकर दैत्‍यों तथा दानवों से पूजित दिति पुत्र हुए। उनमें से ज्‍येष्‍ठ का नाम हिरण्यकश्यपु था और छो‍टे का नाम हिरण्‍याक्ष। प्रलय के जल से पृथ्वी का उद्धार करने के लिये श्रीहरि यज्ञ-वाराह के रूप में प्रकट हुए। उन्‍होंने महाबली हिरण्‍याक्ष नामक दैत्‍य को मुक्‍के से मार डाला और साक्षात ख्‍ण्‍ड-पराक्रमी नृसिंह होकर कयाधू- कुमार प्रहलाद की सहायता करते हुए हिरण्‍यकशिपु का उदर विदीर्ण कर दिया।

वे ही दोनों भाई फिर केशिनी के गर्भ से विश्रवा के पुत्र होकर उत्‍पन्‍न हुए, जो सम्‍पूर्ण लोकों को एक मात्र ताप देने वाले रावण और कुम्‍भकरण कहलाये। श्रीरामचन्‍द्रजी सायकों से घायल होकर वे दोनों युद्धभूमि में सदा के लिये सो गये। वे महान वेगशाली राक्षसराज रावण और कुम्‍भकर्ण तुम्‍हारी आंखों के सामने मारे गये थे। अब उनका तीसरा जन्‍म हुआ। इस जन्‍म में वे क्षत्रिय कुल में उत्‍पन्‍न हुए हैं। उनका नाम शिशुपाल और दन्‍तवक्र है। वे इस युग में भी बलवान हैं। उन दोनों के वध के लिये साक्षात परिपूर्णतम भगवान असंख्‍य-ब्रह्मण्‍डपति परात्‍पर गोलोकनाथ श्री कृष्ण यदुकुल में अवतीर्ण हुए हैं। वे यादवेन्‍द्र बहुत-सी लीलाएं करते हुए इस समय द्वारका में विराजमान हैं। युधिष्ठिर के महायज्ञ में शाल्‍व के साथ होने वाले युद्ध में माधव शिशुपाल और दन्‍तवक्र का वध कर डालेंगे, इसमे संशय नहीं है। उन्‍हीं के पुत्र शम्‍बरसूदन प्रद्युम्न दिग्विजय के लिये निकले हैं।

वे जम्‍बूद्वीव के समस्‍त राजाओं पर विजय प्राप्‍त करेंगे। उन सबके जीत लिये आने पर यदुकुल-तिलक भोजराज उग्रसेन द्वारा राजसूयज्ञ करेंगे। उन्‍हीं धनुष से बलपूर्वक छूट हुआ यह प्रचंड वेगशाली बाण यहाँ आया है। इस पर उनके नाम चिन्‍ह है। यह विद्युत की गड़गड़ाहट से भी अधिक आवाज करने वाला है। राक्षसराज ! सह बाण समस्‍त दिङमण्‍डल को उद्भासित करता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा करता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा है। 

नारदजी कहते हैं- नरेश्‍वर ! राक्षसों के सरदार श्रीरामभक्‍त विभीषण ने यह जानकर कि भगवान श्रीकृष्‍ण साक्षात श्रीरामचन्‍द्रजी ही है, भेंट-सामग्री लेकर प्रद्युम्न की सेना के पास गये। उस समय शीघ्र ही आकाश से उतरकर मेघ के समान श्‍यामकान्ति से प्रकाशित होने वाले विशालकाय विजयदर्शी विभीषण श्रीकृष्‍णकुमार प्रद्युम्न की परिक्रमा करके हाथ जोड़ उनके सामने खडे़ हो गये ।

विभीषण बोले- प्रभो ! आप साक्षात भगवान वासुदेव तथा सबके स्‍त्रष्‍टा हैं, आपको नमस्‍कार है। आप ही संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध हैं आपको प्रणाम है। मत्‍स्‍य, कूर्म और वराहावतार धारण करने वाले आप परमेश्‍वर को बारंबार नमस्‍कार है। श्रीरामचन्द्र को नमस्कार है। भृगुकुलभूषण परशुरामजी को बारंबार नमस्कार है। आप भगवान वामन को नमस्‍कार है। आप ही साक्षात नरसिंह है, आपको बारंबार नमस्‍कार है। आप शुद्ध-बुद्धदेव को नमस्‍कार है। सबकी पीड़ा हर लेने वाले कल्किरूप आप भगवान को मेरा नमस्‍कार है¹।

नारद जी कहते हैं –राजन ! यों कहकर दूसरे को मान देने वाले विभीषण ने श्रीहरि के पुत्र प्रद्युम्न का बडे़ भक्ति भाव से सोलह उपचारों द्वारा पूजन किया। उस समय उनकी वाणी गद्गद हो रही थी। फिर परम संतुष्‍ट हुए प्रद्युम्न ने उनको वैराग्‍यपूर्ण ज्ञान, शान्तिदायिनी भक्ति तथा प्रेमलक्षणा परानुरक्ति प्रदान की। साथ ही ब्रह्माजी की दी हुई परम दिव्‍य पद्यराग निर्मित मस्‍तक मणि तथा पुलस्‍त्‍य पौत्र कुबेर द्वारा पूर्वकाल में दी हुई रत्‍नों की दीप्तिमती माला प्रदान की। फिर चन्‍द्रमा की दी हुई चन्‍द्रकान्‍त मणि तथा उत्तम पीताम्‍बर परम प्रभु प्रद्युम्न ने उन्‍हें अर्पित किये। तदनन्‍तर महाबली राक्षसराज विभीषण प्रद्युम्न को प्रणाम करके उन्‍हें भेंट देकर अपने पार्षदगणों के साथ लंकापुरी को लौट गये ।

¹नमो भगवते तुभ्‍यं वासुदेवाय वेधसे। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नम: संकर्षणाय च ।। नमो मत्‍स्‍याय कूर्माय वराहाय नमो नम:। नम: श्रीरामचन्‍द्राय भार्गवाय नमो नम: ।। वामनाय नमस्‍तुभ्‍यं नृसिंहाय नमो नम:। नमो बुद्धाय शुद्धाय कल्‍कये चार्तिहारिणे ।।गर्ग0 विश्‍वजित0 13। 48-50

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्‍वजित खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘शाल्‍व, मल्‍लार एवं लंका पर विजय’ नामक तेरहवां अध्‍याय पूरा हुआ ।

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