07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 14 || सह्यपर्वत के निकट दत्तात्रेय का दर्शन और उपदेश तथा महेन्द्र पर्वत पर परशुरामजी के द्वारा यादव सेना का सत्कार और श्रेष्ठ भक्त के स्वरूप का निरूपण
प्रद्युम्न ने कहा- यह हृष्ट–पुष्ट शरीरवाला कौन पुरुष बालक, उन्मत और पिशाच की भाँति भागा आ रहा है ? यह लोगों से तिरस्कृत होने पर भी हँसता है और अत्यन्त आनन्दित है।
उद्धव बोले- ये परमहंस अवधूत श्रीहरि के कलावतार साक्षात महामुनि दत्तात्रेय हैं, जो सदा आनन्दमय देखे जाते हैं। इन्ही के प्रसाद से पूर्ववर्ती उत्कृष्ट नरेश सहस्त्रार्जुन आदि तथा यदु एवं प्रहलाद आदि ने परम सिद्धि प्राप्त की है।
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! यह सुनकर यदुकुल-तिलक प्रद्युम्न ने मुनि की पूजा और वन्दना करके दिव्य आसन पर बिठाकर उनसे प्रश्न किया ।
प्रद्युम्न बोले- भगवन् ! मेरे हृदय में एक संदेह है, प्रभो ! उसका नाश कीजिये। जगत का स्वरूप क्या है, ब्रह्म के मार्ग कौन हैं तथा तत्व क्या हैं ? यह सब ठीक-ठीक बताइये ।
दत्तात्रेय ने कहा- जब तक अन्धकार के कारण वस्तु दिखायी नहीं देती, तभी तक उल्का या मशाल की आवश्यकता होती है।
जब महानन्द वश में हो जाय, तब उल्का का क्या प्रयोजन है। साधों ! जगत तभी तक टिका रहता है, जब तक तत्व का ज्ञान नहीं होता। परब्रह्म परमात्मा के ज्ञात या प्राप्त हो जाने पर जगत का क्या प्रयोजन है। जैसे मुख का प्रतिबिम्ब दर्पण में दिखायी देता है, परंतु वास्तविक शरीर उससे भिन्न है, उसी प्रकार प्रधान अर्थात प्रकृति में प्रतिबिम्ब चैतन्य जीव है, परंतु ज्ञान के आलोक में वह परात्पर परमात्मा सिद्ध होता है। जैसे सूर्योंदय होने पर सारी वस्तुएं नेत्र से दिखायी देती हैं। उसी प्रकार ज्ञानोदय होने पर ब्रह्मतत्व का साक्षात्कार होता है। फिर जीव कहीं नहीं दृष्टिगोचर होता है।
नारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार उपेदश सुनकर यादवराज प्रद्युम्न ने उनको नमस्कार किया और सेना के साथ वे द्रविड़ देश में वैकुण्ठाचल के पास गये। द्रविड़ देश के स्वामी धर्मतत्वज्ञ राजर्षि सत्यवाक ने बड़ी भक्ति से प्रद्युम्न का आदर-सत्कार किया। फिर श्रीशैल का दर्शन करके वहाँ के अद्भुत शिवालय तथा स्कन्दस्वामी का दर्शन प्राप्त कर वे पम्पा-सरोवर गये। तदनन्तर श्रीद्वारकानाथ प्रद्युम्न गोदावरी ओर भीमरथी आदि भगवत तीर्थों का दर्शन करते हुए महेन्द्राचल पर गये। उस पर्वत पर क्षत्रियों का अन्त करने वाले भृगवंशी परशुरामजी विराजमान थे। उन्हें नमस्कार और उनकी परिक्रमा करके श्री कृष्ण नंदन वहाँ खडे़ हो राजेंद्र !
परशुराम जी ने उन्हें आशीर्वाद देकर यादवों की चतुरंगिणी सेना का योगशक्ति से सत्कार किया। दाल, भात, चटनी, दही में भिगोयी हुई भाजी की पकोड़ियां, सिखरन, अवलेह (सिरका या अचार), पालक का साग, इक्षुभिक्षि (राब और चीनी का बना हुआ भोज्य पदार्थ विशेष), शक्कर के मेल से बना हुआ त्रिकोणाकार मिष्टान्न (गुझिया, समोसा आदि), बड़ा, मधुशीर्षक (मधुपर्क या घेवर आदि मिष्टान्न-विशेष) फेणिका (फेनी), उपरिष्ट (पुडीया पूआ आदि), छिद्रयुक्त शतपत्र (एक प्रकार की मिठाई), चक्राभचिह्निका (चक्राकार चिह्नवाली मिठाई, इमिरती आदि), सुधाकुण्डलिका (जलेबी), घृतपूर (घी की बनी हुई पूडी), वायुपूर (मालपूआ), चन्द्रकला, दधिस्थूली (दही में भीगकर फूली हुई बड़ी), कपूर से वासित खांड की बनी मिठाई , गोधूमपरिखा (खाजा), इनके साथ सुन्दर-सुन्दर फल, उत्तम दधि, मोदक शाक-सौधान (विविध शाकों के समुदाय), मण्ड (दूध की मलाई या झाग), खीर, दही, गाय का घी, ताजा मक्खन, मण्डूरी (सपग का रसा), कुम्हड़ा, पापड़, शक्ति का (शक्तिवर्धक पेय, द्राक्षासव आदि) लस्सी, सुवीराम्ल, (खट्टी कॉजी), सुधारस (शहद या मीठा शर्बत) उत्तमोत्तम फल, मिश्री, नाना प्रकार के फल, मोहनभाग (हलुआ), नमकीन पदार्थ, कसैले, मीठे, तीखे, कड़वे और खट्टे अनेक प्रकारके भोज्य पदार्थों इन सबको छप्पन भोग कहा गया है।
भृगुकुल-भूषण परशुराम जी ने अपने योगबल से इन सब पदार्थों के पर्वत जैसे ढेर लगा दिये। सारी सेना भोजन कर चुकी, तब भी वहाँ वे खाद्य पदार्थों के पर्वत हाथ भर भी छोटे नहीं हुए। परशुरामजी का यह वैभव देखकर सब लोग अत्यन्त आश्चर्य चकित हो गये। राजन् ! यादवों सहित श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न ने उस समय परशुरामजी को नमस्कार करके सबके सामने इस प्रकार पूछा ।
प्रद्युम्न बोले- भगवन्! अपने हम सब लोगों को अत्यन्त उत्तम भोजन प्रदान किया। प्रभो ! सारी समृद्धियां और सिद्धियां आपके चरणों में लोटती हैं। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि समस्त हरि भक्तों में श्रीहरि का प्रिय भक्त कौन है ? विप्रेन्द ! यह मुझे बताइये क्योंकि आप परावरवेत्ताओं में सबसे श्रेष्ठ है।
परशुरामजी ने कहा- प्रभो ! आप क्या नहीं जानते, तो भी साधारण लोगों की भाँति पूछते हैं। लोगों को शिक्षा देने के लिये ही आप इस तरह सत्संग करते हुए भूतल पर विचरते हैं। जो अकिंचन है।
जिसके पास कोई संग्रह परिग्रह नहीं है, जो केवल श्रीहरि के चरणारविन्दों के पराग पर ही लुब्ध है, श्रीहरि की सुन्दर कथा के श्रवण कीर्तन में ही तत्पर रहता है तथा जिसका चित्त भगवान के रूप सिन्धु की लहरों में ही डूबा रहता है, वही श्री कृष्ण चंद्र का प्रिय भक्त कहा गया है। परमेश्वर ! जिस महापुरुष ने अपने मन और इन्द्रियों को वश में कर रखा है, जो समस्त जंगम प्राणियों के प्रति स्नेह एवं दया का भाव रखता है, जो शान्त, सहनशील, अत्यन्त कारुणिक सबका सुहृद एवं सत्पुरुष है, वही भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का प्रिय भक्त कहा गया है।
वह अपने चरणों की धूलि से सम्पूर्ण जगत को पवित्र करता है। जो निरन्तर परमेश्वर श्रीहरि के चरणों की धूलि का आश्रय ले, सम्पूर्ण ब्रह्मपद, इन्द्रपद, चक्रवर्ती सम्राट के पद रसातल के आधिपत्य, योगसिद्धि और मोक्ष की कभी भी इच्छा नहीं करता, वही भगवान का श्रेष्ठ भक्त है। जो अकिंचन है, जिसको अपने किये हुए कर्मों के फल से विरक्ति है तथा जो श्रीहरि की चरणरज में ही आसक्त हैं, वे महामुनि भगवदीय भक्तजन ही भगवान के उस परमपद का सेवन करते हैं।
अन्य लोग उस नैरपेक्ष्य सुख का अनुभव नहीं कर पाते। भगवान पुरुषोत्तम को अपने भक्त से बढ़कर प्रिय कोई नहीं जान पड़ता। न शिव, न ब्रह्मा, न लक्ष्मी और न रोहिणीनन्दन बलरामजी ही उन्हें भक्त से अधिक प्रिय हैं। भक्तों ने उनके मन को बांध रखा है, अत: सकल लोकजनों के चूड़ामणि भगवान श्री कृष्ण सदा भक्तों के पीछे-पीछे चलते है। अपने भक्तजनों के पीछे चलते हुए भगवान परमात्मा श्रीकृष्ण उनके प्रति अपनी रुचि- अपना अनुराग सूचित करते हैं और समस्त लोको को पवित्र करते हैं। इसीलिये भगवान मुकुन्द अतिशय भजन करने वाले लोगों को मोक्ष तो दे देते हैं, परंतु उत्तम भक्तियोग कदापि नहीं देते ¹।
श्री नारद जी कहते हैं- राजन! यह उपदेश सुनकर यादवेन्द्र प्रद्युम्न ने श्रीभार्गव कुलभूषण परशुरामजी को नमस्कार किया और वहाँ से पूर्व दिशा में विद्यमान गंगासागर-संगम की ओर प्रस्थान किया ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘द्रविड़ देश पर विजय’ नामक चौदहवां अध्याय पूरा हुआ ।
¹निष्किंचनो हरिपदाब्जपरागलुब्ध: श्रीमत्कथाश्रवणकीर्तनतत्परो य:। तदरूपसिन्धुलहरीविनिमग्न चित्त: श्रीकृष्णचन्द्रदयित: कथित: स भक्त: ।।
दान्तो महानखिलजंगमवत्सलोऽयं शान्तस्तितिक्षुरतिकारूणिक: सुहृत्सत्। लोकं पुनाति निजपादरजोभिरारात् श्रीकृष्णचन्द्रदयित: कथित: परेश: ।।य: पारमेष्ठ्यमखिलं न महेन्द्रधिष्ण्यं नो सार्वभौममनिशं न रसाधिपत्यम्। नो योगसिद्धिमपि नो नपुनर्भवं वा वाञ्छत्यलं परमपादरज: स भक्त: ।।
निष्किंचना: स्वकृतकर्मफलैर्विरागा यत्तत्पदं हरिजना मुनयो महान्त:। भक्ता जुषन्ति हरिपादरज: प्रसक्ता अन्ये विदन्ति न सुखं किल नैरपेक्ष्यम् ।।
भक्तात्प्रियो न विदित: पुरुषोत्तमस्य शम्भुर्विधिर्न च रमा न च रौहिणेय:। भक्ताननुव्रजति भक्तनिवद्धचित्तश्चुडामणि: सकललोकजनस्य कृष्ण।।
गच्छन्निजं जनमनु प्रपुनाति लोकानावेदयन् हरिजने स्वरुचिं महात्मा। तस्मादतीव भजतां भगवान मुकुन्दो मुक्तिं ददाति न कदापि सुभक्तियोगम् ।।गर्ग0 विश्वजित0 14। 34-39
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