07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 33 || संग्रामजित के हाथ से भूत-संतापन का वध
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 33 || संग्रामजित के हाथ से भूत-संतापन का वध
नारदजी कहते हैं- राजन् ! हृष्ट को मारा गया सुनकर शकुनि के क्रोध की सीमा न रही। उसने देवताओं को भी भय देने वाले अपने भाइयों को भेजा। भूत-संतापन नामक दैत्य हाथी पर चढ़कर निकला। वृक दैत्य गधे पर और कालनाभ सूअर पर चढ़कर आया। महानाभ मतवाले ऊंट पर तथा हरिशमश्रु तिमिंगिल (अतिकाय मगरमच्छ) पर बैठकर निकला। मयासुर का बनाया हुआ एक विजय शील रथ था, जिस पर वैजयन्ती पताका फहराती थी। इसलिये वह ‘वैजयन्त’ और ‘जैत्र’ कहलाता था। उसका विस्तार पाँच योजन का था और उसमें एक हजार घोड़े जुते हुए थे। वह मायामय रथ इच्छानुसार चलने वाला तथा सैकड़ों पताकाओं से सुशोभित था। उसमें एक हजार कलश लगे थे और मोती की झालरें लटक रही थीं। वह रत्नमय आभूषणों से विभूषित तथा सौ चन्द्रमाओं के समान उज्जवल था। उसमें एक हजार पहिये लगे थे तथा उसमें लटकाये गये बहुत-से घंटे उसकी शोभा बढ़ाते थे। शकुनि उसी रथ पर आरुढ़ हो सबसे पीछे युद्ध की इच्छा से निकला। मैथिलेश्वर ! उसके साथ बारह अक्षौहिणी दैत्यों की सेना थी। धनुषों की टंकार, वीरों के सिंहनाद, घोड़ों की हिनहिनाहट, रथों की घरघराहट तथा हाथियों की चीत्कारों से मानो समस्त दिड्मण्डल गर्जना कर रहा था। दैत्य सेना के अभियान से समस्त भूमण्डल कांप ने लगा। नरेश्वर ! अनेकानेक पर्वत धराशायी हो गये। समुद्र विक्षुब्ध हो उठे और अपनी मर्यादा को लांघ गये। देवताओं ने तुरंत ही अमरावतीपुरी के दरवाजे बंद कर लिये और वहाँ अर्गला डाल दी। उस भीषण सेना को देखकर धनुर्धारियों में श्रेष्ठ, बलवान तथा धैर्यशाली वीर श्रीकृष्ण कुमार प्रद्युम्न यदुकुल के श्रेष्ठ वीरों से इस प्रकार बोले।
प्रद्युम्न ने कहा- वीरो ! भूतल पर जो हमारा यह शरीर है, पांच भूतों का बना हुआ है, फेन के समान क्षणभंगुर है, कर्म और गुण आदि से इसका निर्माण हुआ है। इसका आना-जाना लगा रहता है तथा यह काल के अधीन है। यह जगत बालकों के रचे हुए खिलवाड़ के समान है। विद्वान पुरुष इसके लिये कभी शोक नहीं करते। सात्त्विक पुरुष ऊर्ध्वलोक में गमन करते हैं, राजस मनुष्य मध्यलोक में स्थित होते हैं और तामस जीव नीचे के नरक लोकों में जाते हैं। इन तीनों से जो भिन्न हैं, वे बारंबार कर्मानुसार विचरते हुए नाना योनियों में जन्मते-मरते रहते है। यह लोक सब ओर से भयगस्त है; जैसे नेत्रों के घूमने से धरती व्यर्थ ही घूमती-सी प्रतीत होती है, उसी प्रकार यह मन: कल्पित सम्पूर्ण जगत भ्रान्त होता है। जैसे कांच (दर्पण आदि) में प्रतिबिम्बित अपने ही स्वरूप को देखकर बालक मुग्ध होता है, उसी प्रकार यहाँ सब कुछ भ्रान्ति पूर्ण है। जैसे मण्डलवर्ती जनों का सुख अस्थिर होता है, उसी प्रकार पाताल निवासियों का भी सुख अचल नहीं है। यज्ञों द्वारा उपलब्ध देवताओं के सुख को भी इसी प्रकार चंचल समझना चाहिये। श्रेष्ठ पुरुष यही सोचकर समस्त सांसारिक सुख को तिनके के समान त्याग देते हैं।
ऋतु के गुण, देह के गुण और स्वभाव प्रतिदिन जाते परिवर्तित होते रहते हैं; उसी प्रकार मनुष्यों का भी आवागमन लगा रहता है। यहाँ जो-जो दृश्यमान वस्तु है, वह कोई भी सत्य नहीं है। जैसे यात्रा में राहगीरों का समागम होता है और फिर सब-के सब जहाँ-तहाँ चले जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ सब आगमापायी है, कुछ भी स्थिर नहीं है। जैसे इस लोक में देखी हुई वस्तु उल्का या विद्युविलास के समान अस्थिर है, उसी प्रकार पारलौकिक वस्तु के विषय में भी समझना चाहिये। उन दोनों से क्या प्रयोजन सिद्ध होता है अत: सर्वत्र परमेश्वर श्रीहरि को देखते हुए कल्याण मार्ग का निश्चय करके सदा उसी पर चलना चाहिये। जैसे जल पात्रों के समूह में सर्वत्र एक ही चन्द्रमा प्रतिबिम्बित होता है तथा जैसे समिधाओं के समदाय में एक ही अग्नि तत्व का बोध होता है, उसी प्रकार एक ही परमात्मा भगवान स्वयं निर्मित देहधारियों के भीतर और बाहर अनेक-सा जान पड़ता है। जो ज्ञाननिष्ठ है, अत्यन्त वैराग्य का आश्रय ले चुका है, भगवान श्रीकृष्ण का भक्त है और किसी भी वस्तु की अपेक्षा नहीं रखता, वह तपोवन में निवास करे या घर में, उसे तीनों गुण सर्वथा स्पर्श नहीं करते। इसीलिये संन्यासी, जिसने परात्पर ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है, सदा सुखी एवं आनन्दमय हो बालक की तरह विचरता है।
जैसे मदिरा के मद से अन्धा हुआ मनुष्य यह नहीं देखता कि मेरे द्वारा पहना हुआ वस्त्र शरीर पर है या गिर गया, उसी प्रकार सिद्ध पुरुष समस्त सिद्धियों के कारण भूत शरीर के विषय में यह नहीं देखता कि वह प्रारब्ध वश है या गिर गया अथवा कहीं आता है या जाता है। जैसे सूर्योदय होने पर सारा अन्धकार नष्ट हो जाता है और घर में रखी हुई वस्तु लोगों को यथा वस्थित रूप से दिखायी देने लगती है, उसी प्रकार ज्ञानोदय होने पर अज्ञानान्धकार मिट जाता है और अपने शरीर के भीतर ही परब्रह्म प्रकाशित होने लगता है। जैसे इन्द्रियों के पृथक-पृथक मार्ग से तीनों गुणों के आश्रय भूत परमार्थ वस्तु का उन्नयन (सम्यग्ज्ञान) नहीं हो सकता, उसी प्रकार अनन्त परमात्मा का एक मात्र अद्वितीय धाम मुनियों के बताये विभिन्न शास्त्र मार्गों द्वारा पूर्णत: नहीं जाना जा सकता। कुछ लोग वैष्णव धाम को ‘परम पद’ कहते हैं, कोई वैकुण्ठ को परमेश्वर का ‘परम धाम’ बताते हैं, कोई अज्ञानान्धकार से परे जो शान्त स्वरूप परम ब्रह्म है, उसे ‘परम पद’ मानते हैं और कुछ लोग कैवल्य मोक्ष को ही ‘परम धाम’ मानते हैं और कुछ लोग कैवल्य मोक्ष को ही ‘परमधाम’ की संज्ञा देते हैं। कोई अक्षरतत्व की उत्कृष्टता का प्रतिपादन करते हैं, कोई गोलोकधाम को ही सब का आदि कारण कहते हैं तथा कुछ लोग भगवान की निज लीलाओं से परिपूर्ण निकुज्ज को ही ‘सर्वोत्कृष्ट पद’ बताते हैं। मननशील मुनि इन सबके रूप में श्रीकृष्ण पद को ही प्राप्त करता है।
नारद जी कहते हैं- राजन् ! श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न की यह बात सुनकर, धैर्यवर्धक ज्ञान प्राप्त करके, हर्ष और उत्साह से भरे हुए समस्त यादव-श्रेष्ठ वीरों ने शस्त्र ग्रहण कर लिये। फिर तो सीता-गंगा के तट पर यादवों के साथ दैत्यों का तुमुल युद्ध हुआ-वैसे ही, जैसे समुद्र के तट पर वानरों के साथ राक्षसों का हुआ था। रथी रथियों से, पैदल पैदलों से, घुड़सवार घुड़सवारों से गजारोही गजाहियों से जूझने लगे। महावतों से प्रेरित हुए, हौदों से सुशोभित कुछ उन्मत्त गजराज मेघाडम्बर से युक्त गिरि राजों के समान दिखायी देते थे। राजन् ! वे समरांगण में रथियों, घुड़सवारों तथा पैदल वीरों को धराशायी करते हुए विचर रहे थे। वे घोड़ों और सारथियों सहित रथों को सूंड़ में लपेट कर भूमि पर पटक देते और बलपूर्वक पुन: उठाकर आकाश में फेंक देते थे। राजन् ! उस युद्धभूमि में सब ओर दौड़ते हुए क्षत-विक्षत गजराज कुछ लोगों को सुदृढ़ द्वारा विदीर्ण करके उन्हें पैरों से मसल देते थे। महाराज ! घुड़सवारों द्वारा प्रेरित पंखयुक्त घोड़े रथों को लांघकर हाथियों के कुम्भस्थल पर चढ़ जाते थे। कुछ महावीर घुड़सवार युद्ध के मद से उन्मत्त हो, हाथ में शक्ति लिये घोड़ों के द्वारा हाथियों के कुम्भस्थल पर पहुँचकर गजारोही नरेशों को उसी प्रकार मार डालते थे, जैसे सिंह यूथपति गजराजों को मार गिराते हैं। कुछ घुड़सवार योद्धा तलवारों के वेग से सामने की सेना को विदीर्ण करते हुए उसी प्रकार सकुशल आगे निकल जाते थे, जैसे वायु अपने वेग से लीलापूर्वक कमल वन को रौंदकर आगे बढ़ जाती है। कुछ घुड़सवार समरांगण में उछलते हुए खड्गों द्वारा उसी प्रकार आपस में ही आघात प्रत्यघात करने लगते थे, जैसे आकाश में पक्षी किसी मांस के टुकड़े के लिये एक दूसरे को चोंच से मारने लगते हैं। कुछ पैदल योद्धा खड्गों से, कुछ फरसों और चक्रों से तथा कुछ योद्धा तीखे भालों से फलों की तरह विपक्षियों के मस्तक काट लेते थे।
संग्रामजित, बृहत्सेन, शूर, प्रहरण, विजत्, जय, सुभद्र, वाम, सत्यक तथा अश्वयु-भद्रा के गर्भ से उत्पन्न हुए ये दैत्य पुंगवों के साथ युद्ध करने लगे। महाराज। हाथी पर चढ़े हुए महान असुर भूत-संतापन ने अपने नाराचों की वर्षा से दुर्दिन का दृश्य उपस्थित कर दिया। भूत-संताप के बाणों द्वारा अन्धकार फैला दिये जाने पर श्रीकृष्ण के बलवान पुत्र संग्रामजित उसका सामना करने के लिये आये। उन्होंने रणभूमि में सैकड़ों बाण मारकर भूत-संतापन ने घायल कर दिया। तब बलवान भूत संतापन ने प्रलय काल के समुद्रों के संघर्ष से प्रकट होने वाले भयंकर घोष के समान टंकार-ध्वनि करने वाली संग्रामजित ने विद्युत के समान दीप्तिमान अपना दूसरा धनुष लेकर उस पर विधिपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ायी, फिर सौ बाण छोड़े। वे बाण भूत-संतापन के धनुष की प्रत्यंचा, लोहनिर्मित् कवच, शरीर और हाथी का छेदन-भेदन करते हुए धरती में समा गये। बाणों के उस प्रहार से पीड़ित हो भूत-संतापन मन ही मन कुछ घबराया, फिर उस बलवान वीर ने अपने हाथी को आगे बढ़ाया। काल और यम के समान भयानक उस हाथी को आक्रमण करते देख, बलवान संग्रामजित ने अपना दिव्य खड्ग लेकर रणभूमि में उसके ऊपर प्रहार किया।
उस खडग प्रहार से उसकी सूंड़ के दो टुकड़े हो गये और वह भयानक चीत्कार करता था गण्डस्थल से मद बहाता हुआ भूत संतापन को छोड़कर जगत को कम्पित करता हुआ भागा। बड़े बड़े वीरों को धराशायी करता हुआ बारंबार घंटे बजाता हुआ सीधे दैत्यपुरी चन्द्रावती को चला गया। कोई भी बलपूर्वक उसे रोक न सका। इस प्रकार हाथी के संग्राम भूमि से भाग जाने पर वहाँ महान कोलाहल मच गया।
तब भूत संतापन ने श्रीकृष्ण पुत्र के ऊपर तीखी धारवाल चक्र चलाया, जो ग्रीष्म ऋतु के सूर्य की भाँति उद्भासित हो रहा था। महाराज ! उस घूमते चक्र को अपने ऊपर आया देख बलवान भद्राकुमार ने अपने चक्र द्वारा लीलापूर्वक उसके सौ टुकड़े कर डाले। तब उस महान असुर ने जठगिरि का एक शिखर उखाड़कर आकाश मण्डल को निनादित करते हुए श्रीकृष्ण पुत्र पर फेंका। राजेन्द्र संग्रामजित ने उस शिखर को बलपूर्वक दोनों हाथों से पकड़ लिया और उसी के द्वारा रणभूमि में भूत संतापन समूचे जठगिरि को उखाड़कर उसे हाथ में ले, संग्राम भूमि में खड़ा हुआ ‘अब मैं इसी पर्वत से संग्राम में तुम्हारा काम तमाम कर दूँगा’ इस प्रकार मुख से कहने लगा। यह देख श्रीहरि के पुत्र संग्रामजित ने भी देवकूट नामक पहाड़ उखाड़ लिया और मुख से कहा-‘मैं भी इसी से युद्ध भूमि में तेरे प्राण ले लूंगा। राजन् ! यों कहकर वे उसके सामने खड़े हो गये। वह अद्भुत सी घटना हुई। नरेश्वर ! पर्वत फेंकते हुए भूत संताप पर बलवान संग्रामजित ने संग्राम में अपने हाथ के पर्वत से प्रहार किया। भारी बोझ से युक्त जठर और देवकूट दोनों पर्वत दैत्य के मस्तक पर गिरे। उनसे दो वज्रों के टकराने का सा भयानक शब्द हुआ। विदेहराज ! दोनों की चोट से गिरकर भूत-संतापन मृत्यु का ग्रास बन गया और उसकी ज्योति संग्रामजित में विलीन हो गयी। संग्रामजित की सेना में विजय सूचक दुन्दुभियाँ बजने लगीं और देवता उन भद्राकुमार के ऊपर फूल बरसाने लगे।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वाजित-खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘भूत संतापन दैत्य का वध नामक’ तैंतीसवां अध्याय पूरा हुआ।
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