07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 32 || भद्राश्व वर्ष में भद्रश्रवा के द्वारा प्रद्युम्न का पूजन तथा स्तवन; यादव-सेना की चन्द्रावती पुरी पर चढ़ाई; श्री कृष्ण कुमार वृक के द्वारा हिरण्याक्ष-पुत्र हृष्ट का वध
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 32 || भद्राश्व वर्ष में भद्रश्रवा के द्वारा प्रद्युम्न का पूजन तथा स्तवन; यादव-सेना की चन्द्रावती पुरी पर चढ़ाई; श्री कृष्ण कुमार वृक के द्वारा हिरण्याक्ष-पुत्र हृष्ट का वध
शकुनि बोला- बड़े सौभाग्य और प्रसन्नता की बात है कि मेरा शत्रु प्रद्युम्न स्वयं यहाँ आ रहा है। दैत्यों ! मुझे उस परास्त करना है; क्योंकि मुझ पर मेरे भाई का ऋण पहले से ही चढ़ा हुआ है। जिसने पूर्व काल में यादवों सहित उस प्रद्युम्न को मार डालूँगा। इसलिये असुरों ! तुम लोग जाओ प्रद्युम्न को मार डालूँगा। इसलिये असुरों ! तुम लोग जाओ और उसकी सेना का विध्वंस करो। तत्पश्चात् मैं उसका, देवराज इंद्र का और देवताओं का भी वध करूँगा।
नारद जी कहते हैं- राजन् ! शकुनी की आवाज सुनकर महाबली दैत्य हृष्ट एक करोड़ दैत्यों की सेना साथ लिये यादव-सेना के सम्मुख युद्ध के लिये आया। लीला से ही मानव-शरीर धारण करने वाले भगवान प्रद्युम्न ने अपनी सम्पूर्ण सेना का गृधव्यूह बनाया, अर्थात् गृध्र की आकृति में अपनी सेना को खड़ा किया। गृधव्यूह में चोंच के स्थान पर धनुर्धर शिरोमणि अनिरुद्ध खड़े हुए, ग्रीवा-भाग में अर्जुन तथा पृष्ठ भाग में जाम्बवती कुमार साम्ब विराजमान हुए। राजन् ! दोनों पैरों की जगह दीप्तिमान् और गद खड़े हुए, उदर भाग में पार्षिण और पुच्छ भाग में श्रीकृष्ण कुमार भानु थे। नरेश्वर ! सीता गंगा के तट पर यादवों के साथ दैत्यों का उसी प्रकार घोर युद्ध हुआ, जैसे समुद्र समुद्रों से टकरा रहे हों। जैसे बादल जल की धारा बरसाते हैं, उसी प्रकार दानव यादवों बाण, त्रिशूल, मुसल, मुदर, तोमर तथा ऋष्टियों की वृष्टि करने लगे।
राजन् ! सेनाओं के पैरों से उड़ी हुई अपार धूल ने सूर्या और आकाश को आच्छांदित कर दिया। किसी को अपना बाण भी नहीं दिखायी देता था। जैसे वर्षा के बादल सूर्य को आच्छादित करके अन्धकार फैला देते हैं, वही दशा उस समय हुई थी। वृक, हर्ष, अनिल, गृध्र, वर्धन, अन्नाद, महाश, पावन, वहि और दसवें क्षुधि-मित्र वृन्दा के दस पुत्र दानवों के साथ युद्ध करने लगे। जब बाणों से अन्धकार छा गया, तब श्रीहरि कुमार वृक बारंबार धनुष की टंकार करते हुए सबसे आगे आ गये। वे बाण-समूहों से दैत्यों को विदीर्ण करने लगे, जैसे कोई कटूवचनों से मित्रता तो खण्डित करे। उन्होंने दैत्य-सेना के हाथियों, रथों और पैदल वीरों को धराशायी कर दिया। वे कवच और धनुष कट जाने के कारण समरांगड में गिर पड़े।
वृक के बाणों से जिनके पैर कट गये थे, वे आंधी के उखाड़े हुए वृक्षों की भाँति धरती पर गिर गये। किन्हीं के मुंह नीचे की ओर थे और किन्हीं के ऊपर की ओर। राजन् ! बाण समूहों से भुजाओं के छिन्न-भिन्न हो जाने के कारण वे रणभूमि में फूटे हुए बर्तनों के ढेर-से शोभित होते थे। उस रणमण्डल में हाथी बाणों की मार से दो टूक होकर पड़े थे और छुरी से काटे गये कूष्माण्ड के टुकड़ों के समान प्रतीत होते थे। इसी समय महाबली हृष्ट सिंह पर चढ़कर आया। उसने दस बाण मारकर वृक के कवच और धनुष की प्रत्यच्चा को काट डाला। फिर चार बाणों से चारों घोड़े, दो बाणों से सारथि और तीन बाणों से ध्वज खण्डित कर दिये। फिर बीस बाण मारकर उस दानवराज ने वृक के रथ को नष्ट कर दिया। धनुष कट गया, घोड़े और सारथि मार डाले गये, तब वृक दूसरे रथ पर जा चढ़े तथा रोष पूर्वक धनुष हाथ में लिया। इतने में ही असुर हष्ट ने वृक के उस धनुष को भी काट डाला। तब यादव पुंगव वृक ने गदा हाथ में लेकर सिंह के मस्तक पर तथा उसकी पीठ पर बैठे हुए दैत्य पर भी प्रहार किया। तब क्रोध से भरे हुए सिंह ने समरांगण में उछलकर अपने नखों, दाँतों और पंजों से अनेक योधाओं को मार गिराया। उसकी जीभ लपलपा रही थी, अयाल चमक रहे थे। उसने भीषण हुंकार करके वृक को उसी भाँति गिरा दिया, जैसे हाथी केले के तने को धराशायी कर दे।
नरेश्वर ! वृक ने उस सिंह को दोनों हाथों से पकड़कर पृथ्वी पर दे मारा। फिर वे उसके ऊपर चढ़कर वैसे ही गर्जने लगे, जैसे एक पहलवान दूसरे पहलवान को पटककर उसकी छाती पर चढ़ बैठै और गर्जने लगे। जब वह सिंह पुन: उछलने और उनके शरीर को बलपूर्वक चबाने लगा, तब बलवान मित्र वृन्दाकुमार ने उसके ऊपर एक मुक्का मारा। उनके मुक्के की मार से सिंह ने दम तोड़ दिया। तब कुपित हुए दैत्यप्रवर हृष्ट ने उनके ऊपर शीघ्र ही शूल फेंका। किंतु बड़ी भारी उल्का के समान तेजस्वी उस शूल को वृक ने तलवार से उसी प्रकार टूक-टूक कर दिया, जैसे गरुड़ अपनी तीखी चोंच के प्रहार से किसी सर्प के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। हृष्ट ने भी अपनी तलवार लेकर गर्जना की और भूतल को कंपाते हुए उसने महाबली वृक के मस्तक पर उसके द्वारा प्रहार किया। तब बलवान वृक ने तलवार की म्यान पर दैत्य के वार को रोका तथा अपने खड्ग के द्वारा दैत्य के कंधे पर चोट पहुँचायी। उस खड्ग से दैत्य का सिर कटकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। किरीट और कुण्डलों से युक्त वह मस्तक गिरे हुए कमण्डलु के समान शोभा पाता था।। महाराज ! हृष्ट के मारे जाने पर शेष दैत्य भय से व्याकुल हो भागकर चन्द्रावतीपुरी को चले गये। उस समय देवताओं और मनुष्यों की दुन्दुभियाँ बज उठीं और देवता लोग वृक के ऊपर फूलों की वर्षा करने लगे।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में 'हृष्ट दैत्य का वध' नामक बत्तीसवां अध्याय पूरा हुआ।
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