07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 38 || प्रद्युम्न और शकुनि के घोर युद्ध का वर्णन

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 38 || प्रद्युम्न और शकुनि के घोर युद्ध का वर्णन


बहुलाश्व ने पूछा- मुनि श्रेष्‍ठ ! हरिश्मश्रु आदि भाइयों को मारा गया जानकर महान असुर शकुनि ने आगे क्‍या किया।

नारदजी कहा- राजन् ! हरिश्मश्रु के मारे जाने पर शकुनि क्रोध से अचेत सा हो गया। भ्राताओं की मृत्‍यु से उत्‍पन्न हुए शोक में डूबकर समरांगण में दैत्‍यों को सम्‍बोधित कर‍के उसने कहा।

शकुनि बोला- हे पौलोम और कालकेयगण ! तुम सब‍ लोग मेरी बात सुनो। अहो ! दैव का बल अद्भुत है, उसके कारण क्‍या उलट-फेर नहीं हो सकता मेरे भार्इ कालनाभ ने पूर्वकाल में समुद्र मन्‍थन के अवसर पर यमराज को जीत लिया था, परंतु दैववश वह भी यहाँ मनुष्‍यों के हाथ से मारा गया। शम्‍बर ने साक्षात सूर्य देव को परास्‍त किया था, किंतु वह बालक श्रीकृष्‍णकुमार के हाथ से पराजित हुआ। उत्‍कच महाबलियों में महाबली था और इन्‍द्र पर भी विजय पा चुका था, परंतु वह भी बालकृष्‍ण के हाथों मारा गया, यह बात मैंने नारदजी के मुख से सुनी थी। पहले समुद्र मन्‍थन के समय जिसने समस्‍त असुरों के समक्ष अग्निदेव को पराजित किया था, वह मेरा भाई हृष्‍ट भी एक मनुष्‍य द्वारा मार गिराया गया। जिसके सामने से पूर्वकाल में वरुण देवता भी भयभीत हो युद्ध से पीठ दिखाकर भाग गये थे, उस भुत संतापन को भी तुच्‍छ पराक्रम वाले मनुष्‍यों ने मार डाला।
जिसने पहले महायुद्ध में अपने पराक्रम द्वारा भगवान शिव को संतुष्‍ट किया था, उस वृक को यहाँ युद्ध में तुच्‍छ वृष्णिवंशियों ने मार गिराया। मेरे भाई महानाभ ने देवलोक में वायु को भी परास्‍त किया था, किंतु यहाँ इस समय उसको भी यदुकुल के मनुष्‍यों ने मार डाला। हा दैव ! जिसने स्‍वर्ग लोक में बलवान् इन्‍द्रपुत्र को परास्‍त किया था, उस हरिश्मश्रु को भी यहाँ मानवों ने मार गिराया। इसलिये मैं शपथ खाकर कहता हूँ कि इस पृथ्‍वी को मैं यादवों से शून्‍य कर दूँगा। जरासंध, शाल्‍व, बद्विमान् दन्‍तवक्र तथा शिशुपाल ये मेरे मित्र हैं। सुतललोक से प्रचण्‍ड पराक्रमी दानवों को बुलाकर इन मित्रों तथा आप लोगों के साथ मैं देवताओं को जीतने के लिये जाऊँगा और उस युद्ध में बाणासुर भी हमारे साथ होगा। प्रद्युम्न आदि जो उद्भट यादव हैं, उन दुरात्‍माओं को जीतकर और स्त्रियों सहित देवताओं को बांधकर मैं मेरु पर्वत की गुफा के मुंह में डाल दूँगा। गौ, ब्राह्मण, देवता, साधु, वेद, तपस्‍वी, यज्ञ श्राद्धा, तितिक्षु तथा नाना तीर्थों का सेवन करने वाले धर्मात्‍माओं को भी मैं निस्‍संदेह मार डालूँगा। फिर सुखपूर्वक विचरूँगा। देवताओं पर विजय पाने वाला महाबली पराक्रमी राजा कंस धन्‍य था। वह मेरा मित्र और परम सुहद था। खेद की बात है कि आज वह इस भूतल पर विद्यमान नहीं है।

नारदजी कहते हैं- राजन् ! यों कहकर महाबली दानवराज दैत्‍य शकुनि युद्ध में सहसा प्रद्युम्न के सामने आ गया। लाख भार लोहे के समान सुदृढ़ एवं विशाल धनुष लेकर उसने प्रत्‍यंचा को टंकारित किया। उसका वह धनुष मयासुर का बनाया हुआ था। उस धनुष की टंकार ध्‍वनि से दिग्‍गजों के कान बहरे हो गये, अनेक पर्वत ढह गये और समुद्र अपनी मर्यादा से विचलित हो उठे। नरेश्वर ! सारा ब्रह्माण्‍ड गूंज उठा और भूमण्‍डल कांप ने लगा। उसकी प्रत्‍यंचा के घोर शब्‍द से विह्वल हो योद्धाओं के ऊपर योद्धा गिर पड़े। हाथी रणभूमि छोड़कर भागने लगे और घोड़े युद्ध भूमि में उछलने कूदने लगे। इस प्रकार सब लोग अचानक भय से घबराकर भागने लगे। तब महान बल पराक्रम से युक्त गद आदि वीर रथ पर बैठकर धनुष की टंकार करते हुए वहाँ आये। शकुनि ने संग्राम भूमि में अर्जुन को दस बाण मारे। इससे रथ सहित गाण्‍डीवधारी अर्जुन चार कोस दूर जाकर गिरे। रणदुर्मद शकुनि ने गद के ऊपर बीस बाणों से प्रहार किया। राजन् ! उसने गद को रथ सहित व्‍योममण्‍डल में फेंक दिया और जोर जोर से गर्जना करने लगा। राजन् ! उस वीर ने रथ सहित धनुर्धरों में श्रेष्‍ठ अनिरुद्ध को चालीस बाणों से बींध डाला और अपने सिंहनाद से आकाश मण्‍डल को निनादित कर दिया।
अनिरुद्ध का घोड़ों सहित रथ सोलह कोस दूर जा गिरा। विदेहराज ! शकुनि ने समरांगण में साम्‍बको सौ बाण मारे। राजन् ! साम्‍ब भी रथ सहित आकाश में जा समर भूमि से बत्तीस योजन दूर मार्ग पर जा गिरे। तत्‍पश्चात् प्रद्युम्न को सामने आया देख शकुनि क्रोध से भर गया तथा उसने रणक्षैत्र में सहसा बाण समूहों से उन्‍हें घायल कर दिया। राजन् ! प्रद्युम्न का रथ दो घड़ी तक चक्‍कर काटता हुआ सौ कोस दूर पृथ्‍वी पर इस प्रकार जा गिरा, मानो किसी के द्वारा कमण्‍डलु फेंक दिया गया हो। शकुनि का बल देखकर समस्‍त यादव चकित हो उठे। जैसे हाथी पहाड़ से सिर टकराते हैं, उसी प्रकार समस्‍त यादव नाना प्रकार के अस्‍त्र शस्‍त्रों द्वारा उस दैत्‍य को घायल करने लगे। गद, अर्जुन, अनिरुद्ध एवं जाम्‍बवती कुमार साम्‍ब अपने धनुष की टंकार करते हुए पुन: युद्ध भूमि में आ गये। राजन् ! तदनन्‍तर महाबाहु प्रद्युम्न वायु के समान वेगशाली रथ पर बैठकर धनुष की टंकार करते हुए युद्ध मण्‍डल में आ पहुँचे। शकुनि के धनुष की प्रत्‍यंचा प्रलयकाल के समुद्रों के टकराने के शब्‍द जैसी भयंकर टंकार करती थी। श्रीकृष्‍ण कुमार ने दस बाण मारकर उसे काट दिया। फिर सहस्‍त्र बाणों से उसके सहस्‍त्र घोड़ों को, सौ विशिखों द्वारा उसके रथ को और बीस बाण मारकर उसके सारथि को पृथ्‍वी पर गिरा दिया। तब उसने रथ को उठाकर उसमें दूसरे घोड़े जोते और दूसरा सारथि बैठाकर वह दैत्‍यराज पुन: रथ पर आरुढ़ हुआ। राजन् ! तत्‍पश्चात् चढ़ायी इसके बाद पीठ पर पड़े हुए तरकस से सौ बाण खींचकर उसने धनुष पर रखे और कान तक खींचकर प्रद्युम्न से कहा।

शकुनि बोला- तुम सब लोगों में मेरे मुख्य शत्रु तथा मदमत्त योद्धा हो, अत: पहले तुम्हारा ही वध करूँगा। तत्पश्चात् स्वस्थ तेजवाले यादवों की सारी सेना का संहार कर डालूँगा।

प्रद्युम्न ने कहा- असुर ! प्राणियों की आयु सदाकाल के बल से नष्‍ट होती या बीतती है। वह बारंबार छाया की तरह आती जाती है। जैसे बादलों की पंक्ति आकाश में वायु की शक्ति से आती जाती है, उसी तरह सुख दु:ख भी काल की प्रेरणा से आता जाता रहता है। जैसे किसान बोयी हुई खेती को सींचता है और जब वह पक जाती है, तब स्‍वयं उसे हँसुए से सब ओर से काट लेता है, उसकी प्रकार दुर्जयकाल अपनी ही रची हुई देहधारियों की श्रेणी को अपने गुणों द्वारा पालता है और फिर समय आने पर उसका संहार कर डालता है। जीव तो अहंकार से मोहित होकर ही ऐसा मानता है कि मैं यह करूँगा, मैं यह करता हूँ; यह मेरा और वह तेरा है; मैं सुखी हूँ, दु:खी हूँ और ये मेरे सुहृद् हैं इत्‍यादि।

शकुनि बोला- नृपश्रेष्‍ठ ! तुम धन्‍य हो, जो अपनी वाणी द्वारा ऋषि मुनियों का अनुकरण करते हो। तीन गुणों के अनुसार पृथक-पृथक जो प्राणियों का स्‍वभाव है, उसका उनके लिये त्‍याग करना कठिन होता है।

नारदजी कहते हैं- मैथिलेन्‍द्र ! युद्ध स्‍थल में इस प्रकार परस्‍पर संत्‍सग की बातें करते हुए प्रद्युम्न और शकुनि इन्‍द्र और वृत्रासुर की भाँति युद्ध करने लगे। शकुनि इन्‍द्र और वृत्रासुर की भाँति युद्ध करने लगे। शकुनि के धनुष से छुटे हुए विशिख सूर्य की किरणों के समान चमक उठे, परंतु श्रीकृष्‍णकुमार ने एक ही बाण से उन सबको काट दिया- ठीक उसी तरह, जैसे एक ही कटुवचन से मनुष्‍य पुरानी मित्रता को भी खण्डित कर देता है। तब रणदुर्मद शकुनि ने लाख भार की बनी भारी और विशाल गदा हाथ में लेकर प्रद्युम्न के मस्‍तक पर दे मारी। साक्षात भगवान प्रद्युम्न ने अपने वज्र सरीखी गदा से उसकी गदा के सौ टुकड़े कर दिये उसी प्रकार जैसे कोई डंडा मारकर काँच के बर्तन टूक टूक कर दे। तब रोष के आवेश से युक्त हुए उस दैत्‍य ने एक चमचमाता हुआ त्रिशुल हाथ में लिया और उच्‍च स्‍वर से गर्जना करते हुए उसके द्वारा प्रद्युम्न के मस्‍तक पर प्रहार किया। श्रीकृष्‍णकुमार प्रद्युम्न ने भी त्रिशुल मारकर दैत्‍य के त्रिशूल के सौ टुकड़े कर डाले। इसके बाद रुक्मिणीनन्‍द ने एक तीखी बरछी लेकर शकुनि के ऊपर चलायी।
बरछी से उसकी छाती छिद गयी। इससे उसके मन में कुछ घबराहट हुई, तथापि उसने समरांगण में प्रद्युम्न को परिघ से पीट दिया। तब बलवान रुक्मिणी कुमार ने यमदण्‍ड लेकर दैत्‍य के उस अद्भुत परिघ को उसे द्वारा चूर चूर कर डाला। इतना ही नहीं, वेगपूर्वक चलाये हुए उस यमदण्‍ड से सहसा उसके घोड़ों को, सारथि को उस दिव्‍यरथ को भी धराशायी कर दिया। नरेश्वर ! सारथि के मर जाने पर और घोड़े सहित रथ एवं परिघ के भी चूर चूर हो जाने पर उस महादैत्‍य ने रोष पूर्वक खड्ग हाथ में लिया। मैथिल ! जैसे गरुड़ किसी सर्प के दो टुकड़े कर दे, उसी प्रकार महावीर प्रद्युम्न ने यमदण्‍ड के द्वारा उसके खड्ग हाथ में लिया। मैथिल ! जैसे गरुड़ किसी सर्प के दो टुकड़े कर दे, उसी प्रकार महावीर प्रद्युम्न ने यमदण्‍ड के द्वारा उसके खड्ग के दो टुकड़े कर डाले। इसके बाद श्रीकृष्‍णकुमार ने उसी यमदण्‍ड से दैत्‍य के कंधे पर प्रहार किया। उसके आघात से शकुनि को तत्‍काल मूर्च्‍छा आ गयी। तदनन्‍तर क्रोध से भरे हुए प्रद्युम्न ने उस यमदण्‍ड के द्वारा यमराज की भाँति हाथियों, घोड़ों, रथों और उन आततायी दैत्‍यों को मार गिराया। दैत्‍यों के पैर, मुख, अंग और भुजाएँ छिन्न भिन्न हो गयीं। वे समस्‍त दैत्‍य और दानव काल के गाल में चले गये। भीम पराक्रमी प्रद्युम्न को यमराज का रूप धारण किये देख कितने ही दैत्‍य युद्ध भूमि से अपना अपना स्थान छोड़कर दसों दिशाओं में भाग गये।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘शकुनि और प्रद्युम्न के युद्ध का वर्णन’ नामक अड़तीसवां अध्‍याय पूरा हुआ।

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