07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 24 || यादव सेना और यक्ष सेना का घोर युद्ध
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 24 || यादव सेना और यक्ष सेना का घोर युद्ध
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन! अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा से वहाँ अन्धकार छा जाने पर महाबली मणिग्रीव ने बाणों द्वारा वैरीवाहिनी का उसी प्रकार विध्वंस आरम्भ किया, जैसे कोई कटुवचनों द्वारा मित्रता का नाश करे। मणिग्रीव के बाण-समूहों से क्षत विक्षत हो, हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक आंधी के उखाडे़ हुए वृक्षों की भाँति धराशायी होने लगे। उस समय श्री कृष्ण और सत्यभामा के बलवान पुत्र चन्द्रभानु ने पांच बाण मारकर मणिग्रीव के कोदण्ड को खण्डित कर किया तथा दस बाणों से उसके रथ का छेदन करके बलवान चन्द्रभानु घन के समान गर्जना करने लगे। यह देख मणिग्रीव ने भी चन्द्रभानु पर अपनी शक्ति चलायी। मैथिल ! वह शक्ति सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित करती हुई बड़ी भारी उल्का के समान गिरी, परंतु चन्द्रभानु ने खेल सा करते हुए उसे बांयें हाथ से पकड़ लिया। उन्होंने उसी शक्ति के समारांगण में महाबली मणिग्रीव को घायल कर किया।
तत्पश्चात महाबली चन्द्रभानु उस रणभूमि में पुन: गर्जना करने लगे। उस प्रहार से मणिग्रीव मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। तब नलकूबर की प्रेरणा से असुरों ने बाणों का जाल-सा बिछाकर चन्द्रभानु को उसी प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे बादल वर्षाकाल के सूर्य को ढक देते हैं । तब श्रीकृष्णपुत्र दीप्तिमान खड्ग हाथ में लेकर बडे़ वेग से यक्षों की सेना में इस प्रकार घुस गये मानो सूर्य ने कुहासे के भीतर प्रवेश किया हो। उनके खड्ग प्रहार से कितने ही यक्षों के दो-दो टुकड़े हो गये कितने ही मस्तक, पैर, कंधे, बाहें, हाथ, कान और ओठ छिन्न-भिन्न हो जाने के कारण युद्ध में पृथ्वी पर गिर पडे़।
किरीट, कुण्डल और शिरस्त्राणों सहित उनके कटे हुए बीभत्स मस्तक रक्त की धारा बहा रहे थे। और उनसे ढकी हुई रणभूमि महामारी सी जान पड़ती थी। मरने से बचे हुए घायल यक्ष भय से विह्वल होकर भाग गये। मिथिलेश्वर ! उस समय यक्ष-सैनिकों में हाहाकार मच गया ।तब कवचधारी नलकूबर धनुष की टंकार करते हुए बहुत ऊँची पताका वाले रथ पर आरुढ़ हो वहाँ आ पहुँचे और ‘डरो मत’- यों कहकर अपने सैनिकों को अभयदान देने लगे। नलकूबर ने पांच बाणों से कृतवर्मा पर, दस बाणों से अर्जुन पर और बीस बाणों से दीप्तिमान पर प्रहार किया।
राजन ! तब महाबाहु कृतवर्मा ने अपने सिंहनाद से सम्पूर्ण दिशाओं को निनादित करते हुए पांच विशिखों द्वारा नलकूबर को करारी चोट पहुँचायी। वे बाण नलकूबर का कवच फाड़कर शरीर को छेदते हुए सबके देखते–देखते धरातल में उसी प्रकार समा गये, जैसे सर्प बाँबी में घुस जाते हैं। कृतवर्मा के बाण से अंग विदीर्ण हो जाने के कारण नलकूबर को मूर्च्छित हुआ देख सारथि हेममाली उन्हें रणभूमि से दूर हटा ले गया। घण्टानाद और पार्श्वमौलि, कुबेर के ये दोनों मन्त्री अपने बाण-समूहों से यादवों की उद्भट सेना को घायल करने लगे। गृध्रपक्ष से युक्त सुनहले पंख और तीखे मुख वाले, मन के समान वेगशाली उन दोनों के बाण सूर्य की किरणों के समान सम्पूर्ण दिशाओं को उदासित कर रहे थे ।
तदनन्तर महावीर अर्जुन ने उन मन्त्रियों के बाणों के उत्तर में बहुत-से बाण चलाना आरम्भ किया। दोनों ओर चलने वाले बाणों के संघर्ष युद्धभूमि में हजारों विस्फुलिंग (अग्निकण) प्रकट होने लगे। नरेश्वर ! आकाश में खद्योतों की भाँति चमकने वाले वे चंचल विस्फुलिंग अलात-चक्र की भाँति शोभा पाने लगे। रण-दुर्मद वीर गाण्डीवधारी अर्जुन ने गाण्डीव धनुष से छूट हुए विशिखों द्वारा उस समस्त बाण-समूह को क्षणमात्र में काट गिराया। उन्होंने बाणों के समुदाय से दो योजन के घेरे में पिंजरा-सा बना दिया और बलपूर्वक अंदर कर लिया। वे दोनों मारे गये- यह जानकर समस्त पुण्यजन तत्काल युद्ध छोड़कर हाहाकर करते हुए भाग चले। उसी समय करोड़ों भूतवृन्द युद्धभूमि में आ गये।
राजन ! कोटि-कोटि डाकिनियां रणभूमि में हाथियों को उठा-उठाकर फेंकने लगीं। मनुष्यों, घोड़ों तथा रथियों को पृथक-पृथक मुंह में डालकर चबाने लगें। साथ दस भूत दौड़ते दिखायी देते थे। प्रमथ गणों ने खट्वांग से बारंबार लोगों को मारा और गिराया। यातुधानियां रणमण्डल में नरमुण्डों को चबा रही थीं। वेतालगण खप्पर में बहुत-सा रक्त ले-लेकर पी रहे थे, विनायक नाचते और प्रेत गाते थे। कूष्माण्ड और उन्माद उस युद्ध भूमि में गिरे हुए मस्तकों का संग्रह करते थे। स्वर्गगामी वीरों के मस्तकों का उनके द्वारा किया जाने वाला वह संग्रह भगवान शिव की मुण्डमाला बनाने के लिये थे। मातृगण, ब्रह्मराक्षस और भैरव उस युद्ध में कटकर गिरे हुए मस्तकों को गेंद की तरह बारंबार उछालते-फेंकते हुए हँसते, खिलखिलाते और अट्टहास करते थे। विकाराल मुख वाले पिशाच बुरी तरह कूद-फांद रहे थे।
पिशाचिनियाँ युद्ध में बच्चों को गरम-गरम रक्त पिलाती थीं और बच्चों को आश्वासन देते हुए कहती थीं- बेटा ! मत रोओ। हम तुम्हें इन लोगों की आँखे भी निकाल-निकालकर देंगी ।इस प्रकार भूतगणों का बल बढ़ाता देख बलदेव के छोटे भाई बलवान गद हाथ में गदा लेकर मेघों के समान गर्जना करने लगे। लाख भार की उस मौर्वी गदा से गदने उस विशाल भूत-सेना को उसी प्रकार मार गिराया, जैसे इन्द्र वज्र से पर्वतों को धराशायी कर देते हैं। गदा की मार से मस्तक फट जाने के कारण बहुत-से कूष्माण्ड, उन्माद, वेताल, पिशाच और ब्रह्मराक्षस मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पडे़। गद ने समरांगण मे डाकिनियों के दांत तोड़ डाले, प्रमथों के कंधे विदीर्ण कर दिये और यातुधानों के मुख छिन्न-भिन्न कर डाले।
राजन ! गदा से रौंदे गये प्रेत दसों दिशाओं में उसी तरह भाग चले, जैस प्रलयकाल के समुद्र में भगवान वाराह की दाढ़ से अंग-भंग होने के कारण दैत्य पलायन कर गये थे ।भूतगणों के भाग जाने पर वीरभ्रद सामने आया। उस बलवान भूतनाथ ने बलदेव के छोट भाई गद को गदा से मारा। गद ने उसकी गदा को अपनी गदा पर रोक लिया और फिर अपनी गदा उसके ऊपर चलायी। मैथिलश्वर ! वीरभद्र और गद में बड़ा भयंकर गदायुद्ध हुआ। वे दोनों ही गदाएँ आग की चिनगारियाँ छोड़ती हुई परस्पर टकराकर चूर-चूर हो गयीं। फिर एक-दूसरे को ललकारते हुए उन दोनों मे मल्लयुद्ध छिड़ गया। वे भुजाओं, घुटनों और पैरों के आघात से पर्वतों को गिराते हुए लड़ने लगे।
वीरभद्र ने बलपूर्वक करवीर पर्वत को उखाड़कर अटृहास करते हुए उसको गद के ऊपर फेंका। गद ने उस पर्वत को पकड़ लिया और फिर उसी के ऊपर उसे दे मारा। तब बलवान वीरभद्र ने वीरवर गद को पकड़कर बडे़ वेग से आकाश में लाख योजन दूर फेंक दिया। वहाँ से भूमि पर गिरने पर गद ने वीरभद्र को भी उठा लिया और वेग से घुमाकर शीघ्र ही उसे भी लाख योजना दूर फेंक दिया। वीरभद्र कैलास पर्वतों शिखर पर गिरा। गदा के प्रहार से तो वह पीड़ित था ही, अत: घड़ी तक मूर्च्छा में पड़ा रहा । तदनन्तर शक्ति उठाये स्वामी कार्तिकेय बडे़ वेग से युद्धभूमि में पहुँचे। उन्होंने अनिरुद्ध और साम्ब को लक्ष्य करके शीघ्र ही अपनी शक्ति चलायी।
अनिरुद्ध के रथ का भेदन कर, साम्ब को घायल करके, उनके रथ को भी तोड़ती हुई वह शक्त उस युद्धभूमि में सहस्त्रों हाथियों, रथों और लाखों वीरों को मारकर दसों दिशाओं में चमकती और कड़कती हुई बिजली की तरह फुफकारती सर्पिणी के समान भूमि में समा गयी। तब क्रोध से भरे महाबाहु जाम्बवती कुमार साम्ब ने प्रत्यंचा का घोष करते हुए तरकस से एक बाण के लाख रूप हो गये और लक्ष्यों तक पहुँचते-पहुँचते उसने कोटि रूप धारण कर लिये। इस प्रकार उस अनेक रूपधारी विशिख ने शिखी और शिखिवाहन स्वामि कार्तिकेय को घायल करके समरांगण में कोटि-कोटि वीरों को विदीर्ण कर डाला ।
कार्तिकेय के क्षत-विक्षत होने और कुछ व्याकुल चित हो जाने पर चूहे पर चढे हए गणेश्वर गजानन वहाँ आ पहुँचे। उनके कुम्भस्थल पर गोमूत्र, सिन्दूर और कस्तूरी के द्वारा विचित्र पत्र-रचना की गयी थी। उनका सुन्दर वक्रतुण्ड कुमकुम से आलिप्त था। सिन्दूरपूर्ण कपोलों के कारण उनकी बड़ी मनोहर आभा दिखायी देती थी। कानों का उज्ज्वल वर्ण मानों कपूर की धूल से धवलित किया गया था। उनके कपोलों पर बहती हुई मदधारा से जिनके अंग विह्वल हो रहे थे, वे मतवाले भ्रमर उनके चंचल कर्णतालों से आहत हो, गुंजारव करते हुए मानो संगीत, ताल और वासन्तिक राग की सृष्टि कर रहे थे। उन मधुपों से सेवित भाल-चन्द्रधारी गणपति अनुपम शोभा पा रहे थे। उनकी अंग-कान्ति बाल रवि के समान अरुणोज्ज्वल थी। उनकी अंग-कान्ति बालरवि के समान अरुणोज्ज्वल थी। उनकी बांहों में निर्मल अंगद, गले में हेमनिर्मित हार और हंसुली थी तथा मस्तक पर धारण किये हुए मुकुट की किरणों के द्वारा वे सब ओर से दीप्तिमान दिखायी देते थे वे चूहे पर विराजमान थे। उनके मुख में एक ही दांत था।
गजाकार भव्य मूर्ति शोभा पा रही थी। उन्होंने हाथों में पाश, अंकुश, कमल और कुठार-समूह धारण कर रखे थे। उनका कद ऊंचा था उनके चार भुजाएं थीं। वे घोर संग्राम में प्रवृत्त थे। किन्हीं शस्त्रधारियों को सूंड़ में लपेटकर अपने अंकुश की मार से उनका कचूमर निकाल देते थे। अनेक धारवाले फरसे से समस्त शस्त्रधारियों का संहार करते हुए वे श्री परशुराम जी के समान जान पड़ते थे। पैदल वीरों, हाथियों, घोड़ों तथा रथ-समूहों से युक्त चतुरंगिणी सेना को धराशायी करके रथ सहित साम्ब को पकड़कर, वे युद्धस्थल से दूर फेंक रहे थे। उन्हें देखकर यादवगणों सहित प्रद्युम्न के मन में बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने अपने परम बुद्धिमान पुत्र अनिरुद्ध से यह उत्तम बात कही ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता विश्वजित खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘यक्ष युद्ध का वर्णन’ नामक चौबीसवां अध्याय पूरा हुआ ।
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