07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 32 || भद्राश्व वर्ष में भद्रश्रवा के द्वारा प्रद्युम्न का पूजन तथा स्‍तवन; यादव-सेना की चन्‍द्रावती पुरी पर चढ़ाई; श्री कृष्‍ण कुमार वृक के द्वारा हिरण्‍याक्ष-पुत्र हृष्‍ट का वध

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 32 || भद्राश्व वर्ष में भद्रश्रवा के द्वारा प्रद्युम्न का पूजन तथा स्‍तवन; यादव-सेना की चन्‍द्रावती पुरी पर चढ़ाई; श्री कृष्‍ण कुमार वृक के द्वारा हिरण्‍याक्ष-पुत्र हृष्‍ट का वध


श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! तदनन्‍तर महाबाहु श्रीकृष्‍ण कुमार प्रद्युम्न केतुमाल वर्ष पर विजय पाकर, धनुष धारण किये, योग समृद्धियों से युक्त ‘भद्राश्व वर्ष’ में गये, जिसकी सीमा का पर्वत साक्षात ‘गन्‍धमादन’ बड़ी शोभा पाता है, जहाँ से पापनाशिनी गंगा ‘सीता’ नाम से प्रवाहित होती हैं। वहाँ सर्व पापनाशक ‘वेद क्षैत्र’ नामक महातीर्थ है, जहाँ महाबाहु हयग्रीव हरि का निवास है। धर्म पुत्र भद्रश्रवा उनकी सेवा करते हैं। सीता-गंगा के पुलिन पर महात्‍मा प्रद्युम्न की सेना के शिविर पड़ गये, जो सुनहरे वस्‍त्रों के कारण बड़े मनोहर जान पड़ते थे। भद्राश्व देश के अधिपति धर्मपुत्र महाबली महात्‍मा भद्रश्रवा ने भक्ति भाव से परिक्रमा करके श्रीकृष्‍ण कुमार को प्रणाम किया और उन्‍हें भेंट अर्पित की। फिर वे उनसे बोले।

भद्रश्रवा ने कहा- प्रभो ! आप साक्षात पूर्ण परिपूर्णतम भगवान हैं। साधु पुरुषों की रक्षा के निमित्त ही दिग्विजय के लिये निकले हैं। भगवन् ! आप ने पूर्व काल में शम्‍बर नामक दैत्‍य को परास्‍त किया था। उसका छोटा भाई उत्‍कच बड़ा दुष्‍ट था, जो गोकुल में छकड़े पर जा बैठा था। वह भगवान श्रीकृष्‍णचन्‍द्र के द्वारा मारा गया; परंतु उसका बड़ा भाई महादुष्‍ट बलवान शकुनि अभी जीवित है। देव ! वह आप से ही परास्‍त होने योग्‍य है, दूसरा कोई कदापि उसे जीत नहीं सकता।

प्रद्युम्न ने पूछा- धर्मनन्‍दन ! दैत्‍यराज शकुनि किसके वंश में उत्‍पन्न हुआ हैं, उसका निवास किस नगर में है और उसका बल क्‍या है- यह बताइये।
 
भद्रश्रवा ने कहा- भगवन् ! कश्‍यप मुनि के द्वारा दिति के गर्भ से दो आदि दैत्‍य उत्‍पन्न हुए, जिसमें बड़े का नाम हिरण्‍यकशिपु और छोटे का नाम हिरण्‍याक्ष था। हिरण्‍याक्ष के भी नौ पुत्र हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं- शकुनि, शम्‍बर हष्‍ट, भूत-संतापन, वृक, कालनाभ, महानाभ, हरिश्‍मश्रु तथा उत्‍कच। देव कूट से दक्षिण दिशा में जठरगिरि की तराई में चन्‍द्रावती नामक पुरी है, जो दैत्‍यों के दुर्ग से सुशोभित है। वहाँ छ: भाइयों से घिरा हुआ शकुनि निवास करता है। वहाँ छ: भाइयों से घिरा हुआ शकुनि निवास करता हैं, तब-तब वह उनके इन्‍द्र आदि देवता भी उद्विग्न हो उठे हैं। देव ! वह देवद्रोही दैत्‍यराज आप से ही जीते जाने योग्‍य है; क्‍योंकि आपने भक्तों की शान्ति के लिये सम्‍पूर्ण जगत को जीता है। आप भगवान प्रद्युम्न को नमस्‍कार है। चतुर्व्‍यूह रूप आपको प्रणाम है। गौ, ब्राह्मण, देवता, साधु तथा वेदों के प्रतिपालक है। आपको नमस्‍कार है।

नारदजी कहते हैं- राजन् इस प्रकार प्रार्थना करने पर साक्षात भगवान प्रद्युम्न हरि ने राजा भद्रश्रवा को ‘डरिये मत’ यों कहकर अभयदान दिया। तदनन्‍तर महाबाहु प्रद्युम्न ने अपनी सेना के साथ चद्रावतीपुरी में पहुँचने के लिये वहाँ से तत्‍काल प्रस्‍थान किया। शकुनि को मेरे मुँह से यह समाचार मिल गया कि ‘तुम्‍हें मारने के लिये यदुकुल तिलक प्रद्युम्न आ रहे हैं। यह सुनकर उस दैत्‍यराज ने दैत्‍यों की सभा में शूल उठाकर कहा।

शकुनि बोला- बड़े सौभाग्‍य और प्रसन्नता की बात है कि मेरा शत्रु प्रद्युम्न स्‍वयं यहाँ आ रहा है। दैत्‍यों ! मुझे उस परास्‍त करना है; क्‍योंकि मुझ पर मेरे भाई का ऋण पहले से ही चढ़ा हुआ है। जिसने पूर्व काल में यादवों सहित उस प्रद्युम्न को मार डालूँगा। इसलिये असुरों ! तुम लोग जाओ प्रद्युम्न को मार डालूँगा। इसलिये असुरों ! तुम लोग जाओ और उसकी सेना का विध्‍वंस करो। तत्‍पश्चात् मैं उसका, देवराज इंद्र का और देवताओं का भी वध करूँगा।

नारद जी कहते हैं- राजन् ! शकुनी की आवाज सुनकर महाबली दैत्‍य हृष्‍ट एक करोड़ दैत्‍यों की सेना साथ लिये यादव-सेना के सम्‍मुख युद्ध के लिये आया। लीला से ही मानव-शरीर धारण करने वाले भगवान प्रद्युम्न ने अपनी सम्‍पूर्ण सेना का गृधव्‍यूह बनाया, अर्थात् गृध्र की आकृति में अपनी सेना को खड़ा किया। गृधव्‍यूह में चोंच के स्‍थान पर धनुर्धर शिरोमणि अनिरुद्ध खड़े हुए, ग्रीवा-भाग में अर्जुन तथा पृष्‍ठ भाग में जाम्‍बवती कुमार साम्‍ब विराजमान हुए। राजन् ! दोनों पैरों की जगह दीप्तिमान् और गद खड़े हुए, उदर भाग में पार्षिण और पुच्‍छ भाग में श्रीकृष्‍ण कुमार भानु थे। नरेश्वर ! सीता गंगा के तट पर यादवों के साथ दैत्‍यों का उसी प्रकार घोर युद्ध हुआ, जैसे समुद्र समुद्रों से टकरा रहे हों। जैसे बादल जल की धारा बरसाते हैं, उसी प्रकार दानव यादवों बाण, त्रिशूल, मुसल, मुदर, तोमर तथा ऋष्टियों की वृष्टि करने लगे।

राजन् ! सेनाओं के पैरों से उड़ी हुई अपार धूल ने सूर्या और आकाश को आच्‍छांदित कर दिया। किसी को अपना बाण भी नहीं दिखायी देता था। जैसे वर्षा के बादल सूर्य को आच्‍छादित करके अन्‍धकार फैला देते हैं, वही दशा उस समय हुई थी। वृक, हर्ष, अनिल, गृध्र, वर्धन, अन्नाद, महाश, पावन, वहि और दसवें क्षुधि-मित्र वृन्‍दा के दस पुत्र दानवों के साथ युद्ध करने लगे। जब बाणों से अन्‍धकार छा गया, तब श्रीहरि कुमार वृक बारंबार धनुष की टंकार करते हुए सबसे आगे आ गये। वे बाण-समूहों से दैत्‍यों को विदीर्ण करने लगे, जैसे कोई कटूवचनों से मित्रता तो खण्डित करे। उन्‍होंने दैत्‍य-सेना के हाथियों, रथों और पैदल वीरों को धराशायी कर दिया। वे कवच और धनुष कट जाने के कारण समरांगड में गिर पड़े।

वृक के बाणों से जिनके पैर कट गये थे, वे आंधी के उखाड़े हुए वृक्षों की भाँति धरती पर गिर गये। किन्‍हीं के मुंह नीचे की ओर थे और किन्‍हीं के ऊपर की ओर। राजन् ! बाण समूहों से भुजाओं के छिन्न-भिन्न हो जाने के कारण वे रणभूमि में फूटे हुए बर्तनों के ढेर-से शोभित होते थे। उस रणमण्‍डल में हाथी बाणों की मार से दो टूक होकर पड़े थे और छुरी से काटे गये कूष्‍माण्‍ड के टुकड़ों के समान प्रतीत होते थे। इसी समय महाबली हृष्‍ट सिंह पर चढ़कर आया। उसने दस बाण मारकर वृक के कवच और धनुष की प्रत्‍यच्चा को काट डाला। फिर चार बाणों से चारों घोड़े, दो बाणों से सारथि और तीन बाणों से ध्‍वज खण्डित कर दिये। फिर बीस बाण मारकर उस दानवराज ने वृक के रथ को नष्‍ट कर दिया। धनुष कट गया, घोड़े और सारथि मार डाले गये, तब वृक दूसरे रथ पर जा चढ़े तथा रोष पूर्वक धनुष हाथ में लिया। इतने में ही असुर हष्‍ट ने वृक के उस धनुष को भी काट डाला। तब यादव पुंगव वृक ने गदा हाथ में लेकर सिंह के मस्‍तक पर तथा उसकी पीठ पर बैठे हुए दैत्‍य पर भी प्रहार किया। तब क्रोध से भरे हुए सिंह ने समरांगण में उछलकर अपने नखों, दाँतों और पंजों से अनेक योधाओं को मार गिराया। उसकी जीभ लपलपा रही थी, अयाल चमक रहे थे। उसने भीषण हुंकार करके वृक को उसी भाँति गिरा दिया, जैसे हाथी केले के तने को धराशायी कर दे।

नरेश्वर ! वृक ने उस सिंह को दोनों हाथों से पकड़कर पृथ्‍वी पर दे मारा। फिर वे उसके ऊपर चढ़कर वैसे ही गर्जने लगे, जैसे एक पहलवान दूसरे पहलवान को पटककर उसकी छाती पर चढ़ बैठै और गर्जने लगे। जब वह सिंह पुन: उछलने और उनके शरीर को बलपूर्वक चबाने लगा, तब बलवान मित्र वृन्‍दाकुमार ने उसके ऊपर एक मुक्का मारा। उनके मुक्के की मार से सिंह ने दम तोड़ दिया। तब कुपित हुए दैत्‍यप्रवर हृष्‍ट ने उनके ऊपर शीघ्र ही शूल फेंका। किंतु बड़ी भारी उल्‍का के समान तेजस्‍वी उस शूल को वृक ने तलवार से उसी प्रकार टूक-टूक कर दिया, जैसे गरुड़ अपनी तीखी चोंच के प्रहार से किसी सर्प के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। हृष्‍ट ने भी अपनी तलवार लेकर गर्जना की और भूतल को कंपाते हुए उसने महाबली वृक के मस्‍तक पर उसके द्वारा प्रहार किया। तब बलवान वृक ने तलवार की म्‍यान पर दैत्‍य के वार को रोका तथा अपने खड्ग के द्वारा दैत्‍य के कंधे पर चोट पहुँचायी। उस खड्ग से दैत्‍य का सिर कटकर पृथ्‍वी पर गिर पड़ा। किरीट और कुण्‍डलों से युक्त वह मस्‍तक गिरे हुए कमण्‍डलु के समान शोभा पाता था।। महाराज ! हृष्‍ट के मारे जाने पर शेष दैत्‍य भय से व्‍याकुल हो भागकर चन्‍द्रावतीपुरी को चले गये। उस समय देवताओं और मनुष्‍यों की दुन्‍दुभियाँ बज उठीं और देवता लोग वृक के ऊपर फूलों की वर्षा करने लगे।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में 'हृष्‍ट दैत्‍य का वध' नामक बत्तीसवां अध्‍याय पूरा हुआ।

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